पंजाब: चरणजीत सिंह चन्नी के सहारे सिद्धू का दोहरा दांव, अब सीएम भी सुनेंगे और दलित भी सधेंगे

अभिषेक वाजपेयी, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: ajay kumar Updated Mon, 20 Sep 2021 07:31 AM IST

सार

चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री घोषित कर कांग्रेस ने बड़ी सियासी चाल चली है। भाजपा ने 2022 विधानसभा चुनाव में दलित नेता को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा की है। शिअद ने डिप्टी सीएम का पद दलित समुदाय को सौंपने की बात कही लेकिन चुनाव से ठीक पहले दलित चेहरे को मुख्यमंत्री बना कांग्रेस ने दोनों दलों की सियासी चाल पर पानी फेर दिया है।
नवजोत सिंह सिद्धू और चरणजीत सिंह चन्नी।
नवजोत सिंह सिद्धू और चरणजीत सिंह चन्नी। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

कैप्टन अमरिंदर सिंह को शिकस्त देने के बाद कांग्रेस प्रधान नवजोत सिंह सिद्धू मझे हुए नेता के रूप में दिखाई देने लगे हैं। चन्नी के सहारे सिद्धू ने दोहरा दांव चलकर कई राजनीतिक दिग्गजों को पटखनी दे दी। सूबे के नए मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी अब सिद्धू की सुनेंगे भी और 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में सूबे के 32 प्रतिशत दलित वोट को साधने में भी मदद मिलेगी।
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सिद्धू के इस दोहरे दांव से पंजाब भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के मुद्दे को भी करारी शिकस्त दी है। इधर चन्नी के नाम पर सिद्धू की सहमति होने की एक बड़ी वजह यह भी है कि अब वह संगठन के साथ ही सरकार में भी दखल रख सकेंगे। 


कैप्टन के खिलाफ बगावत में भी चन्नी ने अहम भूमिका निभाई थी। कांग्रेस प्रधान बनने के बाद चमकौर साहिब के दौरे के वक्त चन्नी ने सिद्धू को घर बुला लिया था और कांग्रेस प्रधान पूरी गर्मजोशी के साथ स्वागत किया था। पार्टी के सूत्रों के अनुसार यदि सुखजिंदर रंधावा सीएम बन जाते तो 2022 में होने वाले विधानसभा चुनावों का नेतृत्व करने में भी सिद्धू को परेशानी होनी थी, जिसको देखते हुए सिद्धू ने रंधावा के नाम का विरोध किया।



पंजाब का ये है जातीय समीकरण
पंजाब में सिख वोटर सबसे अधिक है। 58 प्रतिशत सिख वोटर किसी भी पार्टी की जीत हार में बड़ी भूमिका निभाता है। दूसरे नंबर पर हिंदू लगभग 38 प्रतिशत और तीसरे नंबर पर 32 प्रतिशत दलित वोटर आता है। कांग्रेस ने दलित सीएम की घोषणा कर जातीय ध्रुवीकरण करने की कोशिश की है। मुस्लिम, ईसाई और अन्य के 11 प्रतिशत के करीब वोटर सूबे में हैं।

दो हिस्सो में बंटा है दलित
पंजाब में दलित दो हिस्सो में बंटा है। यहां रविदासी और वाल्मीकि दो बड़े वर्ग दलित समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाला दलितों का बड़ा हिस्सा डेरों से जुड़ा हुआ है। चुनाव के समय भी यह डेरे बड़ी अहम भूमिका निभाते हैं। जबकि दोआबा क्षेत्र में रहने वाले अधिकांश दलित परिवारों का एक सदस्य एनआरआई है। इस नाते वह आर्थिक रूप से काफी सपन्न भी हैं।

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