मोहब्बत और इंसानियत को सबसे बड़ा मजहब मानते रहे ऋषि कपूर

Atul sinha अतुल सिन्हा
Updated Thu, 30 Apr 2020 03:35 PM IST
ऋषि कपूर
ऋषि कपूर - फोटो : अमर उजाला
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बॉलीवुड ही नहीं पूरा देश सदमे में है। आखिर ये क्या हो रहा है। इरफान के जाने का गम और अब बेहद जिंदादिल ऋषि कपूर के ऐसे चले जाने का सदमा। एक ऐसे कलाकार जिसकी सूरत में एक मुस्कराहट और सकारात्कता की झलक हमेशा रही। इरफान और ऋषि कपूर में बुनियादी फर्क ये कि ऋषि को बॉलीवुड विरासत में मिला तो इरफान ने इसे अपने संघर्षों से हासिल किया।
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एक राजस्थान के छोटे से शहर टोंक से जयपुर और एनएसडी (दिल्ली) के रास्ते इस संघर्षों की दुनिया में पहुंचा तो दूसरे ने पालने में ही अभिनय और सितारों की दुनिया की चमक दमक देखी। लेकिन दोनों में समानताएं ये कि दोनों के पास ही हर पात्र को जीने और उसमें समां जाने का एक जैसा जज्बा और हुनर।


अभिनय या कला की कोई उम्र नहीं होती। जोहरा सहगल को ही याद कर लीजिए। 102 साल की उम्र में भी अभिनय उनके रग-रग में बसा था और पात्रों को सहजता और जीवंतता के साथ उतारने की कला में वो अंतिम दिनों तक माहिर रहीं। लेकिन यहां एक 53 में चला जाता है तो दूसरा 67 में। ऐसे वक्त में जब ब़ॉलीवुड को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत रही हो।

वैसे तो फिल्मी दुनिया में कलाकारों की भरमार है लेकिन कोई ऋषि कपूर या इरफान नहीं हो सकता।
वैसे तो फिल्मी दुनिया में कलाकारों की भरमार है लेकिन कोई ऋषि कपूर या इरफान नहीं हो सकता। - फोटो : अमर उजाला
वैसे तो फिल्मी दुनिया में कलाकारों की भरमार है लेकिन कोई ऋषि कपूर या इरफान नहीं हो सकता। अजीब त्रासदी है। जिंदगी एक अजीब मुकाम पर आ खड़ी हुई है। जहां आप घर बैठे-बैठे तमाम दुखद खबरें सुन रहे हैं। पूरी दुनिया में मौत के आंकड़ों की गिनती चल रही है। सैंकड़ों, हजारों लोग रोज कोरोना से मर रहे हैं। जिन पर आफत टूटती है वही इसका मर्म जानते हैं। धीरे-धीरे दुनिया को इसकी भी आदत होती जा रही है।

कुछ देर का सदमा, शोक और फिर रोजमर्रा की जिंदगी... लेकिन मन में कहीं गहरे तक ये घटनाएं असर करती हैं... लोगों का और खासकर उन हस्तियों का असमय चले जाना दिल की गहराइयों तक एक कचोट छोड़ जाता है जो आपकी जिंदगी के किरदार को जीते रहे हैं।

हम अक्सर कलाकारों के सामाजिक सरोकारों की बात करते हैं। इरफान संघर्षों की उपज थे इसलिए तमाम आंदोलनों और जनता के सवालों पर खुलकर बोलते थे, उनके साथ खड़े होते थे। ऋषि कपूर को भी तमाम सामाजिक सवालों से सरोकार था। अगर उनका ट्विटर देखें तो साफ हो जाता है कि वो खुलकर अपनी राय देते रहे हैं।

पाकिस्तान या मुसलमानों के प्रति नफरत के माहौल पर भी उनकी तकलीफें लगातार सामने आती रही हैं। वो लगातार मोहब्बत और इंसानियत की ही बात करते रहे। कोरोना काल में भी उन्होंने अपने ट्वीट में भारत और पाकिस्तान, हिन्दू और मुसलमान सबको मिलकर इससे लड़ने और जीतने की नसीहत दी।

ऋषि कपूर: सोशल मीडिया पर बेबाक रहे।
ऋषि कपूर: सोशल मीडिया पर बेबाक रहे। - फोटो : अमर उजाला
22 मार्च को उन्होंने लिखा- इसे दोनों तरफ के लोगों को एक जज्बे के साथ लेना चाहिए। प्यार, जज्बात, मोहब्बत और इंसानियत जिंदाबाद। हम सब मिलकर कोरोना जैसे दुश्मन को हरा देंगे। 2 अप्रैल को उन्होंने सभी धर्मों और समुदायों से अपील की – डॉक्टर्स, नर्स, पुलिसवालों पर हमला न करें, उनपर पत्थर न फेंके, उनकी लिंचिंग न करें, वो लगातार आपको बचाने के लिए अपनी जिंदगी खतरे में डाल रहे हैं।

कोराना के खिलाफ जंग हमसब मिलकर ही जीतेंगे। जय हिंद। जब निर्भया के मामले में इंसाफ में देरी हो रही थी तब भी ऋषि कपूर ने कई ट्वीट किए और 20 मार्च को उन्होंने लिखा – जैसी करनी वैसी भरनी। ये भारत के लिए ही नहीं दुनिया के लिए एक उदाहरण है कि रेप की सजा मौत ही है। महिलाओं का सम्मान करें। उनलोगों पर शर्म है जिन्होंने इंसाफ में देरी की।

पाकिस्तान को लेकर भी उनकी चिंताएं सामने आती रहीं। 19 मार्च को उन्होंने इमरान खान को लिखा कि पाकिस्तान भी अपने देश के लिए उचित कदम उठाए। पाकिस्तान के लोग हमें भी प्यारे हैं। हम सब एक हो जाएं। ये वैश्विक संकट है। इसमें कोई अहम (ईगो) न रखें। हम आपको प्यार करते हैं। इंसानियत जिंदाबाद।

दरअसल, ऋषि कपूर की सबसे बड़ी खासियत यही थी कि वो सिर्फ मोहब्बत और अमन की बात करते थे, उनके लिए मुल्क की सरहदों से ज्यादा इंसान की मोहब्बत मायने रखती थी। जाहिर है ये जज्बा उन्हें राज कपूर से मिला और उन्होंने इसे आखिरी वक्त तक बरकरार रखते हुए अपने फिल्मों में भी वही संदेश दिया। उन्हें इसी मोहब्बत के जज्बे के साथ आखिरी सलाम।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 
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