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बेटी को सलाम! लाइलाज बीमारी, फिर भी जीत लाई गोल्ड मेडल

आशीष वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Wed, 19 Aug 2015 01:52 PM IST
salute to diabites type one girl patient, won gold medal in table tennis
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इस बेटी को आप भी सलाम करेंगे। लाइलाज बीमारी से जूझ रही है, उसके बावजूद हिम्मत नहीं हारी और टेबल टेनिस में गोल्ड जीत लाई। टाइप वन डायबिटीज का फिलहाल कोई इलाज नहीं है। यदि एक बार किसी बच्चे को हो जाए तो उसे उम्र भर दर्द झेलना पड़ता है। नार्मल बच्चों के मुकाबले डायबिटीज पीड़ित बच्चों का जीवन कठिन होता है।
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इसके चलते किसी भी कामयाबी को हासिल करना आसान नहीं है, लेकिन सेक्टर 44 की अनीषा ने सभी मुश्किलों को पार कर ऐसा मुकाम हासिल किया है, जो उसके जैसे पीड़ित बच्चों का हौसला बढ़ाती है और उन्हें एक नई राह भी दिखाती है। तमाम बाधाओं को पार करते हुए अनीषा ने टेबल टेनिस की स्टेट लेवल की स्पेशल ओलंपिक में गोल्ड पदक जीता है।


सेक्टर 44 में निवासी 16 वर्षीय अनीषा जब सात महीने की थी, तभी पेरेंट्स को पता चला कि उनकी बेटी उस बीमारी से पीड़ित है, जो कभी ठीक नहीं हो सकती। कुछ पल के लिए लगा कि जो सपने उन्होंने बेटी के लिए देखे थे, वे चूर हो गए, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और बेटी के साथ बीमारी का डट कर मुकाबला करने के लिए तैयार हो गए। अनीषा की मां रिमी ने बताया कि उनकी बेटी की शरीर में इंसुलिन नहीं बनती, इसलिए उसे बाहर से सीरिंज के माध्यम से इंसुलिन देनी पड़ती है।

पहले इंसुलिन देने में काफी तकलीफ होती थी। अनीषा के साथ पेरेंट्स के आंखों से भी आंसू निकल आते थे। लेकिन दर्द धीरे-धीरे आदत में बदल गया। अनीषा बचपन से ही काफी जज्बे वाली लड़की है। पेरेंट्स की कोशिश रहती है कि कभी भी उसे इस बात का अहसास न होने दें कि वह किसी गंभीर रोग से पीड़ित है। यही कारण है कि जब भी कोई अनीषा से मिलेगा तो पहली मुलाकात में पहचान पाना मुश्किल होगा कि उसे कोई रोग है।

आई क्यू लेवल भी कम और थायराइड भी

रिमी ने बताया कि उनकी बेटी का आई क्यू लेवल भी कम है। अन्य बच्चों की तुलना में उसका आई क्यू लेवल का स्तर सिर्फ 70 प्रतिशत है। इसके अलावा कुछ साल पहले ही पता चला कि अनीषा को थायराइड की बीमारी भी है। अनीषा भवन विद्यालय में स्पेशल बच्चों की क्लास में पढ़ती है। इसके अलावा वह दसवीं के ओपेन बोर्ड की एग्जाम की तैयारी भी कर रही है।

नेशनल स्तर पर ब्रांज मेडल जीता

नेशनल स्तर पर भी अनीषा ने अपने जज्बे की छाप छोड़ी। पिछले साल बांबे में बैडमिंटन प्रतियोगिता में भी उसने ब्रांज मेडल जीता। इसके लिए उसने बाहर से कोचिंग भी ली थी। स्कूल में उसके टीचर गीता बजाज व स्पोर्ट्स टीचर उसे काफी सपोर्ट करते हैं। उसका इलाज पीजीआई के इंडोक्राइनोलाजी डिपार्टमेंट में चल रहा है। पिछले दिनों डिपार्टमेंट की एचओडी डा. अनिल भंसाली, संजय बडाडा ने उसे सम्मानित किया। इस मौके पर डायबिटिज एजुकेटर अनिल कुमार भी मौजूद रहे।

क्या होता है टाइप वन डायबिटीज

डॉक्टरों के मुताबिक टाइप वन डायबिटीज होने के सही कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है। टाइप वन डायबिटीज बीमारी ऑटो इम्यून डिजीज है। जब शरीर के अंदर इंसुलिन बनाने वाली सेल्स के खिलाफ एंटीबॉडीज बनने लगती हैं तो शरीर में इंसुलिन बनना बंद हो जाता। इससे ब्लड में ग्लूकोज (शुगर) की मात्रा कंट्रोल में नहीं रहती। शुगर को कंट्रोल करने के लिए मरीज को बाहर से इंसुलिन लेनी पड़ती है। टाइप वन डायबिटीज ज्यादतर 5 साल से लेकर 20 साल तक की उम्र में ज्यादा देखने को मिलती है।

टाइप वन डायबिटीज के लक्षण

- हाथ पैर कांपने लगना
- घबराहट होना
- दिल की धड़कनें तेज हो जाना
- पसीना अधिक आना
- सिर दर्द होना
- अगर समय पर कुछ खाने को न लें तो कन्फ्यूजन होना

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