यूपी में 200 नई शाखाएं खोलने की तैयारी में महिंद्रा फाइनेंस, लाखों लोगों को मिलेगा रोजगार

अनंत पालीवाल, अमर उजाला Published by: यशवीर सिंह Updated Mon, 18 Mar 2019 11:06 AM IST
Ramesh Iyer, MD &VC, Mahindra Finance
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देश भर में फैले अपने लगभग 33 हजार कर्मचारियों और तकरीबन 60 लाख वित्तग्राहकों के साथ महिंद्रा फाइनेंस ग्रामीण क्षेत्र की सबसे बड़ी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) है। कंपनी के एमडी और वाइस चेयरमैन रमेश अय्यर मानते हैं उनकी कंपनी की कामयाबी का राज है ग्राम-समाज के साथ भावात्मक रिश्ता। वे कहते हैं कि कंपनी शहरों की बजाय गांव-कस्बों के लोगों को ही अपना कर्मचारी बनाती है। गांव-देहात में लोन लेने वाले मेहनती और भरोसेमंद होते हैं। बस उनसे सही संपर्क करने की जरुरत है।  इस स्पेशल कनेक्ट की बदौलत ही महिंद्रा फाइनेंस को अपने क्षेत्र में बढ़ती कंपीटीशन की कोई चिंता नहीं है। पेश है अमर उजाला संपादक (कंवर्जेंस) संजय अभिज्ञान के साथ उनकी बातचीत के प्रमुख अंश....
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पिछले करीब तीन दशकों में महिंद्रा फाइनेंस ने प्रभावशाली विस्तार किया है। आज देश के कुल लगभग छह लाख गांवों में से आधे से ज्यादा, यानी  तीन लाख 60 हजार गांवों में आपसे लोन वाले ग्राहक मौजूद हैं।  इस लंबी यात्रा में आपके क्या बड़े मुकाम रहे? 


नब्बे के दशक की शुरुआत में कंपनी ने काम शुरू किया था। सबसे पहला और सबसे अहम निर्णय हमें यह करना था कि गांवों में जाएं या शहरों में काम करें। हमने दूर की सोची। गांवों को चुना। वह फैसला सुनहरा साबित हुआ। हमने ट्रैक्टर फाइनेंसिंग से काम का आरंभ किया। फिर ट्रैक्टर के अलावा दूसरे कमर्शियल वाहनों की फाइनेंसिंग शुरू की। एक वक्त पर हमने गैर-महिंद्रा कंपनी के वाहनों के लिए भी फाइनेंस देना आरंभ किया।

आवश्यक लगा तो हमने सेकंड हैंड वाहनों की फाइनेंसिंग का भी श्रीगणेश कर दिया। साथ-साथ कंपनी की सहयोगी कंपनियां खोलने का भी काम चलता रहा। आज हमारी एक हाउसिंग फाइनेंस कंपनी है। एक बीमा कंपनी है।

तीन साल पहले हमारा म्यूचुअल फंड बाजार में आया है। चारों कंपनियां ग्रामीण ग्राहकों की आवश्यकताओं के हिसाब से ही स्कीमें पेश करती हैं। गांव का कस्टमर ही हमारा असली कस्टमर है। देहात की अर्थव्यवस्था का ही कमाल है कि आज देश के हर दूसरे गांव में आपको महिंद्रा फाइनेंस से लोन वाला कोई कस्टमर मिल जाएगा। 

लेकिन इतनी बड़ी फाइनेंस कंपनी ने देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश के गांवों की सुध क्यों नहीं ली? बाकी राज्यों के मुकाबले यूपी में आपकी मौजूदगी खासी सीमित ही है। 

देखिए, आज भी यूपी में हमारी तकरीबन सौ शाखाएं काम कर रही हैं।  बताना चाहूंगा कि अगले दो सालों में हम 200 नई शाखाएं अकेले यूपी में ही खोलने जा रहे हैं। उनसे हजारों ग्रामीण लोगों को रोजगार मिलेगा। उत्तर प्रदेश को कोई नजरंदाज नहीं कर सकता। मैँ मानता हूं कि तीन साल बाद हमारी बैलेंसशीट में आय का लगभग एक चौथाई हिस्सा उत्तर प्रदेश से आ रहा होगा। यूपी को लेकर हम बहुत गंभीर हैं। 

लेकिन शुरुआत में, देहात में काम करने की चुनौतियां तो बहुत रही होंगी? 

