मंजिलें और भी हैं : भैंस और चने बेचकर शुरू की थी एलोवेरा की खेती

राकेश चौधरी Published by: Avdhesh Kumar Updated Thu, 25 Jul 2019 03:57 PM IST
राकेश चौधरी
राकेश चौधरी - फोटो : अमर उजाला
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मैं राजस्थान स्थित नागौर जिले के राजपुरा गांव का रहने वाला हूं। मेरा बचपन खेती किसानी के साथ बीता है। बी.एससी. की पढ़ाई करने के बाद मुझे एक कंपनी में नौकरी मिल गई। लेकिन खेती-किसानी की खराब हालत देखकर इसके लिए कुछ नया करने का विचार हमेशा चलता रहा। बचपन से ही मैं जड़ी-बूटी का नाम सुनता था। अक्सर बाजार में जाता था, तो पंसारी की दुकान पर औषधीय उपज (अश्वगंधा, तुलसी, सफेद मूसली, स्टीविया, गिलोय, शतावर) को बिकते देखता था। 
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बाजार में औषधीय उपज की कीमत भी पारंपरिक फसलों से ज्यादा थी। लेकिन जागरूकता के अभाव में मेरे इलाके के किसान उन्हें उगाने से इनकार कर रहे  थे। वर्ष 2004 में मैंने एक अखबार में राजस्थान मेडिसनल प्लांट्स बोर्ड का एक विज्ञापन देखा। इस विज्ञापन में किसानों से औषधीय खेती करने के लिए प्रस्ताव मांगे थे। मैं बोर्ड कार्यालय गया और औषधीय पौधों की खेती कब की जाती है, किस समय उनकी रोपाई होती है तथा कब उन्हें हार्वेस्ट किया जाता है, इसकी जानकारी ली। 


तब मेरे पिता इस फैसले से असहमत थे, उन्होंने कहा कि झाड़ियों की खेती से क्या लाभ मिलेगा। लेकिन मुझे इन औषधीय पौधों का बाजार में महत्व दिख रहा था। तभी मैंने औषधीय पौधों की खेती करने का फैसला किया। हालांकि किसी तरह उनको सहमत कर मैंने औषधीय खेती के लिए एक प्रस्ताव बनाकर बोर्ड कार्यालय में जमा करवाया। मेरे पिता जी ने तब घर की दो भैंस बेंची थी, उनकी पेंशन की थोड़ी रकम थी, इसके अलावा करीब 58 क्विंटल चने को बाजार में बेचकर रुपया इकट्ठा किया। 

इसके बाद मैं इसे लेकर रिलायंस लाइफ साइंस, जामनगर गया। वहां से एलावेरा के पौधे लेकर आया और इसे किसानों में मुफ्त में बांट दिया, ताकि वे इसकी खेती के प्रति प्रोत्साहित हो सकें। लेकिन मेरी परेशानी खत्म नहीं हुई थी, चूंकि राजस्थान में एलोवेरा ज्यादातर कब्रगाहों पर लगाया जाता है। ऐसे में किसानों की धारणा थी, कि अगर खेत में एलोवेरा लगाया तो वे कब्रगाह बन जाएंगे। शुरुआती दौर बहुत ही समस्याओं भरा गुजरा। 
 

हालांकि किसानों ने मेरे दिए हुए ऐलोवेरा के साथ कुछ अन्य औषधीय पौधे लगा दिए। लेकिन इस शर्त पर कि अगर इनका कोई खरीदार न मिला तो उनका सारा नुकसान मुझे भरना होगा। मुझे समुचित जानकारी के अभाव में शुरुआत में इससे अपेक्षित फायदा नहीं मिल सका। इस बीच मुझे एचएचसी कंपनी, बिहारीगढ़ के बारे में पता चला, जो ऐलोवेरा की खरीद-फरोख्त करती थी। हालांकि उसने हमारी फसल कम कीमत पर ही खरीदी। यह मूल्य भले ही कम था, पर मेरे लिए उत्सावर्धक और प्रेरणादायी साबित हुआ। 

इसके बाद मैंने समूह में खेती करने का निर्णय लिया, क्योंकि मुझे लगा कि इससे बाजार ढूंढने में भी आसानी रहेगी और समूह में होने पर एक-दूसरे के प्रति विश्वास भी बढ़ेगा। मैं लगातार बोर्ड से तकनीकी जानकारी हासिल कर और किसानों के बीच जाकर उनको औषधीय महत्व के पौधों की जानकारी देना जारी रखा। अब करीब 3,000 हेक्टेयर क्षेत्र में औषधीय पौधे उगाए जा रहे हैं। मेरे साथ करीब 6,500 किसान मिलकर 60 से अधिक फार्मेसियों को आयुर्वेदिक महत्व की जड़ी-बूटियां उपलब्ध करवा रहे हैं। 

अब मैं दशमूल प्लांट मॉडल बना रहा हूं, जिसमें विशेष तौर पर दशमूलारिष्ट और इस तरह की अन्य दवाइयों में उपयोग होने वाली औषधीय पौधों की खेती की जाएगी। औषधीय खेती के क्षेत्र में यह नया प्रयोग है। औषधीय खेती की ओर आकर्षित होने वाले किसानों से मैं यही कहना चाहूंगा कि अगर इस दिशा में काम कर रहे हैं तो बस तीन-चार तरह की फसलों तक सीमित न रहें। बाजार में अनुपलब्ध जड़ी-बूटियों के पौधे लागाएं, जिससे कि खेती से अपेक्षित लाभ ले सकें।
 
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