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अमृतलाल नागर की कहानी- फिर प्रायश्चित

अमृतलाल नागर Updated Sun, 31 Dec 2017 01:41 PM IST
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मणिधर सुंदर युवक था। उसकी जेब में पैसा था और पास में था नवीन उमंगों से पूरित हृदय। वह भोला-भाला सुशील युवक था। बेचारा सीधे मार्ग पर जा रहा था, यारों ने भटका दिया- दीन को पथ-हीन कर दिया। उसे नित्य-प्रति कोठों की सैर कराई, नई-नई परियों की बांकी-झांकी दिखाई। उसके उच्चविचारों का उसकी महत्वकाक्षांओं का अत्यंत निर्दयता के साथ गला घोंट डाला। बनावटी रूप के बाजार ने बेचारे मणिधर को भरमा दिया। पिता से पैसा मांगता था वह। अनाथालयों में चंदा देने के बहाने और उसे आंखें बंद कर बहाता था, गंदी नालियों में, पाप की सरिता में, घृणित वेश्यालयों में। 

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वहीं एक थे पंडित जी, जो वृद्ध थे। अनेक कन्याओं के शिक्षक थे। वात्सल्य प्रेम के अवतार थे। किसी भी बालिका के घर खाली हाथ न जाते थे। मिठाई, फल, किताब, नोटबुक आदि कुछ न कुछ ले कर ही जाते थे। बालिकाएं भी उनसे अत्यंत हिल-मिल गई थीं। बाहरवालों को इस प्रकार ठाट दिखाकर पंडितजी दूसरे ही प्रकार का खेल खेला करते थे। वह अपनी नवयौवना सुंदर छात्राओं को अन्य विषयों के साथ-साथ प्रेम का पाठ भी पढ़ाया करते थे, परंतु वह प्रेम, विशुद्ध प्रेम नहीं, वरन प्रेम की आड़ में भोगलिप्सा की शिक्षा थी, सतीत्व विक्रय का पाठ था। पंडितजी के आस-पास यूनिवर्सिटी तथा कॉलेज के छात्र इस प्रकार भिनभिनाया करते थे, जिस प्रकार कि गुड़ के आसपास मक्खियां। 


रायबहादुर डॉ. शंकरलाल अग्निहोत्री का स्थान समाज में बहुत ऊंचा था। वह सभा-सोसायटी के हाकिम-हुक्काम में आदर की दृष्टि से देखे जाते थे। उनके एक कन्या थी- मुक्ता। वह हजारों में एक थी- सुंदरता और सुशीलता दोनों में। दुर्भाग्यवश वृद्ध पंडितजी उसे पढ़ाने के लिए नियुक्त किए गए। भोली-भाली बालिका अपने आदर्श को भूलने लगी। पंडितजी मुक्ता के रूप लावण्य को किराए पर उठाने के लिए कोई मनचला पैसे वाला ढूंढ़ने लगे। अंत में मणिधर को उन्होंने पात्र चुन लिया। दूसरे ही दिन मणिधर को पंडित जी के यहां जाना था। वह संध्या अत्यंत ही रमणीक थी। मणि ने उसे बड़ी प्रतीक्षा करने के पश्चात पाया था। आज वह अत्यंत प्रसन्न था। 

मुक्ता पंडितजी के यहां बैठी हारमोनियम पर उंगलियां नचा रही थी। सहसा, मणिधर के आ जाने से हारमोनियम बंद हो गया। लजीली मुक्ता कुर्सी छोड़कर एक ओर खड़ी हो गई। पंडितजी ने कितना ही समझाया, ''बेटी! इनसे लज्जा न कर, यह तो अपने ही हैं। जा, बजा, बाजा बजा। अभ्यागत सज्जन के स्वागत में एक गीत गा।'' परंतु मुक्ता को अभी लज्जा ने न छोड़ा था। यह सब देख पंडितजी खिसक गए। अब उस प्रकोष्ठ में केवल दो ही थे।

मणिधर ने मुक्ता का हाथ पकड़कर कहा, ''आइए, खड़ी क्यों हैं। मेरे समीप बैठ जाइए।'' मणिधर धृष्ट होता चला जा रहा था। मुक्ता झिझक रही थी, परंतु फिर भी मौन थी। मणिधर ने कहा- ''क्या पंडितजी ने इस प्रकार आतिथ्य सत्कार करना सिखलाया है कि घर पर कोई पाहुन आवे और घरवाला चुपचाप खड़ा रहे... शुभे, मेरे समीप बैठ जाइए।'' प्रेम की विद्युत कला दोनों के शरीर में प्रवेश कर चुकी थी। मुक्ता इस बार कुछ न बोली। वह मंत्र-मुग्ध-सी मणि के पीछे-पीछे चली आई तथा उससे कुछ हटकर पलंग पर बैठ गई। ''आपका शुभ नाम?'' मणि ने जरा मुक्ता के निकट आते हुए कहा। ''मुक्ता।'' लजीली मुक्ता ने धीमे स्वर में कहा।

