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अलविदा 2020: सपनों की तलाश में महानगर पहुंचा युवा अब क्यों लौट जाना चाहता है अपने गांव और शहर?

Bhawna Masiwal भावना मासीवाल
Updated Tue, 29 Dec 2020 02:44 PM IST
दुनिया में हर आदमी अपने भीतर एक पीड़ा लिए घूम रहा है
दुनिया में हर आदमी अपने भीतर एक पीड़ा लिए घूम रहा है - फोटो : pixabay
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मनुष्य की स्मृति में और शताब्दियों के प्रवाह में साल 2020 कोरोना के कारण याद रहेगा। महामारियों और संक्रामक प्राणघातक बीमारियां मनुष्य सभ्यता की स्मृतियों में काले इतिहास के रूप में दर्ज है। यह साल भी कोरोना महामारी और उससे उपजी पीड़ा की याद हमेशा दिलाता रहेगा। हालांकि महामारी का संकट अभी टला नहीं है और हम नए साल 2021 की दहलीज पर खड़े हैं।

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साल 2020 में कोरोना ने भय के साथ ही जो प्रति पलायन दिया है वह मनुष्य को उसकी जड़ों की ओर लौटने नहीं बल्कि भागने के लिए मजबूर होने की भी याद दिलाता रहेगा। पहले से ही महानगरीय जीवन की आपा-धापी, संघर्ष और अस्तित्व के साथ पहचान के संकट से जूझ रहा युवा क्या महामारी की इस काली छाया में दोबारा सपनों के लिए शहरों की लौटेगा?


दरअसल, लौटना हो तो अभी लौटना उन छूटी जड़ों की तरफ जो आपको अपने भीतर कचोट रही हैं। एक लंबा रास्ता है जो आता है पर वापस नहीं जाता! हम सभी आने और जाने के इसी फेर में घिरे हैं। यहां हर कोई आने के बाद, वापस जाने की चाहत लिए है! पर किसी में चाहत को पूरी करने की हिमाकत नहीं है। कोई बिरला ही होता है जो आने के बाद जाने का रास्ता तय कर पाता है। बाकी सब तो जिंदगी और ज़रूरत के बीच दबकर सोचते ही रह जाते हैं। इसी वजह से हमारी जड़ें हमसे छूट गई और छूट रही हैं।

दुनिया में हर आदमी अपने भीतर एक पीड़ा लिए घूम रहा है
उन छूटी जड़ों को जीने के लिए हम सभी लौटना चाहते हैं। हम अपने भीतर छटपटाहट लिए! बैचेनी से घिरे हैं। लौटने के आवेश में शांत होते हुए! दफ्तरों, विश्वविद्यालयों, फैक्ट्रियों, होटलों, चमचमाती बिल्डिगों और फुटपाथ, कहां नहीं हैं हम। सब जगह तो मौजूद है जो वापस लौटना चाहते हैं- किसी शहर, महानगर, कस्बे और सूबे से। इस दुनिया में हर आदमी अपने भीतर एक पीड़ा लिए घूम रहा है।

वह पीड़ा में ही खुश होता और पीड़ा को ही जीते हुए आगे बढ़ रहा है! उसके चेहरे की मुस्कुराहट उसके भीतर के शांत समुद्र की पहचान है। जो ऊपर से शांत मगर भीतर से कोलाहल से भरा है।

पिछले कई दिनों से ऐसे कई लोगों से मेरी मुलाकात हुई। जो जहां हैं वहां से अपने शहर, अपने गांव और अपने घर लौटना चाहते हैं। लौटने की इस बात के आते ही उनकी आंखों में चमक आ जाती है और यह चमक जब भविष्य की चिंता के साथ मिलती है तो धुंधली हो जाती है। क्योंकि लौटना कहने से कहीं अधिक मुश्किल था लौटना।

ये किस्सा किसी एक का नहीं, बल्कि हर व्यक्ति का जीवन इन्हीं अनुभवों से टूटा...संभला..फिर बढ़ा है। 
ये किस्सा किसी एक का नहीं, बल्कि हर व्यक्ति का जीवन इन्हीं अनुभवों से टूटा...संभला..फिर बढ़ा है।  - फोटो : pixabay
घर में बड़े बूबू (दादाजी) थे जिनकी बातें याद आती हैं। उन्होंने 15 की उम्र में पहाड़ से दिल्ली की तरफ रुख किया था। हम झगड़ते, क्यों इतना सुंदर गांव छोड़? क्यों यहां इतनी भीड़भाड़ और प्रदूषण में आ गए? वह अतीत की यादों में सवार बोलते- ''नहीं आता तो घर परिवार को कहां से खिलाता? बाज्यू 8 साल की उम्र में चल बसे थे। अकेली मां कब तक ज़िम्मेदारी उठाती। अगर उस वक्त किसी ने सहारा दिया होता तो शायद...। उनकी आंखे नम हो जाती। बहुत बार सोचा लौट जाऊं... मगर रोटी और परिवार ने बांध लिया।''

