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महमूद और जमीला
मंटो के अफसाने

सुनिए मंटो का अफसाना : आर्टिस्ट लोग

23 September 2022

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इस कहानी में कलाकारों के दर्द को बयान किया गया है। महमूद और जमीला अपनी कला को एक मुकाम देने के लिए जतन करते हैं लेकिन हालात से परेशान हो कर आर्थिक निश्चिंतता के लिए वे एक फैक्ट्री में काम करने लगते हैं, लेकिन दोनों को यह काम कलाकार के प्रतिष्ठा के अनुकूल महसूस नहीं होता इसीलिए दोनों एक दूसरे से अपनी इस मजबूरी और काम को छुपाते हैं।

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सभी 24 एपिसोड

आयशा ने शफ़क़त का हाथ दबाया. पलट कर उसने अपनी बीवी की तरफ़ सवालिया नज़रों से देखा. उसने आंखों ही आंखों में कोई इशारा किया जिसे शफ़क़त न समझ सका. वो मुतहय्यर था कि ख़ुदा मालूम क्या बात थी कि उसकी बीवी ने उसका हाथ दबाया और इशारा भी किया...

कुछ दिनों से मोमिन बहुत बेक़रार था। उसको ऐसा महसूस होता था कि उसका वजूद कच्चा फोड़ा सा बन गया था। काम करते वक़्त, बातें करते हुए हत्ता कि सोचने पर भी उसे एक अजीब क़िस्म का दर्द महसूस होता था। ऐसा दर्द जिसको वो बयान भी करना चाहता तो न कर सकता...

ऐसे इंसान बहुत कम हैं, जिन्होंने हालात की परवाह न करते हुए ज़िंदगी की बागडोर अपने हाथ में संभाल ली. टॉमस विल्सन भी इसी क़बील से था. उसने अपनी ज़िंदगी बदलने के लिए अनोखा क़दम उठाया, पर उसकी मंज़िल का चूंकि कोई पता नहीं था, इसलिए उसकी कामयाबी के बारे में अंदाज़ा लगाना मुश्किल था...

बरसात

27 September 202215 mins 41 secs

मंटो का अफसाना : बू

बरसात के यही दिन थे। खिड़की के बाहर पीपल के पत्ते इसी तरह नहा रहे थे। सागवान के इस स्प्रिंगदार पलंग पर जो अब खिड़की के पास से थोड़ा इधर सरका दिया गया था एक घाटन लौंडिया रणधीर के साथ चिपटी हुई थी...

ईशर सिंह जूही होटल के कमरे में दाख़िल हुआ, कुलवंत कौर पलंग पर से उठी। अपनी तेज़ तेज़ आंखों से उसकी तरफ़ घूर के देखा और दरवाज़े की चटखनी बंद कर दी। रात के बारह बज चुके थे, शहर का मुज़ाफ़ात एक अजीब पुर-असरार ख़ामोशी में ग़र्क़ था...

मान लिया कि मेरा किसी को उल्लू का पट्ठा कहने को जी चाहता है, मगर ये कोई बात तो न हुई. मैं किसी को उल्लू का पट्ठा क्यों कहूं? मैं किसी से नाराज़ भी तो नहीं हूं...
 

मैं जब उस की तरफ़ बढ़ा तो उस ने पलट कर मेरी तरफ़ देखा. बारिश के लरज़ते हुए पर्दे में से मुझे देख कर भागी. मगर मैंने चंद गज़ों ही में उसे जा पकड़ा. जब हाथ इस के चिकने ज़ीन कोट पर पड़ा तो वो अंग्रेज़ी में चिल्लाई...हेल्प...हेल्प... 

इस कहानी में कलाकारों के दर्द को बयान किया गया है। महमूद और जमीला अपनी कला को एक मुकाम देने के लिए जतन करते हैं लेकिन हालात से परेशान हो कर आर्थिक निश्चिंतता के लिए वे एक फैक्ट्री में काम करने लगते हैं, लेकिन दोनों को यह काम कलाकार के प्रतिष्ठा के अनुकूल महसूस नहीं होता इसीलिए दोनों एक दूसरे से अपनी इस मजबूरी और काम को छुपाते हैं।

नाम उसका सलीम था मगर उसके यार-दोस्त उसे शहज़ादा सलीम कहते थे। ग़ालिबन इसलिए कि उसके ख़द-ओ-ख़ाल मुग़लई थे, ख़ूबसूरत था। चाल ढ़ाल से रऊनत टपकती थी। उसका बाप पी.डब्ल्यू.डी. के दफ़्तर में मुलाज़िम था। तनख़्वाह ज़्यादा से ज़्यादा सौ रुपये होगी मगर बड़े ठाट से रहता, ज़ाहिर है कि रिश्वत खाता था। यही वजह है कि सलीम अच्छे से अच्छा कपड़ा पहनता जेब ख़र्च भी उसको काफ़ी मिलता इसलिए कि वो अपने वालिदैन का इकलौता लड़का था। 

बारिश एक नौजवान के अधूरे इश्क़ की कहानी है। तनवीर अपनी कोठी से बारिश में नहाती हुईं दो लड़कियों को देखता है। उनमें से एक लड़की पर फिदा हो जाता है। एक दिन वो लड़की उससे कार में लिफ़्ट मांगती है और तनवीर को ऐसा महसूस होता है कि उसे अपनी मंज़िल मिल गई है लेकिन बहुत जल्द उसे मालूम हो जाता है कि वो वेश्या है...

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