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Manto ki Kahaniyan

मंटो के अफसाने

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अमर उजाला आवाज में सुनिए मशहूर लेखक सआदत हसन मंटो की हरदिल अजीज कहानियां

सुनिए मंटो का अफसाना : कुदरत का उसूल

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सभी 53 एपिसोड

ये कहानी है समलैंगिकता के उत्थान व पतन की। इसमें मंटो ने यह बताने की कोशिश की है कि बाज़ार में जिस चीज़ की मांग होती है उसकी अचानक अधिकता हो जाती है और जैसे ही उसकी मांग कम या ख़त्म होती है वो चीज़ भी ग़ायब हो जाती है...
 

मर्द के दोहरे रवैय्ये और औरत की मासूमियत को इस कहानी में बयान किया गया है। सलमा एक अविवाहित लड़की है और शाहिदा उसकी शादी-शुदा सहेली। 

ये एक ऐसी महिला की कहानी है जो बीमार होती है और एक लेखक को हमेशा ख़त लिखा करती है. एक दिन लेखक के घर पहुंच जाती है और कुछ ऐसा होता है जो लेखक में सोचने पर मजबूर कर देता है...
 

इस कहानी में भारत के बंटवारे से पहले के हालात को बयां किया गया है, भारत और पाकिस्तान दोनों के विरुद्ध मूत्रालय में अलग-अलग जुमले लिखे मिलते थे...
सुनिए मंटो के अफसाने

इस कहानी में सआदत हसन मंटो ने एक कुत्ते की अपने मालिक के प्रति वफ़ादारी की एक अनोखी दास्तान पेश की है। जब एक बार मालिक बीमार पड़ा तो कुत्ते ने उसके लिए ऐसी दुआ मांगी कि मालिक तो ठीक हो गया, पर कुत्ता अपनी जान गंवा बैठा...

मंटो ने अपनी एस कहानी में जवानी की शुरुआत में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों से बे-ख़बर एक लड़की की कहानी बयान की है...

उसी रात जब महताब ख़ां चोरी के पच्चास रुपये, कुछ होटलों में बाक़ी के हीरा मंडी में ख़र्च कर चुका था, उसके बड़े भाई ने जाने किस जगह उसकी गर्दन नापी और ऐसे ज़ोर से नापी कि वो दो दिन तक बिलबिलाता रहा, लेकिन उसने किसी पर ये ज़ाहिर न किया...

ये एक ऐसे आदमी की कहानी है जिसे जवानी में जवानी में हुए एक हादसे के चलते औरत ज़ात से नफ़रत हो जाती है। वह उसकी जवानी की बहारों के दिन थे जब एक दिन अपने दोस्तों के साथ बैठा वह शराब पी रहा था कि अचानक ख़याल आया कि इस मौक़े पर कोई लड़की होनी चाहिए...

इस कहानी में मंटो ने बाग की एक काली कली और बुलबुल के घमंड, प्यार और नफरत को प्रतीकात्मक रूप में बयान किया है...

अमृतसर से स्शपेशल ट्रेन दोपहर दो बजे को चली और आठ घंटों के बाद मुग़लपुरा पहुंची। रास्ते में कई आदमी मारे गए। कई ज़ख़्मी हुए और कुछ इधर उधर भटक गए। सुबह दस बजे कैंप की ठंडी ज़मीन पर जब सिराजुद्दीन ने आंखें खोलीं और अपने चारों तरफ़ मर्दों, औरतों और बच्चों का एक बेचैन समंदर देखा तो उसकी सोचने समझने की ताकत और भी कमजोर हो गई। वो देर तक गदले आसमान को टकटकी बांधे देखता रहा। यूं तो कैंप में हर तरफ़ शोर बरपा था। लेकिन बूढ़े सिराजुद्दीन के कान जैसे बंद थे। उसे कुछ सुनाई नहीं देता था। कोई उसे देखता तो ये ख़याल करता कि वो किसी गहरी फ़िक्र में डूबा है मगर ऐसा नहीं था। उसके होश-ओ-हवास सुन्न थे। उसका सारा वजूद ख़ला में मुअल्लक़ था। 

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