बेशक, सबसे पहली चुनौती तो यही थी कि हम ग्रामीण ग्राहक को समझते ही नहीं थे। बस किसानों को ट्रैक्टर बेचने का तजुर्बा था। कंपनी अपने पुराने डीलरों की मार्फत उन तक पहुंच तो गई लेकिन उससे आगे का सफर हमें खुद ही तय करना था।  

कल्पना कीजिए हमें ऐसे कस्टमर के साथ काम करना था जिसके पास  कोई बैंक खाता या फाइनेंशल स्टेटमेंट नहीं होती थी। कोई नियमित आय  नहीं होती थी। गिरवी रखने के लिए कीमती चीज या संपत्ति भी अक्सर नहीं होती थी।

ऐसे में सिर्फ और सिर्फ विश्वास की बदौलत आपको उसे लोन देना था। एक चुनौती यह थी कि कर्मचारियों का सही चुनाव कैसे हो। हमें गांव में कारोबार के लिए गांव की समझ रखने वाले लोग चाहिए थे। गांव-कस्बे की भाषा बोलने वाले लोग ही चाहिए थे। शहर में पले-बढ़े लोग हमारे उतने काम के नहीं थे। एक बड़ी समस्या यह थी कि हमारे देहाती कस्टमरों का ज्यादातर लेनदेन कैश में ही होता था। होता था क्या, हकीकत में तो आज भी हमारा लेनदेन नकद में ही ज्यादा होता है। 

तो किस रणनीति से चुनौतियों का सामना किया? 

हमने एक ही मूलमंत्र बनाया।  अपने ग्राहक की कमाई में हरसंभव मदद करो। हमने एक `अर्न एंड पे` यानी `कमाओ और चुकाओ` वाला मॉडल विकसित किया। मतलब हम आश्वस्त थे कि लोन कमाई के साधन ट्रैक्टर या ट्रक आदि के लिए लिया जा रहा है। इसलिए हमारे लोन से जो भी चीज खरीदी जा रही है वही हमारा लोन चुकाने में मदद करेगी। दूसरा मूलमंत्र यही था कि लोकल लोगों को ही नौकरी दो। स्थानीय भाषा में बात करने वाले लोग ही भर्ती करो। गांव के रंग में ही रचने बसने वाले लोग ही काम पर लगाओ। 

लेकिन जिस मुल्क में लोन माफी एक फैशन बन चुकी थी और जब तमाम बैंक एनपीए या फंसे हुए कर्जों की समस्या से जूझ रहे थे, तब आपने यह कैसे सुनिश्चित किया कि किसान वक्त पर कर्ज लौटाएं? मतलब रिकवरी की समस्या को कैसे सुलझाया? 

यहीं आकर हम बाकी कंपनियों से अलग थे। हमने रिकवरी की चिंता की ही नहीं। हम यह सोचते ही नहीं थे कि पैसा कब और कैसे वापस आएगा। हम बस इसकी चिंता करते थे कि लोन लेने वाला हमारा देहाती भाई पैसा कमाएगा किस तरह। अगर उसकी कमाई तय है तो फिर कर्ज का भुगतान भी तय है। याद रखिए अगर किसी ग्राहक ने पैसा नहीं चुकाया तो यह उसकी नहीं हमारी असफलता है। इसका मतलब हमने सही व्यक्ति का चुनाव नहीं किया। हमारी जजमेंट में कमी रही।

किसी भी फाइनेंस कंपनी को तीन बातों का ध्यान रखना होता है -- किसको लोन दिया, क्यों दिया और किस साधन के द्वारा दिया। अगर इन तीनों सवालों का जवाब स्पष्ट है तो फिर इसकी चिंता की जरुरत ही नहीं होगी कि लोन वापस आएगा कि नहीं।

वैसे हमारा तजुर्बा यह है कि गांव के लोग मेहनती और काम धंधे को समर्पित होते हैं। मैं हमेशा कहता हूं कि वे शहरियों के मुकाबले कम शिक्षित मगर ज्यादा समझदार होते हैं। जरुरत बस यह है कि उन पर भरोसा किया जाए और उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया जाए। 

इसे थोड़ा और स्पष्ट करेंगे? 

