सेहत की बात: मलेरिया को मात देने के लिए

patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Sat, 16 Oct 2021 07:39 AM IST

सार

डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस एढानम गेब्रेयेसस का कहना है, 'मलेरिया से बचाव के उपायों के साथ इस वैक्सीन के इस्तेमाल से हर साल हजारों बच्चों की जान बचाई जा सकती है।'
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mosquito malaria - फोटो : istock
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विस्तार

देश के भीतर और दुनिया में अन्य जगहों से आ रही मायूस और निराश करने वाली खबरों के बीच कुछ उम्मीद की किरणें दिखाई देती हैं। अब मलेरिया की पहली वैक्सीन ईजाद कर ली गई है। विज्ञान, बाल स्वास्थ्य और मलेरिया नियंत्रण की दिशा में यह एक बड़ी सफलता है, क्योंकि मलेरिया आज भी अनेक देशों में एक जानलेवा बीमारी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने सब सहारा अफ्रीका और अन्य जगहों पर मध्य से लेकर उच्च स्तर तक के पी फाल्सिपेरम मलेरिया के संक्रमण से ग्रस्त बच्चों के लिए (आरटीएस,एस/एएसओवन या आरटीएस,एस) मलेरिया वैक्सीन मॉस्किरिक्स के व्यापक इस्तेमाल की सिफारिश की है। यह घाना, केन्या और मलावी में चल रहे पायलट कार्यक्रम के परिणामों का ही अनुवर्ती है।
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डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस एढानम गेब्रेयेसस का कहना है, 'मलेरिया से बचाव के उपायों के साथ इस वैक्सीन के इस्तेमाल से हर साल हजारों बच्चों की जान बचाई जा सकती है।' सचमुच मलेरिया आज भी सब सहारा अफ्रीका में बच्चों की बीमारी और मौत का एक प्राथमिक कारण है। हर साल पांच साल तक के 2,60,000 अफ्रीकी बच्चों की मौत मलेरिया से हो जाती है। मलेरिया की वैक्सीन का भारत के लिए क्या मतलब है? जरा तथ्यों पर गौर कीजिए। हाल के सालों में भारत ने मलेरिया से निपटने में बड़ी प्रगति की है, मगर आज भी लाखों भारतीय मलेरिया से प्रभावित क्षेत्रों में रहते हैं।


सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मलेरिया के लगभग 80 प्रतिशत मामले अकेले जंगलों, आदिवासी और दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाली देश की बीस फीसदी आबादी में दर्ज किए जाते हैं। इससे निपटने की दिशा में हुई प्रगति के बावजूद मलेरिया के मामलों में भारत की हिस्सेदारी अब भी अधिक है। 2018 के बाद से भारत 'हाई बर्डन हाई इम्पेक्ट' पहल का हिस्सा है। इसे डब्ल्यूएचओ और अन्य वैश्विक एजेंसियों ने शुरू किया है और उसमें दस अफ्रीकी देशों के साथ ही भारत भी शामिल है।

भारत के मलेरिया स्थानिक क्षेत्रों में रहकर काम कर चुके चिकित्सक और जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. प्रबीर चटर्जी कहते हैं कि वह अब तक नौ बार पी. फाल्सिपेरम मलेरिया से संक्रमित हो चुके हैं। वह कहते हैं, 'मैंने मेरी आंखों के सामने अपने सहयोगियों को बीमारी से पस्त होते देखा है। मलेरिया आज भी खासतौर से आदिवासी क्षेत्रों के कई हिस्सों में एक बड़ी समस्या है। सिर्फ स्वास्थ्य कार्यकर्ता ही नहीं, दंतेवाड़ा जैसी जगहों में तैनात अनेक सीआरपीएफ के जवानों की भी मलेरिया से मौत हुई है। यह महज इत्तफाक नहीं है कि आदिवासी क्षेत्रों में ही मलेरिया का भीषण प्रकोप है। ये क्षेत्र अविकसित हैं और सत्ता केंद्रों से दूर स्थित हैं।'

