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कृषि भूमि पर रेंगती मौत, मरुस्थल पसार रहा है पांव

वीर सिंह Published by: VEER SINGH Updated Fri, 19 Feb 2021 06:28 AM IST
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crop - फोटो : अमर उजाला
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हमारी कृषि भूमि पर मरुस्थल पांव पसार रहा है। हरित क्रांति की धरती पर तो मरुस्थलीकरण ने जैसे डेरा ही जमा लिया है। जाने-माने कृषि अर्थशास्त्री और सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ पंजाब के कुलाधिपति पद्मभूषण डॉ.सरदारा सिंह जोहल ने मरुस्थलीकरण की दिशा में तेजी से बढ़ते पंजाब पर चिंता प्रकट की है। मरुस्थलीकरण का सबसे बड़ा खतरा हरित क्रांति की प्रमुख फसलों, गेहूं और धान, से है। डॉ. जोहल ने सुझाव दिया है कि यदि मरुस्थलीकरण की दिशा में पंजाब को बढ़ने से रोकना है, तो सबसे अच्छा तरीका यह है कि गेहूं और धान की खेती को उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के गंगा मैदानों में 50 लाख हेक्टेयर भूमि पर ले जाया जाए। लेकिन डॉ. जोहल ने कृषि भूमि के रेगिस्तानीकरण के कदम थामने के उपाय बताने के बजाय उसके स्थानांतरण का मंत्र बता दिया। उन्हें तो उस कृषि प्रणाली का ही प्रतिकार करना चाहिए था, जिसके गर्भ में मरुस्थल छिपा है। 

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दुनिया के शुष्क भूमि क्षेत्रों में मरुस्थलीकरण, मरुस्थल और मरुस्थल निवासियों के बारे में कुछ तथ्य और आंकड़े बड़े ही रोचक हैं। मरुस्थलीकरण से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र है शुष्क भूमि, जो अकेले पृथ्वी के लगभग 40 फीसदी भूमि क्षेत्र पर अपना शिकंजा कसे हुए है। शुष्क भूमि पर दुनिया भर में दो अरब से अधिक लोगों का आवास है। दुनिया के शुष्क भूमि क्षेत्रों में से लगभग एक करोड़ 20 लाख वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र मरुस्थलीकरण से प्रभावित है। सतत मरुस्थलीकरण से दुनिया भर में शुष्क भूमि में रहने वाले एक अरब से अधिक लोगों को खतरा है। मरुस्थलीकरण, एक मायने में, भूमि पर मौत का रेंगना है। मरुस्थल का अर्थ ही है एक मृत भूमि। हो सकता है कि मौत स्थायी न हो। उदाहरण के लिए, कृषि भूमि लगभग हर साल या हर फसल के मौसम के बाद मर जाती है। जब मिट्टी में पोषक तत्वों का भंडार हर फसल मौसम के बाद चुक जाता है, तो एक खेत की मिट्टी की 'अस्थायी' मौत हो जाती है। पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्वों के साथ मिट्टी को फिर से एक नई फसल के मौसम की शुरुआत के साथ जीवन का पट्टा मिलता है। इस प्रकार कृषि क्षेत्रों के मरुस्थलीकरण का खेल मनुष्य द्वारा खेला जाता है। हमारी आधुनिक कृषि प्रकृति के तत्वों के चक्र पर नहीं, बल्कि बाजार में उपलब्ध रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर करती है। 


कृषि भूमि लगभग हर जगह मरुस्थलीकरण के क्रूर चंगुल में है। जितनी अधिक जुताई होगी, जितनी अधिक सिंचाई होगी, जितना अधिक रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग होगा और जितनी अधिक मिट्टी की अनदेखी होगी, मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया उतनी ही त्वरित होगी। देश की धरती पर 1960 के दशक में मैक्सिको से डॉ. नार्मन बोरलॉग द्वारा विकसित बौने गेहूं के बीजों के आगमन ने धरती के मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया को चिंगारी दे दी। हरित क्रांति के बौने गेहूं की फसलों ने कुछ ही वर्षों में मिट्टी की उर्वरा शक्ति को चाट लिया। फिर, 1970 के दशक में फिलीपींस के अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान से भारत में अल्पकालिक बौने चावल का प्रादुर्भाव हुआ, तो जैसे मरुस्थलीकरण को ऑक्सीजन ही मिल गई। भारत में 90 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि लवणीकरण का शिकार है, और जम्मू-कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक तथा गुजरात से अंडमान-निकोबार तक हमारी कृषि योग्य भूमि शनैः शनैः लवणीकरण की समस्या से ग्रसित होती जा रही है। 

मिट्टी की उर्वरा शक्ति की पुनः प्राप्ति के लिए हमें प्रकाश संश्लेषण की क्षमता बढ़ानी होगी। उथली जड़ों वाली एकल फसलों के साथ गहरी जड़ों वाली फसलों, विशेषकर दलहनी फसलों, को उगाकर, कृषि-वानिकी को अपनाकर, पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण, मिट्टी को जैविक उर्वरकों से पोषित कर, कृषि के जैव-विविधता आधार को विस्तृत कर, मिट्टी-जल के उचित प्रबंधन, और भूमि के अधिकाधिक क्षेत्र पर वनीकरण से मरुस्थलीकरण को रोका जा सकता है। 

(-लेखक जी. बी. पंत कृषि और प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर हैं।) 

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