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United Nations: संयुक्त राष्ट्र बोला- भारत में भेदभाव, गरीबी और बाल श्रम आपस में जुड़ी समस्याएं

एजेंसी, वाशिंगटन। Published by: Jeet Kumar Updated Fri, 19 Aug 2022 05:29 AM IST
सार

रिपोर्ट के कहा गया कि ट्रेड यूनियनों ने अल्पसंख्यकों और प्रवासी श्रमिकों को अधिकार दिलाने के लिए विशेष काम किए। भारत, चिली, कोलंबिया, घाना जैसे देशों में इन यूनियनों ने सराहनीय काम किए।

संयुक्त राष्ट्र (फाइल फोटो)
संयुक्त राष्ट्र (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
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विस्तार

भारत में जाति आधारित भेदभाव, गरीबी और बाल श्रम आपस में जुड़ी हुई समस्याएं हैं। एक की वजह से दूसरी देखने को मिल रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा कई प्रकार की गुलामी पर जारी ताजा रिपोर्ट में यह टिप्पणी की गई। इसमें बांग्लादेश का भी संदर्भ देकर बताया गया कि दक्षिण एशिया में दलित महिलाओं से सबसे गंभीर किस्म का भेदभाव हो रहा है।



रिपोर्ट जारी करने वाली मानवाधिकार परिषद में विशेष दूत टॉमोया ओबोकाटा ने कहा, पूरे विश्व में गुलामी कई सामयिक स्वरूप में चल रही है। इसकी प्रमुख वजह गहरी जड़ें रखने वाला भेदभाव है। ऐतिहासिक मान्यताएं, उपनिवेशवाद, विरासत व्यवस्था और औपचारिक व सरकार प्रायोजित भेदभाव जैसी कई अन्य वजह भी इस गुलामी के पीछे है।


बांग्लादेश : दलित महिलाओं को सफाई के काम में धकेला जा रहा
रिपोर्ट में बांग्लादेश का विशेष उदाहरण देकर बताया गया है कि यहां शहरी घरों में की सफाई सहित सड़कों पर झाड़ू लगाने, मरे पशु दफनाने और सफाई के सभी कामों में दलित समुदायों को धकेला जाता है। विशेष तौर पर दलित महिलाएं इस काम में झोंकी जा रही हैं। इसका उनके मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा असर हो रहा है। 

भारत के श्रम संगठनों की सराहना
रिपोर्ट के कहा गया कि ट्रेड यूनियनों ने अल्पसंख्यकों और प्रवासी श्रमिकों को अधिकार दिलाने के लिए विशेष काम किए। भारत, चिली, कोलंबिया, घाना जैसे देशों में इन यूनियनों ने सराहनीय काम किए। कामकाजी महिलाओं के लिए कार्यस्थलों पर हुए सुधारों के लिए भी उन्हें श्रेय दिया गया।

यूरोप-अमेरिका में 4 से 6% तक बाल श्रमिक
रिपोर्ट के अनुसार, एशिया, प्रशांत, अरब, अमेरिका और यूरोप में 4 से 6% तक बच्चे बाल श्रम कर रहे हैं। अफ्रीका में यह सर्वाधिक 21.6% तो सब-सहारा अफ्रीका में 23.9%। भारत में बाल श्रम, जाति आधारित भेदभाव और गरीबी में गहरा संबंध बताया। रिपोर्ट ने दावा किया कि जिनके साथ समाज में काम और सम्मान को लेकर भेदभाव होता है, उन्हें नकारात्मक छवि दी जाती है। इसके पीछे मीडिया, किताबें, इंटरनेट और सामाजिक व्यवस्थाएं हैं।

मानव सम्मान और समानता जैसे बुनियादी कायदे भी इन लोगों के लिए लागू नहीं होते। इनकी आजादी सीमित कर दी जाती है, वे काम भी अपनी पसंद से नहीं चुन पाते। इसीलिए वे अक्सर बंधुआ श्रमिक बन पीड़ा भोगते हैं।

पाकिस्तान में सबसे ज्यादा जबरन विवाह जैसी कलंकित प्रथा

  • जबरन विवाह कराने वाले देशों में पाकिस्तान को रिपोर्ट ने सबसे ऊपर बताया। यहां का बहुसंख्यक मुसलमान अल्पसंख्यक समुदायों की लड़कियों की जबरन शादियां करवाते रहे हैं।
  • 2014 में इस्लामी स्टेट के आतंकियों ने 6,500 इराकी यजीदी अल्पसंख्यक महिलाओं और लड़कियों के अपहरण किए। इनसे युद्ध के दौरान दुष्कर्म हुए। आज भी इसमें से 2,800 लापता हैं या किसी न किसी आतंकी समूह के कब्जे में हैं।
  • बोको हराम का उदाहरण देकर बताया कि नाइजीरिया में भी ईसाई लड़कियों को जबरन मुसलमान बनाकर उनके विवाह करवाए जा रहे हैं। कंबरी और फुलफूदे जैसे क्षेत्रीय अल्पसंख्यक समूहों का उदाहरण दिया गया, जिनके एक-चौथाई तक बच्चों के विवाह करवाए जा रहे हैं।

उइगर मुसलमानों से बंधुआ मजदूरी करवाने के खुलासे पर बौखलाया चीन
विश्व में आज भी मौजूद गुलामी पर अपनी ताजा रिपोर्ट में यूएन ने चीन द्वारा उइगर अल्पसंख्यक मुसलमानों से बंधुआ मजदूरी करवाने का खुलासा किया। चीनी विदेश मंत्रालय ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई, इसे चीन-विरोधी ताकतों की बनाई रिपोर्ट कहा। चीन के विदेश मंत्रालय प्रवक्ता वांग विनबिन ने आरोप लगाया कि रिपोर्ट में शिनजियांग पर झूठी और भ्रामक जानकारी दी गई। अमेरिका, पश्चिमी देश व चीन विरोधी ताकतें झूठ फैला रही हैं। 

  • वांग विनबिन विशेष दूत परबी आरोप लगाया कि वे अपने पद का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं, चीन विरोधी ताकतों के लिए राजनीतिक औजार बन रहे हैं। शिनजियांग में समृद्धि, स्थायित्व और विकास आ रहा है, बंधुआ मजदूरी नहीं करवाई जा रही है।
  • रिपोर्ट की कड़ी निंदा होनी चाहिए। चीन अपने श्रमिकों के हितों का ध्यान रखता है। इनमें स्थानीय अल्पसंख्यक समूह भी शामिल हैं।

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