बिलकुल। देखिए दो तरह के डिफाल्ट होते हैं। एक परिस्थितिजन्य और दूसरा, गलत मंशा वाले। ज्यादा बारिश या सूखे से फसल तबाह हुई तो ऐसे में होने वाला डिफाल्ट परिस्थितिजन्य होता है और उसमें ग्राहक की कोई गलती नहीं। यहां कंपनी को समझना होगा। लेकिन कर्ज अगर गलत मंशा से दबाया गया है यानी इंटेशनल डिफाल्ट है तो इसमें फिर कंपनी के गलत चुनाव वाली बात आ जाती है।

महिंद्रा फाइनेंस का आग्रह यह होता है कि अगर कर्ज नहीं चुका पा रहे हो तो घर में छुपो मत। आकर कंपनी में बात करो। कंपनी जो लचीलापन चाहिए, वह दिखाएगी। इस एहतियात का ही नतीजा है कि हमारी कर्ज वसूली दर बहुत अच्छी है। हम कस्टमर के साथ साझेदारी वाली अप्रोच यानी पार्टनरशिप वाली सोच रखते हैं। उसकी असफलता को अपनी मानते हैं इसलिए उसके साथ हमारी गाड़ी अच्छी चल जाती है। 

वर्तमान में कंपनी के कौन-कौन से उत्पाद हैं और किस तरह के लोन आप मुहैया कराते हैं?

हमारी कंपनी  ट्रैक्टर, ट्रक, सेकंड हैंड गाड़ियां, एलसीवी आदि को फाइनेंस करती है।  हमारी एक हाउसिंग फाइनेंस कंपनी भी है जो गांवों में  छोटे कर्जे देती है। छोटा सा एक या दो कमरों का मकान बनाने को अथवा घर में विस्तार  के लिए या फिर  टायलेट आदि बनवाने के लिए।  हम केवल एक से दो लाख रुपये का लोन इसके लिए देते हैं जिनकी अवधि तीन से पांच साल के बीच है। इसके साथ ही हम लोगों को बीमा उत्पाद (जीवन और संपत्ति) और म्यूचुअल फंड में एसआईपी के जरिए निवेश का मौका देते हैं।

ग्रामीणों को सलाह देते हैं कि वे समूह बीमा या फिर स्वास्थ्य बीमा भी लें।  म्यूचुअल फंड के लिहाज से हम समझते हैं कि गांव में लोगों के पास निवेश के लिए बहुत पैसा है। पहले वे केवल सोना खरीदना ही बेहतर समझते थे।  

हम लोगों को एफडी कराने का मौका भी देते हैं।  लघु व सूक्ष्म उद्योग लगाने वाले कारोबारियों को भी हम लोन दे रहे हैं। उनमें हम एग्रो इंडस्ट्री, ऑटो और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में आने वाले छोटे उद्योगों को तरजीह देते हैं। 

इसके अलावा हम अपने कुछ खास ग्राहकों,  जिन्होंने समय से 10-12 किश्त जमा की हैं, उनको पर्सनल (व्यक्तिगत) लोन भी देते हैं। यह लोन फसल बीमा, बच्चों की शादी, पढ़ाई और घर के सदस्यों के इलाज आदि के लिए हो सकता है।

हम एक फाइनेंस कंपनी हैं, लेकिन हमारे सारे उत्पाद ग्राहकों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तैयार किए गए हैं। हमारा एक मूलमंत्र यह भी है कि हम उत्पाद तैयार करके ग्राहक नहीं ढूंढते हैं। ग्राहक खोजकर उनकी आवश्यकताओं के हिसाब से उत्पाद तैयार करते हैं। 
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