रणनीतिक अस्पष्टता या सौदेबाजी: ताइवान पर चीन का मूड भांप रहा है अमेरिका?

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, रोम Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 01 Nov 2021 07:14 PM IST

सार

पर्यवेक्षकों का अनुमान है कि अमेरिका के हाल में दिए गए अंतर्विरोधी बयानों के पीछे एक निश्चित रणनीति हो सकती है। मुमकिन है कि अपनी नीति को अंतिम रूप देने से पहले अमेरिका यह भांपना चाहता हो कि ताइवान के मामले में चीन किस हद तक जा सकता...
वांग यी और एंटनी ब्लिंकेन
वांग यी और एंटनी ब्लिंकेन - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार

अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ यहां हुई अपनी वार्ता में यह भरोसा दिया कि अमेरिका वन चाइना पॉलिसी (एक चीन नीति) पर कायम है। यानी ताइवान को अलग देश के रूप में मान्यता देने का उसका कोई इरादा नहीं है। लेकिन इस बातचीत के थोड़ी देर बाद अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन को दिए एक इंटरव्यू में ब्लिंकेन ने कहा कि हमला होने की स्थिति में ताइवान की रक्षा करने के लिए अमेरिका वचनबद्ध है। पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि ये दोनों परस्पर विरोधी हैं।  
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वन चाइना पॉलिसी पर सवाल  

चीनी मीडिया के मुताबिक वांग यी ने ब्लिंकेन के सामने दो टूक कहा कि अमेरिका और चीन के बीच मौजूदा टकराव अमेरिका की ‘गलत नीतियों’ के कारण पैदा हुआ है। उन्होंने कहा कि चीन के नजरिए में ताइवान अमेरिका और चीन के बीच सबसे संवेदनशील मुद्दा है। उन्होंने कहा- ‘मौजूदा हालत का सार यह है कि ताइवान के अधिकारियों ने वन चाइना ढांचे को तोड़ने की कोशिश की है और अमेरिका की ताइवान की आजादी की बात करने वाली ताकतों के साथ मिलीभगत है। अमेरिका उनका समर्थन करता है।’ वांग ने कहा- ‘हम चाहते हैं कि अमेरिका वास्तविक वन चाइना पॉलिसी का पालन करे, ना कि फर्जी वन चाइना पॉलिसी का।’


पर्यवेक्षकों का कहना है कि अमेरिका ने लंबे समय से ताइवान के मामले में ‘रणनीतिक अस्पष्टता’ की नीति अपनाए रखी थी। लेकिन हाल में उसका झुकाव ताइवान की आजादी समर्थक ताकतों के प्रति हो गया है। पिछले हफ्ते राष्ट्रपति जो बाइडंन ने कहा था कि अगर चीन ने ताइवान पर हमला किया, तो अमेरिका उसकी रक्षा के लिए आगे आएगा।

चीन के साथ सौदेबाजी

बीजिंग स्थित चाइनीज एकेडेमी ऑफ सोशल साइंसेज में रिसर्च फेलॉ लू शियांग ने हांगकांग के अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट से कहा- ‘रविवार को ब्लिंकेन ने जो बयान दिया, वह रणनीतिक अस्पष्टता के दायरे में आता है। लेकिन ऐसा लगता है कि अमेरिका एक मुद्दा खड़ा कर रहा है, ताकि चीन के साथ सौदेबाजी में उसका फायदा उठा सके। अमेरिका के हाथ में चीन के खिलाफ जो कार्ड हैं, उनमें ताइवान भी एक है।’

उधर अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नेड प्राइस ने कहा कि ब्लिंकेन ने चीन के कई कदमों के बारे में अपनी चिंता वांग को बताई। उन्होंने कहा- ‘चीन के ये कदम ऐसे हैं, जिनसे नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की अनदेखी होती है और जो हमारे और हमारे सहयोगी देशों के हितों और उसूलों के खिलाफ हैं। इनमें शिनजियांग प्रांत, तिब्बत, और हांगकांग में मानव अधिकार का हनन, और पूर्वी और दक्षिण चीन सागर और ताइवान में चीन के कदम शामिल हैं।’

पर्यवेक्षकों का अनुमान है कि अमेरिका के हाल में दिए गए अंतर्विरोधी बयानों के पीछे एक निश्चित रणनीति हो सकती है। मुमकिन है कि अपनी नीति को अंतिम रूप देने से पहले अमेरिका यह भांपना चाहता हो कि ताइवान के मामले में चीन किस हद तक जा सकता है। लेकिन पर्यवेक्षकों ने इसे सकारात्मक संकेत माना है कि इस बार की बातचीत कड़वाहट के साथ खत्म नहीं हुई। इसके विपरीत दोनों पक्षों ने अपनी बात खुल कर एक दूसरे के सामने रखी।

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