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PFI: राज्यों में हिंसा, देश के खिलाफ साजिश, टेरर फंडिंग करने के बाद भी PFI पर 5 साल का ही बैन क्यों? तीन कारण

रिसर्च डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु मिश्रा Updated Wed, 28 Sep 2022 03:51 PM IST
PFI
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केंद्र सरकार ने आखिरकार पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) और उससे जुड़े संगठनों पर पांच साल की पाबंदी लगा दी है। जिन संगठनों पर पाबंदी लगाई गई है, उनमें कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया, रिहैब इंडिया फाउंडेशन, ऑल इंडिया इमाम काउंसिल, नेशनल कन्फेडेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइंजेशन, विमेंस फ्रंट, जूनियर फंर्ट, एंपावर इंडिया फाउंडेशन शामिल हैं। 

गृह मंत्रालय ने इन संगठनों के खूनी खेल और काले कारनामों की एक लिस्ट भी जारी की है। इससे पता चलता है कि ये सारे संगठन देश के कई राज्यों में दंगा करवाने, हत्याएं करवाने, देश के खिलाफ साजिश रचने में लिप्त रहे हैं। केंद्रीय जांच एजेंसियों ने देशभर में दो बार छापेमारी कर इस संगठन के 300 से ज्यादा सदस्यों को गिरफ्तार किया है। पीएफआई के तार खतरनाक आतंकी संगठन आईएसआईएस से भी जुड़े हैं। इसका इरादा देश के लोगों में भय पैदा करना था। 



अब आप सोच रहे होंगे कि इतने खतरनाक संगठन को सिर्फ पांच साल के लिए ही क्यों बैन किया गया? इसपर पूरी तरह से प्रतिबंध क्यों नहीं लगा दिया गया? क्या पांच साल बाद फिर से ये संगठन संचालित होने लगेगा? आइए समझते हैं...
 
पीएफआई पर बैन
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पहले जानिए PFI है क्या? 
पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफआई का गठन 17 फरवरी 2007 को हुआ था। ये संगठन दक्षिण भारत के तीन मुस्लिम संगठनों का विलय करके बना था। इनमें केरल का नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट, कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी और तमिलनाडु का मनिथा नीति पसराई शामिल थे। पीएफआई का दावा है कि इस वक्त देश के 23 राज्यों यह संगठन सक्रिय है। देश में स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट यानी सिमी पर बैन लगने के बाद पीएफआई का विस्तार तेजी से हुआ है। कर्नाटक, केरल जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में इस संगठन की काफी पकड़ बताई जाती है। इसकी कई शाखाएं भी हैं। 


 
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पीएफआई पर बैन
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किस तरह के लगे हैं आरोप? 
गृहमंत्रालय ने पीएफआई पर लगे आरोपों की एक लिस्ट जारी की है। इसमें बताया गया है कि पिछले कुछ सालों में देश के विभिन्न राज्यों में हुई हत्याओं में पीएफआई का हाथ रहा है। केरल में अभिमन्यु की 2018, ए संजीथ की नवंबर 2021, नंदू की 2021 में हुई हत्याओं में इसी संगठन का हाथ है। इसके अलावा तमिलनाडु में 2019 में रामलिंगम, 2016 में शशि कुमार, कर्नाटक में 2017 में शरथ, 2016 में आर. रुद्रेश, 2016 में ही प्रवीण पुजारी और 2022 में प्रवीण नेट्टारू की नृशंस हत्याएं भी इसी संगठन ने करवाई थी। इन हत्याओं का एकमात्र मकसद देश में शांति भंग करना और लोगों के मन में खौफ पैदा करना था। 

 
पीएफआई सदस्यों ने प्रोफेसर का हाथ काट दिया।
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चार जुलाई 2010 को केरल में प्रोफेसर टीजे जोसेफ के दाहिने हाथ की हथेली काट दी गई थी। पीएफआई मलयाली प्रोफेसर जोसेफ से नाराज था। संगठन का मानना था कि जोसेफ ने कॉलेज की परीक्षा में कथित तौर पर पैगंबर मुहम्मद के बारे में अपमानजनक टिप्पणी की थी। इसका बदला लेने के लिए पीएफआई के कार्यकर्ताओं ने जोसेफ के दाहिने हाथ की हथेली काट दी थी। इस घटना के आरोपियों को एनआईए ने गिरफ्तार किया था। 

 
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पीएफआई पर बैन
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गृह मंत्रालय के अनुसार इस संगठन का ताल्लुक आतंकवादियों से है। संगठन के सदस्य सीरिया, इराक व अफगानिस्तान में जाकर आईएस के आतंकी समूहों में शामिल हुए, कई वहां मारे गए। कुछ को विभिन्न राज्यों की पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों ने गिरफ्तार किया। इसके आतंकवादी संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश के साथ संबंध हैं। यह संगठन देश में हवाला व चंदे के माध्यम से पैसा एकत्रित कर कट्टरपंथ फैला रहा है। युवाओं को बरगला कर उन्हें आतंकवाद में धकेल रहा है। 
 
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