Mera Kavya

मेरा काव्य

Mere Alfaz

मेरा काव्य

कौशल विकास ज़रूरी है

X

सभी 8 एपिसोड

Kaushal vikas zaruri hai

23 अगस्त 20212 mins 11 secs

कौशल विकास ज़रूरी है

कौशल विकास ज़रूरी है
कौशल विकास ज़रूरी है
दूर करता बेरोज़गारी है
दूर करता बेरोज़गारी है
कौशल विकास ज़रूरी है

पूरा करें प्रमाण पत्र पायें
इज्ज़त पाते ही जाएँ
पूरा करें प्रमाण पत्र पायें
इज्ज़त पाते ही जाएँ

महनत करें ज्ञान को बढ़ायें
सफ़र में आगे बढ़ते ही जायें
महनत करें ज्ञान को बढ़ायें
सफ़र में आगे बढ़ते ही जायें

जीवन बेहतर होना रुक ना पाये
जीवन बेहतर होना रुक ना पाये
होता जाए जीवन का विकास
होता जाए जीवन का विकास
कौशल विकास ज़रूरी है
कौशल विकास ज़रूरी है
कौशल विकास ज़रूरी है

- आशीष कुमार सिंह
 

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।  आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।

Kachda song

23 अगस्त 20212 mins 23 secs

कचड़ा सॉन्ग

ज़िम्मेदारी से निपटेंगे कचड़े से हे कचड़े से
ज़िम्मेदारी से निपटेंगे कचड़े से हे कचड़े से
जलवायु को बचाना है
धरती को स्वर्ग बनाना है
जलवायु को बचाना है
धरती को स्वर्ग बनाना है

प्लास्टिक कूड़ा अलग फेंके
छिलका सारा अलग डालें
प्लास्टिक कूड़ा अलग फेंके
छिलका सारा अलग डालें

ताकि उस पर काम हो पाये
ग्रीनहाउस गैस कम हो जाये
ताकि उस पर काम हो पाये
ग्रीनहाउस गैस कम हो जाये
और सुनहरा कल बन जाये

ज़िम्मेदारी से निपटेंगे कचड़े से हे कचड़े से
कचड़े से हे कचड़े से
कचड़े से हे कचड़े से
 

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।  आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।

खुदा बन इंसान,
जब उन जंगलों को काट रहा था,
काश, धड़ाम होते उन बेजुबान,
पेड़ों के चींखें सुन लेता ।

कभी खोज में, कभी खनन में,
जब इस धरती को चीर रहा था,
काश, चलाने से पहले कोई मशीन,
मां की कोख को याद कर लेता ।

विकास का नकाब पहन के,
जब जल-वायु , चर-अचर को छेड़ रहा था,
काश, कुदरत से खिलवाड़ के इस व्यसन में,
बिगड़ते मौसम की मिजाज को समझ लेता ।

जीत की होड़ में, जिंदगी की दौड़ में,
जब संसार के सारे नियमों को तोड़ रहा था,
काश, नियति को नजरंदाज करने से पहले,
क्या खोया?, क्या पाया?,
और बचा क्या? हिसाब कर लेता ।


----- कंतेटि अनिलकुमार
वडोदरा 
 

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।  आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।

Ai zindagi kuchh to bata

24 अप्रैल 20211 mins 15 secs

ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता

ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता
क्या दे रही ज़िन्दगी का सिला
क्यों कर रही अपनों को अपनों से दूर
होता है दर्द क्या, क्या तुझे है पता

छुटती सांसें हैं और टूटते अपने हैं
छूटते हैं अपनों के निशा
ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता
क्या दे रही ज़िन्दगी का सिला

देखती थी जो आंखें सपने
बह रही है को समन्दर बनकर
हो गया है मन आधिर्ज ये
छूटते अपनों का साथ देखकर

ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता
क्या दे रही ज़िन्दगी का सिला
क्यों कर रही अपनों को अपनों से दूर
होता है दर्द क्या, क्या तुझे है पता।

✍️ दीप्ति पांडेय
 

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें

Ai jindagi kuchh to bata

24 अप्रैल 20211 mins 15 secs

ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता

ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता
क्या दे रही ज़िन्दगी का सिला
क्यों कर रही अपनों को अपनों से दूर
होता है दर्द क्या, क्या तुझे है पता

छूटती सांसें हैं और टूटते अपने हैं
छूटते हैं अपनों के निशां
ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता
क्या दे रही ज़िन्दगी का सिला

देखती थी जो आंखें सपने
बह रही है को समन्दर बनकर
हो गया है मन आधिर्ज ये
छूटते अपनों का साथ देखकर

ऐ ज़िन्दगी कुछ तो बता
क्या दे रही ज़िन्दगी का सिला
क्यों कर रही अपनों को अपनों से दूर
होता है दर्द क्या, क्या तूझे है पता।
 

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें

Thaharo khuchh pal yha

22 अप्रैल 20211 mins 38 secs

ठहरो कुछ पल यहां

ठहरो कुछ पल यहां
ज़रा गौर से देखने तो दो
तुम वही हो ना
ज़रा तसल्ली तो करने दो
 

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।  आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें

आवाज

  • Downloads

Follow Us

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00