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महमूद और जमीला
मंटो के अफसाने

सुनिए मंटो का अफसाना : आर्टिस्ट लोग

23 September 2022

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9:36
इस कहानी में कलाकारों के दर्द को बयान किया गया है। महमूद और जमीला अपनी कला को एक मुकाम देने के लिए जतन करते हैं लेकिन हालात से परेशान हो कर आर्थिक निश्चिंतता के लिए वे एक फैक्ट्री में काम करने लगते हैं, लेकिन दोनों को यह काम कलाकार के प्रतिष्ठा के अनुकूल महसूस नहीं होता इसीलिए दोनों एक दूसरे से अपनी इस मजबूरी और काम को छुपाते हैं।

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सभी 22 एपिसोड

ईशर सिंह जूही होटल के कमरे में दाख़िल हुआ, कुलवंत कौर पलंग पर से उठी। अपनी तेज़ तेज़ आंखों से उसकी तरफ़ घूर के देखा और दरवाज़े की चटखनी बंद कर दी। रात के बारह बज चुके थे, शहर का मुज़ाफ़ात एक अजीब पुर-असरार ख़ामोशी में ग़र्क़ था...

मान लिया कि मेरा किसी को उल्लू का पट्ठा कहने को जी चाहता है, मगर ये कोई बात तो न हुई. मैं किसी को उल्लू का पट्ठा क्यों कहूं? मैं किसी से नाराज़ भी तो नहीं हूं...
 

मैं जब उस की तरफ़ बढ़ा तो उस ने पलट कर मेरी तरफ़ देखा. बारिश के लरज़ते हुए पर्दे में से मुझे देख कर भागी. मगर मैंने चंद गज़ों ही में उसे जा पकड़ा. जब हाथ इस के चिकने ज़ीन कोट पर पड़ा तो वो अंग्रेज़ी में चिल्लाई...हेल्प...हेल्प... 

इस कहानी में कलाकारों के दर्द को बयान किया गया है। महमूद और जमीला अपनी कला को एक मुकाम देने के लिए जतन करते हैं लेकिन हालात से परेशान हो कर आर्थिक निश्चिंतता के लिए वे एक फैक्ट्री में काम करने लगते हैं, लेकिन दोनों को यह काम कलाकार के प्रतिष्ठा के अनुकूल महसूस नहीं होता इसीलिए दोनों एक दूसरे से अपनी इस मजबूरी और काम को छुपाते हैं।

नाम उसका सलीम था मगर उसके यार-दोस्त उसे शहज़ादा सलीम कहते थे। ग़ालिबन इसलिए कि उसके ख़द-ओ-ख़ाल मुग़लई थे, ख़ूबसूरत था। चाल ढ़ाल से रऊनत टपकती थी। उसका बाप पी.डब्ल्यू.डी. के दफ़्तर में मुलाज़िम था। तनख़्वाह ज़्यादा से ज़्यादा सौ रुपये होगी मगर बड़े ठाट से रहता, ज़ाहिर है कि रिश्वत खाता था। यही वजह है कि सलीम अच्छे से अच्छा कपड़ा पहनता जेब ख़र्च भी उसको काफ़ी मिलता इसलिए कि वो अपने वालिदैन का इकलौता लड़का था। 

बारिश एक नौजवान के अधूरे इश्क़ की कहानी है। तनवीर अपनी कोठी से बारिश में नहाती हुईं दो लड़कियों को देखता है। उनमें से एक लड़की पर फिदा हो जाता है। एक दिन वो लड़की उससे कार में लिफ़्ट मांगती है और तनवीर को ऐसा महसूस होता है कि उसे अपनी मंज़िल मिल गई है लेकिन बहुत जल्द उसे मालूम हो जाता है कि वो वेश्या है...

खज़ाने का बड़ा अफ़सर मुंशी करीम बख़्श के एक मुरब्बी और मेहरबान जज का लड़का था। जज साहब की वफ़ात पर उसे बहुत सदमा हुआ था। अब वो हर महीने उनके लड़के को सलाम करने की ग़रज़ से ज़रूर मिलता था...

अमृतसर से स्शपेशल ट्रेन दोपहर दो बजे को चली और आठ घंटों के बाद मुग़लपुरा पहुंची। रास्ते में कई आदमी मारे गए। कई ज़ख़्मी हुए और कुछ इधर उधर भटक गए। सुबह दस बजे कैंप की ठंडी ज़मीन पर जब सिराजुद्दीन ने आंखें खोलीं और अपने चारों तरफ़ मर्दों, औरतों और बच्चों का एक बेचैन समंदर देखा तो उसकी सोचने समझने की ताकत और भी कमजोर हो गई। वो देर तक गदले आसमान को टकटकी बांधे देखता रहा। यूं तो कैंप में हर तरफ़ शोर बरपा था। लेकिन बूढ़े सिराजुद्दीन के कान जैसे बंद थे। उसे कुछ सुनाई नहीं देता था। कोई उसे देखता तो ये ख़याल करता कि वो किसी गहरी फ़िक्र में डूबा है मगर ऐसा नहीं था। उसके होश-ओ-हवास सुन्न थे। उसका सारा वजूद ख़ला में मुअल्लक़ था। 

सुनिए मंटो का अफसानाः दो कौमें

बंटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदोस्तान की हुकूमतों को ख़्याल आया कि अख़लाक़ी क़ैदियों की तरह पागलों का तबादला भी होना चाहिए यानी जो मुसलमान पागल, हिंदोस्तान के पागलख़ानों में हैं उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जाए...

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