बातों का प्रवाह बढ़ा, धीरे-धीरे समस्त हिचक जाती रही। और... और!! थोड़ी देर के पश्चात मुक्ता नीरस हो गई, उसकी आब उतर गई थी। हिचक खुल गई थी। मणि और मुक्ता का प्रेम क्रमशः बढ़ने लगा था। मणि मिलिंद था, पुष्प पर उसका प्रेम तभी ही ठहर सकता है, जब तक उसमें मद है, परंतु मुक्ता का प्रेम निर्मल और निष्कलंक था। वह पाप की सरिता को पवित्र प्रेम की गंगा समझकर बेरोक-टोक बहती ही चली जा रही थी। अचानक ठोकर लगी। उसके नेत्र खुल गए। एक दिन उसने तथा समस्त संसार ने देखा कि वह गर्भ से थी।
समाज में हलचल मच गई। शंकरलाल जी की नाक तो कट ही गई। वह किसी को मुंह दिखाने के योग्य न रह गए थे- ऐसा ही लोगों का विचार था। अस्तु। जाति-बिरादरी जुटी, पंच-सरपंच आए। पंचायत का कार्य आरंभ हुआ। मुक्ता के बयान लिए गए।

​उसने आंसुओं के बीच सिसकियों के साथ-साथ समाज के सामने संपूर्ण घटना आद्योपांत सुना डाली। पंडितजी ने गिड़गिड़ाते  हुए अपनी सफाई पेश की तथा मुक्ता से अपनी वृद्धावस्था पर तरस खाने की प्रार्थना की। परंतु मणिधर शांत भाव से बैठा रहा। पंचों ने सलाह दी। बूढ़ों ने हां में हां मिला दिया। सरपंच महोदय ने अपना निर्णय सुना डाला। सारा दोष मुक्ता के माथे मढ़ा गया। वह जातिच्युत कर दी गई। मणिधर और पंडितजी को सच्चरित्रता का सर्टिफिकेट दे निर्दोष करार दे दिया गया। केवल 'अबला' मुक्ता ही दुख की धधकती हुई अग्नि में झुलसने के लिए छोड़ दी गई। अंत में अत्यंत कातर भाव से निस्सहाय मुक्ता ने सरपंच की दुहाई दी। उनके चरणों में गिर पड़ी। सरपंच घबराए। हाय, भ्रष्टा ने उन्हें स्पर्श कर लिया था। क्रोधित हो उन्होंने उस गर्भिणी, निस्सहाय, आश्रयहीन युवती को धक्के मार कर निकाल देने की आदेश दे दिया। 

उसे धक्का मारकर निकालने ही वाले थे कि अचानक आवाज आई- "ठहरो। अन्याय की सीमा भी परिमित होती है। तुम लोगों ने उसका भी उल्लंघन कर डाला है।'' लोगों ने नेत्र घुमाकर देखा, तो मणिधर उत्तेजित हो निश्चल भाव से खड़ा कह रहा था, ''हिंदू समाज अंधा है, अत्याचारी है एवं उसके सर्वेसर्वा अर्थात हमारे 'माननीय' पंचगण अनपढ़ हैं, गंवार हैं और मूर्ख हैं, जिन्हें खरे एवं खोटे, सत्य और असत्य की परख नहीं, वह क्या तो न्याय कर सकते हैं और क्या जाति-उपकार? इसका वास्तविक अपराधी तो मैं हूं। इसका दंड तो मुझे भोगना चाहिए। इस सुशील बाला का सतीत्व तो मैंने नष्ट किया है और मुझसे भी अधिक नीच है, यह बगुला भगत बना हुआ नीच पंडित। इस दुराचारी ने अपने स्वार्थ के लिए न मालूम कितनी बालाओं का जीवन नष्ट कराया है। उन्हें पथभ्रष्ट कर दिया है। जिस आदरणीय दृष्टि से इस नीच को समाज में देखा जाता है, वास्तव में यह नीच उसके योग्य नहीं, वरन यह नर पशु है, लोलुपी है, लंपट है।”

सब लोग मणिधर के ओजस्वी मुखमंडल को निहार रहे थे। मणिधर अब मुक्ता को संबोधित कर कहने लगा, ''मैंने भी पाप किया है। समाज द्वारा दंडित होने का वास्तविक अधिकारी मैं हूं। मैं भी समाज एवं लक्ष्मी का परित्याग कर तुम्हारे साथ चलूंगा। तुम्हें सर्वदा अपनी धर्मपत्नी मानता हुआ, अपने इस घोर पाप का प्रायश्चित करूंगा। भद्रे, चलो अब इस अन्यायी एवं नीच समाज में एक क्षण भी रहना मुझे पसंद नहीं... चलो।'' मणिधर मुक्ता का हाथ पकड़कर एक ओर चल दिया और जनता जादूगर के अचरज भरे तमाशे की तरह इस दृश्य को देखती रह गई।
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