अनेक जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों की तरह चटर्जी भी इस बात से खुश हैं कि अंततः हमारे पास अब मलेरिया की वैक्सीन है, लेकिन उन्होंने भारत में मलेरिया के टीके के अनुसंधान और विकास पर और अधिक सार्वजनिक धन लगाने की जरूरत पर जोर दिया, ताकि लोगों को सस्ते में टीका उपलब्ध हो सके। दुनिया की मलेरिया की पहली वैक्सीन निश्चित रूप से एक बड़ी कामयाबी है, लेकिन जैसा कि चटर्जी रेखांकित करते हैं, इसके साथ ही खासतौर से बारिश के मौसम में मलेरिया से प्रभावित क्षेत्रों में और अधिक जांच की जरूरत है।

बच्चे और गर्भवती महिलाओं में मलेरिया का अधिक खतरा होता है। वह कहते हैं कि इसके साथ ही एक प्राथमिकता यह भी होनी चाहिए कि जिन लोगों में लक्षण न हो और यदि वे जांच में मलेरिया ग्रस्त पाए गए हैं, तो उन्हें मच्छरदारी और कीटनाशक उपलब्ध कराए जाएं। बस्तर जैसे कई आदिवासी इलाकों ने मच्छरदानी की पहुंच बढ़ाने के लिए स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और सर्वेक्षकों का उपयोग करने में सफलता दिखाई है, लेकिन इन सरल हस्तक्षेपों को हर जगह लागू किया जाना चाहिए- खासतौर से आदिवासी क्षेत्रों, जंगलों या पहाड़ी इलाकों में, जहां मलेरिया का गंभीर असर है।

महामारी के समय में, यह स्वीकार करना महत्वपूर्ण है कि कई मलेरिया-स्थानिक क्षेत्रों में जिस तरह की कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था है उस पर मलेरिया संक्रमण से निपटने के साथ-साथ कोविड-19 के संक्रमण का दोहरा बोझ पड़ता है। न केवल मलेरिया के टीके के लिए बल्कि अन्य स्वास्थ्य हस्तक्षेपों के लिए भी उन संसाधनों का विस्तार होना चाहिए जिनकी जीवन बचाने के लिए आवश्यकता है।

केंद्र और राज्यों दोनों की सरकारों को कोई न कोई रास्ता ढूंढ़कर देश के टीकाकरण अभियानों में मलेरिया के टीके को भी अवश्य शामिल करना चाहिए। जैसा कि हम सब जानते हैं कि मलेरिया भले ही घातक न हो, लेकिन बार-बार इसके हमले से खासतौर से बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ जाती है।

यदि कोविड-19 के अनुभवों से मलेरिया, टीबी और अन्य रोगों को लेकर कोई सबक मिलता है, तो यही कि मौजूदा तथा उभरते संचारी रोगों की रोकथाम के लिए जिला स्तर पर दीर्घकालीन क्षमता विकसित करने के लिए सूक्ष्म रूप से ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। साथ ही, स्थानीय और जिला स्तरों पर कार्यक्रम नियोजन की सूचना देने के लिए कठोर निगरानी और वास्तविक समय के आंकड़े उपलब्ध होने चाहिए।

भारत ने 2016 में मलेरिया उन्मूलन के लिए एक राष्ट्रीय ढांचा तैयार किया था। इसके बाद देश में संक्रमण के मामलों में कमी दर्ज की गई है। लेकिन भारत केवल इसलिए संतुष्ट नहीं हो सकता, क्योंकि मलेरिया के मामलों की पूर्ण संख्या में कमी आई है। इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि मलेरिया के मामलों का बढ़ता अनुपात अब भारत के सुदूर और दुर्गम क्षेत्रों- ग्रामीण, आदिवासी, सीमाई, पहाड़ी और जंगल- में पाया जाता है, जहां अक्सर कमजोर स्वास्थ्य प्रणाली, गंभीर परिचालन चुनौतियां और बिखरी हुई आबादी के साथ सीमित स्वास्थ्य ढांचा होता है।

यह वह 'परिधि' है, जो आम तौर पर सत्ता के केंद्रों से बहुत दूर है। यह महत्वपूर्ण है कि जनजातीय स्वास्थ्य और जनजातीय आबादी की समस्याओं का समाधान उन्हें केंद्र में रखकर तलाशा जाए। यही एक रास्ता है, जिससे भारत समग्र रूप में मलेरिया को मात दे सकेगा।

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