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यूपी पंचायत चुनाव : लॉकडाउन में शहर से लौटे युवा पंचायत चुनाव के अखाड़े में ठोक रहे ताल

मनीष मिश्र, ललितपुर/सोनभद्र/अलीगढ़/बस्ती/रायबरेली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Thu, 08 Apr 2021 06:06 AM IST

सार

  • रसूख और बेहतर रोजगार का जरिया पैदा कर रहा लालच
  • कई जगह पिता ने ही पुत्र को किया लॉन्च
  • प्रधानी से जिला पंचायत तक आजना रहे दांव
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प्रचार को निकले रसायन शास्त्र में एमएससी चेतन और चुनाव मैदान में उतरे ऋचा व मदन...
प्रचार को निकले रसायन शास्त्र में एमएससी चेतन और चुनाव मैदान में उतरे ऋचा व मदन... - फोटो : अमर उजाला

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विस्तार

पंचायत चुनाव ग्रामीण युवाओं के लिए ऐसे समय में रोजगार के अवसर लेकर आए हैं जब लॉकडाउन के बाद उनकी रोजी-रोटी पर संकट है। ग्रामीण युवा करिअर के लिए बेहतर अवसर मानते हुए चुनावों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा कर रहे हैं। पंचायतों के बढ़े बजट और प्रतिष्ठा के साथ ही आगे की सुरक्षित राह को देखकर युवा प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमाने से पीछे नहीं रहना चाहते।
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पंचायत चुनावों पर ‘अमर उजाला’ की ग्राउंड रिपोर्ट में गांव की राजनीति में युवा चेहरे बढ़-चढ़ कर दिख रहे हैं। लॉकडाउन में गांव आए ऐसे युवा भी चुनाव में ताल ठोक रहे हैं जो शहरों में वापस नहीं लौट पाए हैं। इनमें से कई इसे मंदी के इस दौर में रोजगार और प्रतिष्ठा का बेहतर अवसर मानते हैं। यहां तक कई उच्च शिक्षा प्राप्त युवा भी पंचायत चुनाव को अवसर मान रहे हैं।


बस्ती जिले की नेवादा ग्राम पंचायत में प्रधान पद पर चुनाव लड़ने वाले ज्यादातर युवा हैं। निवर्तमान प्रधान जय प्रकाश शुक्ल ने अपने बेटे विवेक शुक्ला को मैदान में उतारा तो विरोधियों ने भी अपने बेटों को आगे कर दिया। गांव के नुक्कड़ पर बेटे की तस्वीर से बना गेट दिखाते हुए जय प्रकाश कहते हैं, इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के बाद बेटे ने अमृतसर में नौकरी शुरू कर दी, लेकिन ग्राम प्रधान रहीं मेरी मां की मृत्यु के बाद उसे प्रधान का उम्मीदवार चुना गया।

रायबरेली जिले के बछरावां ब्लॉक के ठकुराइन खेड़ा गांव में रहने वाली स्नातक तक पढीं ऋचा पाल ने जिला पंचायत सदस्य के लिए पर्चा दाखिल कर दिया है। ऋचा कहती हैं, नौकरी करके हम अपना ही भविष्य बना सकते थे, गांव की राजनीति में हम समाज का भला कर पाएंगे।

आबादी 46 फीसदी, चुने गए सिर्फ 13 फीसदी ही युवा
राज्य निर्वाचन आयोग के अनुसार कुल 12.39 ग्रामीण मतदाताओं में करीब 46 फीसदी 18-35 साल के हैं। जबकि, वर्ष 2015 के पंचायत चुनाव में 21 से 35 आयु वर्ग के कुल 20,707 प्रधान ही चुने गए थे। यह संख्या कुल प्रधानों की लगभग 13 फीसदी थी। वर्ष 2015 में 55 फीसदी जिला पंचायत अध्यक्ष 21-35 वर्ष के थे। वे भले ही राजनीतिक परिवार से जुड़े हुए हों, लेकिन राजनीति का ककहरा गांव से पढ़ना शुरू किया।

निचले तबके के युवा भी जान रहे हैं कि समाज में ऊपर आने का सरल रास्ता गांव की राजनीति में ऊपर आना। सोनभद्र के दुद्धी से जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ रहे 28 वर्ष के भीम सिंह इन चुनावों को युवाओं के लिए एक सुनहरा मौका मानते हैं। भीम बताते हैं कि इससे अच्छा क्या है कि गांव समाज का विकास हो, हमें भी रोजगार मिल जाए। इस बार सोनभद्र से ज्यादातर युवा प्रत्याशी ही हैं, पहले युवाओं को कोई तवज्जो नहीं देता था। अगर जीत गए तो रोजगार का सुनहरा मौका भी है।



 
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पंचायत से सियासत की शुरुआत

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