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मैरी रॉय: वो महिला जिसने बेटियों को दिलाया पितृ संपत्ति पर हक, जानिए उनके संघर्ष की कहानी

लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवानी अवस्थी Updated Sat, 18 Sep 2021 11:32 AM IST
मैरी राॅय
मैरी राॅय - फोटो : Twitter/alchemy_bare
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एक दौर था जब पिता की संपत्ति पर सिर्फ बेटों का अधिकार होता था। बेटे ही पिता के घर-कारोबार और धन दौलत के जिम्मेदार होते थे। हमारा देश पुरुष प्रधान है, जहां बेटों को वंश आगे बढ़ाने वाला, परिवार का कुल और वसीयत का मालिक माना जाता है, लेकिन इस सोच को कानूनी तौर पर बदला एक महिला ने। एक ऐसी महिला, जिसने बेटियों को पिता की संपत्ति का हकदार ही नहीं बनाया बल्कि जन्म से ही बेटियों को बेटों के बराबर अधिकार दिलाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी।  26 साल तक कानूनी कार्रवाई और संघर्ष के बाद उन्होंने सफलता प्राप्त की।
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ये कहानी है मैरी राॅय की। उन्होंने एक बेटी होने के नाते अपने अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी थी और जीत देश की हर बेटी की हुई। तर्क भी सही है, जब लड़का हो या लड़की दोनों ही अपने पिता कि संतान हैं तो अधिकार मात्र बेटों के लिए ही क्यों? इसी सवाल के साथ शुरू हुई कानूनी कार्रवाई ने मैरी रॉय को सफलता दिलाई और देश की हर बेटी को पितृ संपत्ति में वारिस होने का अधिकार मिल गया। चलिए जानते हैं कौन हैं मैरी रॉय और उनके 26 साल के संघर्ष के बारे में। 


कौन हैं मैरी राॅय

अरुंधति रॉय का नाम तो आपने सुना ही होगा। मैरी रॉय, उन्हीं अरुंधति रॉय की मां है। दरअसल, मैरी रॉय केरल की एक सीरियाई ईसाई महिला थीं। उनके पिता पीवी इसहाक इंटोमोलॉजिस्ट थे, जिन्होंने हेरोल्ड मैक्सवेल-लेफ्रॉय के तहत इंग्लैंड में प्रशिक्षण लिया था और पूसा में इंपीरियल इंटोमोलॉजिस्ट बन गए। 

जब मैरी रॉय के पिता का देहांत हुआ तो उनके पिता अपने पीछे कोई वसीयत नहीं छोड़ गए थे। उस समय त्रावणकोर ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम, 1916 के मुताबिक, अगर कोई पिता अपनी बेटी के नाम वसीयत किए बिना मर जाता है तो उनकी संपत्ति पर सिर्फ बेटों का ही अधिकार होने का नियम था। बेटी पिता की किसी वस्तु पर अपना अधिकार नहीं जता सकती थी। मैरी ने इसी अधिनियम के खिलाफ आवाज उठाई। 

पिता की संपत्ति में अधिकार के लिए केरल हाईकोर्ट का फैसला

मेरी रॉय ने त्रावणकोर ईसाई उत्तराधिकार अधिनियम, 1916 की संवैधानिक वैधता को कोर्ट में चुनौती देने का फैसला लिया। इस लड़ाई में संपत्ति पर बेटी के समान अधिकार की बात करते हुए मैरी रॉय ने अनुच्छेद 14 का हवाला दिया। हालंकि निचली अदालत ने मुकदमे को ही खारिज कर दिया। इसके बाद भी मैरी ने लड़ाई जारी रही और केरल हाईकोर्ट में उन्होंने अपील की। सालों चले मुकदमे में उस समय मोड़ आया, जब केरल हाईकोर्ट ने उन्हें पक्ष में फैसला सुनाया और मैरी रॉय को पिता की आधी संपत्ति का अधिकार मिला। 

पिता की संपत्ति के अधिकार का एतिहासिक फैसला 

मैरी रॉय के पक्ष में आया ये फैसला इसलिए भी एतिहासिक था, क्योंकि आजाद भारत के इतिहास में पहली बार किसी विवाहित महिला को पिता की संपत्ति में बराबरी के अधिकार मिला था। इस फैसले के बाद त्रावणकोर सक्सेशन एक्ट में बदलाव हुआ। देश की सीरियन क्रिश्चियन महिलाओं को पिता की संपत्ति में समान अधिकार मिला।

केरल हाईकोर्ट के फैसले के दायरे में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 कोचिन में रहने वाले ईसाई आए। नए नियम के तहत अब बच्चा वो चाहे लड़की यो या लड़का, जन्म से ही पिता की वसीयत  का समान तौर पर वारिस रहेगा। अगर बिना वसीयत के पिता की मौत हो जाती है तो बेटी का भी भाई के समान संपत्ति में हक होगा। आजाद भारत में लड़कियों को सशक्त बनाने की दिशा में ये पहली जीत थी। 

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