टोक्यो में मिली शानदार सफलता: अब दस स्वर्ण पदक का लक्ष्य हो

Surendra Kumar सुरेंद्र कुमार
Updated Wed, 11 Aug 2021 06:21 AM IST
नीरज चोपड़ा
नीरज चोपड़ा - फोटो : ANI
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नीरज चोपड़ा स्वतंत्र भारत में एथलेटिक्स में ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय बन गए हैं। महान धावक मिल्खा सिंह और पी टी उषा ने विश्व रिकॉर्ड जरूर बनाया था, लेकिन वे ओलंपिक पदक से चूक गए थे। पी वी सिंधु दो ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बैडमिंटन खिलाड़ी बन गई हैं। रियो ओलंपिक में उन्हें रजत पदक मिला था और टोक्यो में कांस्य पदक। हमारी हॉकी टीम ने चालीस साल बाद कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। 'चक दे इंडिया' महिला हॉकी टीम समर्पण और लड़ने के हौसले के बावजूद कांस्य पदक नहीं जीत सकी, लेकिन उसने लाखों लोगों के दिल जीत लिए। रवि दहिया और बजरंग पुनिया ने क्रमशः रजत और कांस्य पदक जीतकर भारतीय कुश्ती के शौर्य का प्रदर्शन किया है। मीरा बाई चानू ने भारोत्तोलन में रजत पदक जीता। अदिति अशोक (गोल्फ) और दीपक पुनिया (कुश्ती) पदक जीतने में भले ही सफल न हो सके, लेकिन उन्होंने अपने प्रदर्शन से खासा प्रभावित किया। 
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टोक्यो में एक स्वर्ण, दो रजत और चार कांस्य पदक के साथ भारत का ओलंपिक में अब तक का यह श्रेष्ठ प्रदर्शन है। इन 'सेवन सामुराई' ने भारत को गौरवान्वित किया है। हमें विजेताओं को सलाम करना चाहिए और उन संगठनों और व्यक्तियों की सराहना करनी चाहिए, जिन्होंने उन्हें यह उपलब्धि हासिल करने में मदद की। उन पर सम्मान और पुरस्कार की बारिश हो रही है, क्योंकि वे इसके हकदार हैं। कोरोना महामारी से आई तबाही के बीच इन खिलाड़ियों ने जाति, पंथ, भाषा, क्षेत्र और आर्थिक असमानताओं तथा राजनीतिक लाइन से इतर सारे देश को खुश होने और जश्न मनाने का मौका दिया है। पदक जीतने वाले इन खिलाड़ियों के कारण थोड़े समय के लिए ही सही, एक राष्ट्र के रूप में एकजुट होने का मौका मिला। काश एकता की यह भावना बनी रहे। 


जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी ने खिलाड़ियों से फोन पर बात की और भारतीय खेल प्राधिकरण ने उनके सम्मान में स्वागत समारोह आयोजित किया, वह सराहनीय है और इससे ये विजेता भविष्य में और अच्छे प्रदर्शन के लिए प्रेरित होंगे। उन्हें हर तरह की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, ताकि वे अपना प्रशिक्षण और कोचिंग जारी रख सकें और अगले ओलंपिक में और बेहतर प्रदर्शन करने को प्रेरित हो सकें। उन्हें ऐसे मौके और मंच भी उपलब्ध कराए जाने चाहिए, जिसमें वे ओलंपिक की अपनी उपलब्धि तक की यात्रा के बारे में विचार साझा कर सकें। इससे खेल की नई प्रतिभाएं अपने सपनों को पूरा करने के लिए प्रेरित होंगी। 

उत्सव का माहौल खत्म होने के बाद हमें एक राष्ट्र के रूप में आईने के सामने खड़े होकर अपनी छवि देखनी चाहिए और खुद से यह कठोर सवाल करना चाहिए कि क्या एक स्वर्ण पदक जीतकर और सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के रूप में ओलंपिक की पदक तालिका में 48 वें स्थान में पहुंचकर 1.3 अरब लोगों के देश को शेखी बघारनी चाहिए? चार महिला एथलीट ने तीन-तीन स्वर्ण पदक जीते हैं और ये हैं, एलेन थाम्पसन-हेराह (जमैका), सिफान हसन (नीदरलैंड), अन सैन (दक्षिण कोरिया) और काइली मैकोन (ऑस्ट्रेलिया)। भारत क्वाड का अपरिहार्य सदस्य है, लेकिन ओलंपिक पदक तालिका को देखें, तो हम कुछ भी नहीं हैं। अमेरिका ने 39 स्वर्ण के साथ कुल 113 पदक जीते। जापान ने 27 स्वर्ण के साथ कुल 58 पदक जीते और ऑस्ट्रेलिया ने 17 स्वर्ण पदक के साथ कुल 46 पदक जीते हैं। 

