कैप्टन का 52 साल का राजनीतिक सफर: कई दिग्गजों को दी सियासी पटखनी, प्रदेश अध्यक्षों से भी नहीं बनी, पहली बार मानी हार

सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब) Published by: ajay kumar Updated Sun, 19 Sep 2021 03:23 AM IST

सार

कैप्टन अमरिंदर सिंह के बारे में अक्सर यह कहा जाता रहा कि वो महाराजा स्टाइल में काम करते हैं। उनसे मिलना बहुत मुश्किल है। यहां तक कि विरोधी उन पर फार्म हाउस से सरकार चलाने के आरोप लगाते रहे हैं। हालांकि, कैप्टन ने इसके बाद तालमेल के लिए कुछ सलाहकार भी नियुक्त किए। विधायकों की बात सुनने के बजाय सलाहकार टकराव करने लगे। इसके बाद कैप्टन के खिलाफ पूरा सियासी जाल बिछता चला गया। 
कैप्टन अमरिंदर सिंह और राहुल गांधी
कैप्टन अमरिंदर सिंह और राहुल गांधी - फोटो : फाइल
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विस्तार

अपने विरोधियों को कमजोर करके साइड लाइन करने में माहिर कैप्टन अमरिंदर सिंह 52 साल के राजनीतिक सफर में पहली बार खुद ही हार गए। पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह की ही कई कमजोरियां रहीं, जिनको मुद्दा बनाकर विरोधियों ने उनकी कुर्सी पर संकट खड़ा करने की पटकथा तैयार की। अकाली दल के प्रति नर्मी समेत बेअदबी केसों, नशाखोरी और अफसरशाही के राज में कांग्रेस विधायकों की नाराजगी इस कदर बढ़ी कि कैप्टन अमरिंदर सिंह को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी।
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भट्ठल, दूलो, बाजवा व केपी को सियासी कमजोर किया कैप्टन ने
वर्ष 1998 में जब कैप्टन अमरिंदर सिंह की कांग्रेस में एंट्री हुई तो पंजाब में पूर्व सीएम राजिंदर कौर भट्ठल और शमशेर सिंह दूलो का दबदबा था। सबसे पहले कैप्टन ने दोनों को पंजाब की सियासत से खत्म किया। वर्ष 2002 में कांग्रेस ने कैप्टन के नेतृत्व में प्रचंड जीत हासिल की और पांच साल सरकार चलाई। 


2007 के बाद मोहिंदर सिंह केपी प्रधान बने तो कैप्टन ने उनको भी फेल कर दिया और संगठन में अपना दबदबा कायम रखा। प्रताप बाजवा हों या शमशेर सिंह दूलो या राजिंदर कौर भट्ठल या फिर केपी, कैप्टन ने किसी विरोधी को सर उठाने का मौका तक नहीं दिया। नवजोत सिंह सिद्धू की कांग्रेस में एंट्री के बाद कैप्टन दिन प्रतिदिन कमजोर होते चले गए। हुआ ऐसा कि उनका अपना कुनबा ही बिखर गया। 
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नदियों के बंटवारे में अड़े कैप्टन

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