फादर्स डे पर पांच कहानियां: किसी के लिए रोल मॉडल हैं पापा तो कोई बोला- मैं जो भी हूं उन्हीं की वजह से

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मोहाली (पंजाब) Published by: ajay kumar Updated Sun, 20 Jun 2021 07:36 PM IST

सार

नसीब वाले हैं जिनके सर पर पिता का हाथ होता है.. जिद पूरी हो जाती है सब अगर पिता का साथ है। हर मुसीबत से मुकाबला कर अपने बच्चों की झोली में खुशियों से भरने वाला पिता ही होता है। हर पिता की दिली ख्वाहिश होती है कि उसका बच्चा उससे भी ज्यादा कामयाब हो। हर बाप का एक ही सपना होता है कि उसके बच्चों का कद इतना ऊंचा हो कि लोग उन्हें बच्चों के नाम से जानें।
सरबजीत कौर बेटी, बेटे और पति के साथ।
सरबजीत कौर बेटी, बेटे और पति के साथ। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

जैसे ही कोरोना की दूसरी लहर ने अपना आतंक मचाना शुरू किया। उसी दौरान 13 अप्रैल को मेरे 83 वर्षीय पिता अमिया कुमार घोष कोरोना संक्रमित हो गए। मैं खुद उनकी देखरेख का जिम्मा संभाल रहा था, ऐसे में मुझे भी कोरोना हो गया। दोनों पिता-पुत्र अस्पताल पहुंच गए। 
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इस दौरान डॉक्टर तो अपना काम कर रहे थे लेकिन मैंने कुछ हटकर सोचा। अपने वार्ड में संक्रमितों को डाइट से लेकर मास्क पहनने तक के लिए जागरूक किया। नतीजा यह हुआ है कि मरीज जल्दी तंदुरुस्त होकर घर लौटने लगे। यह कहना है मोहाली के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सम्राट घोष का। 


डॉ. सम्राट बताते हैं कि कोरोना से जंग आसान नहीं थी लेकिन शुरू से ही उनके पिता और वह आशावादी बने रहे। जब कोरोना चीन और इटली में कहर मचा रहा था तो वह सभी चीजें टीवी या इंटरनेट पर देखते थे। खुद अपनी लैब में घंटों इन चीजों पर रिसर्च करते थे। 

नतीजा यह हुआ कि इस दौरान उन्होंने कई छोटे-छोटे घरेलू जुगाड़ तैयार किए। जिससे कि संक्रमित होने पर उन्हें खुद को तो मदद मिली ही, वहीं दूसरों के लिए भी सहारा बने। इतना ही नहीं लोग कोविड से कैसे बचे। इस संबंधी वीडियो बनाकर अपलोड किए। साथ ही उनके आस पड़ोस में जरूरतमंद लोग थे, उनको मोटिवेट किया।  

पिता बनकर बच्चों को उनके लक्ष्य तक पहुंचाऊंगी

हमने भी अपने बच्चों के लिए सपने देखे थे। काफी बढ़िया जिंदगी चल रही थी लेकिन कोरोना महामारी ने बड़ा गहरा जख्म दिया है। जो अब कभी नहीं भरेगा। मेरे पति कोरोना से जिंदगी हार गए। यह कहना है फेज-2 निवासी सरबजीत कौर का। उन्होंने बताया कि समय भले ही मुश्किल चल रहा है लेकिन वह अपने बच्चों को पिता बनकर उनके मुकाम तक पहुंचाकर ही दम लेंगी। 


                                                    डॉ. सम्राट घोष अपने पिता के साथ।

सरबजीत कौर ने बताया कि उनके पति चरनजीत सिंह 45 साल के थे। वह पोल्ट्री सप्लायर का काम करते थे। उनके दो बच्चे बेटी 10 और बेटा 7 साल का है। दोनों नामी कान्वेंट स्कूल से पढ़ाई कर रहे हैं। जबकि वह गृहिणी हैं। घर काफी अच्छा चल रहा था। 13 मई को अचानक उनके पति को बुखार हुआ। उनकी तबीयत बिगड़ गई, इसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया। यहां उन्हें कोविड होने का पता चला। इसके बाद 24 मई को उनकी मौत हो गई। 

उन्होंने बताया कि उनकी मौत के बाद सब कुछ बदल गया है। हर रोज उनके सामने नई परीक्षा आ रही है। वह अब बच्चों की पढ़ाई और अन्य चीजों को लेकर उन पर बड़ी जिम्मेदारी है। वह प्रशासन या पंजाब सरकार से गुहार लगाएंगी। उन्हें उम्मीद है कि जल्द ही उनके दर्द को समझा जाएगा। हालांकि वह अन्य स्तर पर जंग जारी रखेंगी।