ये किस्सा किसी एक का नहीं, बल्कि हर व्यक्ति का जीवन इन्हीं अनुभवों से टूटा...संभला..फिर बढ़ा है। 

मैंने कहा- 'आप लौट क्यों नहीं जाते फिर'
इसी क्रम में मुलाकात एक अन्य व्यक्ति से हुई जो संपन्न और खुश थे। बड़ी गाड़ी थी, अच्छे कपड़े पहने थे, बच्चे और पत्नी भी थी। कहने का तात्पर्य उसे देखकर मुझे लगा कि उसका संसार कितना खुशहाल है।

लेकिन जो संसार दिख रहा था और जिसे देखकर मैं उनकी खुशी के बारे में सोच रही थी, वह क्षणिक था। इस बात का मुझे बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था। वह सर्वसंपन्न व्यक्ति अपने गांव लौटना चाहता था। उसके भीतर यह छटपटाहट इतनी तीव्र थी कि कुछ ही देर की मुलाकात में उन्होंने मुझे लौटने का पूरा खांका सुना डाला। खांका सुनाते हुए उनके चेहरे पर जो खुशी झलक रही थी उसे देखकर लग रहा था कि बड़े दिनों बाद, वह भीतर से प्रसन्न हुए हैं!!  मैं उन्हें सुन रही थी और वह बता रहे थे कि उन्हें उस रास्ते से ही वापस जाना है जिससे उसने इस बड़े शहर में कदम रखा था। जब मैंने कहा- 'आप लौट क्यों नहीं जाते फिर'....
 

मेरे इस सवाल ने उसके भीतर एक अजीब निराशा भर दी। कुछ देर शांत रहने के बाद उन्होंने न लौट पाने की लौटने से ज्यादा वजह गिना दी।
मेरे इस सवाल ने उसके भीतर एक अजीब निराशा भर दी। कुछ देर शांत रहने के बाद उन्होंने न लौट पाने की लौटने से ज्यादा वजह गिना दी। - फोटो : pixabay
मेरे इस सवाल ने उसके भीतर एक अजीब निराशा भर दी। कुछ देर शांत रहने के बाद उन्होंने न लौट पाने की लौटने से ज्यादा वजह गिना दी।

ये वजह क्या थी?

उनकी बेटी का स्कूल।
पत्नी की नौकरी।
खुद की नौकरी।
मकान की किस्त।
गाड़ी की ईएमआई!

और आखिर में उन्होंने कहा- लौट कर करूंगा क्या? भविष्य नहीं है वहां!

लौटना बेहद मुश्किल है! चाहे कहीं के लिए भी क्यों न हो
उनकी इस बात को सुनकर मैं हैरान थी। अभी कुछ देर पहले उनके पास लौटने की कई वजह थी। लौटने के बाद गांव में करने के लिए कई प्लानिंग थी और अब वो कह रहे हैं भविष्य कहां है! मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई और लगा कि मुझे उन्हें नहीं कहना चाहिए था कि आप लौट क्यों नहीं  जाते?

मैंने बस इतना कहा- सही कह रहे हैं आप।
लौटना बेहद मुश्किल है! चाहे कहीं के लिए भी क्यों न हो?

मेरी इस बात पर उन्होंने भी अपनी मौन सहमति दी।


यह पहली बार नहीं है। मेरा एक छात्र भी लौटना चाहता था।
अपने शहर। पूरे सेमेस्टर में ही दिल्ली से दूरी का ख्याल उसके जेहन में सबसे ज्यादा तीव्र था।
एक दिन मैंने उससे कहा- तो तुम चले जाओ अपने ही सूबे में। वहां से पढ़ लो। पढ़ने वाले तो कहीं से भी पढ़ सकते हैं।

मेरी इस बात से वह नाराज हो गया। यह कहते हुए कि आप क्या मेरा भविष्य खराब करना चाहती हैं?  मैं लौटूंगा लेकिन अभी नहीं करियर बनाकर। मुझे बस यही से लगा कि जो अभी नहीं लौट पाया वो कभी नहीं लौट पाता है। इसलिए अगर किसी के भीतर अपने जड़ों की तरफ लौटना का ख्याल तेजी से, हर रोज और हर पल भीतर ही भीतर कचोट रहा है तो अभी लौटिए, क्योंकि हर व्यक्ति की जड़ों की तरफ लौटने की चाहत तो रहती है बस लौटने का निर्णय नहीं हो पाता!! यह निर्णय तमाम सामाजिक दबावों के बीच दबकर दम तोड़ देता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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