दक्षिण अफ्रीका को छोड़कर ब्रिक्स के सारे देशों ने हमसे अधिक पदक जीते। चीन ने 38 स्वर्ण के साथ 88 पदक जीते और ब्राजील ने सात स्वर्ण के साथ 21 पदक जीते। ऐसे समय जब सारा देश जश्न मना रहा है, हमें इस पर भी विचार करना चाहिए कि आखिर हम उन देशों से क्यों पिछड़े हुए हैं, जिनकी आबादी हमारी आबादी के दसवें हिस्से के बराबर है? हम और महत्वाकांक्षी क्यों नहीं हो सकते? जब हम पचास खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की आकांक्षा रखते हैं और इस साल अपने निर्यात को 400 अरब डॉलर तक पहुंचाना चाहते हैं, तब हम अगले ओलंपिक में दस स्वर्ण पदक के साथ कुल तीस पदक जीतने का लक्ष्य क्यों नहीं रख सकते? यह तभी संभव है, जब केंद्र और राज्यों की सरकारें इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राथमिकता दें। शिक्षा पर हमारा प्रति व्यक्ति बजट दुनिया में सबसे कम है। 

इसी तरह से खेल कूद को प्रोत्साहित करने के लिए हमारा प्रति व्यक्ति बजट हमसे अधिक ओलंपिक पदक जीतने वाले देशों की तुलना में तुच्छ है। कम उम्र में ही प्रतिभाशाली और उभरते खिलाड़ियों की पहचान करना और उन्हें वर्षों तक संवारना ही भविष्य के चैंपियन्स का एक पूल तैयार करने का एकमात्र तरीका है। इसमें स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की अहम भूमिका हो सकती है। यदि हम जिला स्तर पर एक खेल अधिकारी की अलग से नियुक्ति न कर सकें, तो हमें पूरे देश में सारे डीएम की एक अतिरिक्त जिम्मेदारी के रूप में इसे जोड़ देना चाहिए। खेलों के विभिन्न वर्गों में अंतरजिला और अंतरराज्यीय स्पर्धाएं होनी चाहिए, ताकि श्रेष्ठ प्रतिभाएं बाहर आ सकें। भारतीय उद्योग जगत और नामचीन लोग भारत में खेलों को प्रोत्साहित करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। 

आईपीएल के आयोजन और क्रिकेटरों की नीलामी में जब करोड़ों रुपये खर्च किए जा सकते हैं, तब बीस बड़े औद्योगिक घराने एक-एक खेल की जिम्मेदारी क्यों नहीं उठा सकते। ध्यान रहे, कोविड काल में देश में अरबपतियों की संख्या बढ़ गई। ऐसे अरबपति पांच-पांच खिलाड़ियों (पुरुष और महिला दोनों) की जिम्मेदारी क्यों नहीं उठा सकते? क्या सीएसआर को खेल के दायरे में नहीं लाया जा सकता? बॉलीवुड के सितारे आईपीएल क्रिकेट टीमों, कबड्डी टीमों, कुश्ती टीमों और फुटबॉल टीमों के मालिक हैं। वे व्यक्तिगत रूप से या समूह के रूप में एक टीम या कई खिलाड़ियों/महिलाओं को क्यों नहीं अपना सकते हैं?

सभी खेल संगठन और प्राधिकरण के संचालन की जिम्मेदारी सिर्फ पुरस्कार विजेता खिलाड़ियों को दी जानी चाहिए। एक राष्ट्रीय खेल सलाहकार परिषद का गठन किया जाना चाहिए, जिसमें पिछले दो-तीन ओलंपिक के पदक विजेता खिलाड़ी शामिल हों और यह परिषद खेल को प्रोत्साहित करने के संबंध में प्रधानमंत्री और खेल मंत्री को सलाह दे। हम दुनिया में एक महाशक्ति बनने की ख्वाहिश रखते हैं। क्या हमें अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप पदक विजेता भी नहीं बनना चाहिए?

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