आज मैं जो कुछ भी हूं, पिताजी आपकी वजह से संभव हो पाया: डीएसपी गुरशेर सिंह संधू

आज मैं इस मुकाम पर पहुंच पाया हूं तो यह मेरे पिता की वजह से संभव हो पाया है। हमारा गांव भारत-पाकिस्तान बार्डर से लगते जिले तरनतारन में है। मेरे पिता गुरमुख सिंह बिजली विभाग में एसडीओ थे। चाहते थे कि उनके बच्चे पढ़ाई करके अच्छे पदों पर जाएं। ऐसे में उन्होंने 1992 में अपना गांव छोड़ने का फैसला लिया, इसके बाद वह हमें लेकर स्पोर्ट्स नगरी जालंधर आ गए। यहां के नामी कान्वेंट स्कूल सेंट जोसफ में दाखिल करवा दिया गया, यहीं मैंने स्कूलिंग पूरी की। फिर पिता के मार्गदर्शन में मैं कानून की पढ़ाई करने के लिए चंडीगढ़ पहुंचा। 

पीयू में एंट्रेस देने के बाद दाखिला मिल गया। यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान 21 साल की उम्र में बीएसएफ ज्वाइन की। लेकिन पिता से लगाव बहुत ज्यादा था और नौकरी घर से दूर करनी पड़ रही थी। ऐसे में मैंने पंजाब सरकार की ऑफिसर रैंक की भर्ती प्रक्रिया में किस्मत आजमाई।

25 साल की उम्र में पीपीएस (पंजाब पुलिस सर्विसेज) की परीक्षा पास की और साथ ही मोहाली में बतौर डीएसपी तैनात हुआ। मेरे पिता मेरे परमात्मा से भी बढ़कर हैं। मैंने उनसे जो भी इच्छा जाहिर की उन्होंने पूरी की। - गुरशेर सिंह संधू, डीएसपी सिटी-1, मोहाली।

कोविड काल में समझा पापा की ड्यूटी को, वहीं हैं मेरे आदर्श

कोविड काल में पापा देर रात तक ड्यूटी पर रहते थे। सब जगह लॉकडाउन था। सरकार लोगों को घरों में रोक रही थी लेकिन पापा की ड्यूटी उतनी सख्त होती जा रही थी। वह कब घर आए और कब चले गए पता ही नहीं चलता था। हालत यह थी कि कई बार तो हमारे सोने के बाद पापा आते थे और सुबह जल्दी चले जाते थे। बस, कुछ इसी अंदाज में पीजीआई में तैनात मनोचिकित्सक विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर कृष्ण कुमार सोनी की 14 वर्षीय बेटी पीहू सोनी ने अपने पिता की जिम्मेदारियों को बताया। 

पीहू का कहना है कि जब कोरोना ने दस्तक दी थी तो वह हर समय पापा को लेकर चिंता में रहती थीं। लेकिन बाद में पापा ने समझाया कि हमारा प्रोफेशन ऐसा है कि उन पर ही लोगों की उम्मीदे हैं। हम ही ऐसे हालात में काम नहीं करेंगे तो देश को महामारी से कैसे बचाएंगे।पीजीआई में दूर प्रदेशों से लोग उम्मीदों के साथ आते हैं। ऐसे में उन्होंने पापा की बात को समझा। इसके बाद वह उनका रात तक इंतजार करते थे। कई बार तो वीडियो कॉल पर हाल जानते थे। 


                                                     पिता के साथ डीएसपी गुरशेर सिंह।

मेरे लिए मेरे पापा ही रोल मॉडल 
कोविड काल में मरीजों का इलाज और वैक्सीनेशन की जिम्मेदारी निभा रहे डॉ. भूषण के बेटे अनिरुद्ध भूषण ने कहा कि उनके लिए उनके पापा ही रोल मॉडल हैं। उन्होंने कोरोना काल में कई मरीजों को नया जीवन दिया है। अनिरुद्ध ने बताया कि उन्हें बैडमिंटन खेलने का शौक है और बैडमिंटन अकादमी में प्रैक्टिस करते थे। इसी दौरान मुझे कोरोना हो गया। 

पापा को पता चला तो उन्होंने ने तुरंत टेस्ट करवाया और जिस दिन रिपोर्ट आनी थी मुझे 103 बुखार था। उस दिन पापा ने बिजी होने बाद भी ऑफिस से छुट्टी ली और पूरा दिन मेरा ख्याल रखा। पांच दिन बाद जब मैं ठीक हो गया तो देखा मेरे साथ-साथ मम्मी और बड़े भाई को भी कोरोना हो गया था। ऐसे में पापा ही थे जो हम तीनों का ध्यान रख रहे थे। अनिरुद्ध ने बताया कोविड से मम्मी की हालात ज्यादा बिगड़ गई और उन्हें फेफड़ों में 25 प्रतिशत इंफेक्शन हो गया था, पापा ने हमारे साथ मम्मी के इलाज की जिम्मेदारी संभाली। अनिरुद्ध ने बताया कि पापा काम में बहुत व्यस्त रहते हैं लेकिन वह वीडियो कॉल करना कभी नहीं भूलते।
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