इंडिया का भारत

शंकर अय्यर Updated Mon, 06 Jul 2015 08:16 PM IST
India's Bharat
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कभी भारत को दूध व शहद की धरती तथा 'सोने की चिड़िया' कहा जाता था। यह ब्रिटिश साम्राज्य के मुकुट का रत्न था। पिछले छह दशकों से राजनेताओं, राजनीतिक दलों और सरकारों ने सुहावने भविष्य का वायदा करते हुए इस शानदार अतीत का गुणगान किया है। मगर इन वायदों की हकीकत पिछले हफ्ते सामने आई। सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना (ध्यान रहे, यह अंतरिम है) गरीबी और अभाव की ऐसी तस्वीर पेश करती है, जो विस्तार और आकार के लिहाज से चौंकाने वाली है। यह राजनीतिक और नीतिगत विफलता का आरोपपत्र है, जो राजनीतिक वर्ग के लिए शर्मनाक है। सार्वजनिक नीति की विफलता की भयावहता आंकने के लिए सिर्फ साक्षरता का हाल देखना ही काफी होगा- ग्रामीण भारत के 35.73 प्रतिशत से ज्यादा लोग निरक्षर हैं-यानी वहां निरक्षर लोगों की संख्या 31,57,86,931 है। राजस्थान में हर दूसरा व्यक्ति अनपढ़ है। निरक्षरता के मामले में राजस्थान, मध्य प्रदेश और बिहार राज्यों की सूची में शीर्ष पर हैं। झारखंड और उत्तर प्रदेश में हर तीसरा व्यक्ति निरक्षर है। साक्षर लोगों में से 13.9 फीसदी लोगों ने प्राथमिक से निचले स्तर तक की ही शिक्षा पाई है, 31 फीसदी लोगों ने बीच में स्कूल की पढ़ाई छोड़ दी, जबकि मात्र 9.5 फीसदी लोगों ने ही माध्यमिक शिक्षा पूरी की। और, ग्रामीण भारत के मात्र 3.45 फीसदी लोग स्नातक हैं।
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यह विफलता, जो दशकों की सुस्ती का नतीजा है, दरअसल नीतिगत विफलता है। दस में से सात परिवार गांवों में रहते हैं, लेकिन उनमें से करीब 56 फीसदी परिवारों के पास अपनी जमीन नहीं है। जिनके पास अपनी जमीन है, उनमें से हर चार में केवल एक को ही सिंचाई सुविधा उपलब्ध है। इसी तरह किसान क्रेडिट कार्ड की शुरुआत के 17 वर्ष बाद भी मात्र 3.6 फीसदी परिवारों के पास ही यह कार्ड है।


तो फिर वे अपना काम कैसे चलाते हैं? 17.9 करोड़ परिवारों में से मुश्किल से 82 लाख को ही आयकर/पेशेवर कर के भुगतान की जरूरत पड़ती है। पांच में से चार परिवारों के अधिकतम कमाऊ सदस्य की मासिक आय पांच हजार रुपये से कम है। तकनीकी शब्दावली में कहें, तो 17.9 करोड़ परिवारों में से 13.3 करोड़ मासिक पांच हजार रुपये पर गुजर-बसर करते हैं। यदि मान लें कि एक परिवार में पांच सदस्य रहते हैं, तो करीब 60 करोड़ से ज्यादा लोग (अमेरिका की आबादी का करीब दोगुना) पांच हजार रुपये प्रति महीने पर गुजारा करते हैं।

वे जीविकोपार्जन कैसे करते हैं? तीन में से एक ग्रामीण भारतीय ही खेती करता है। आश्चर्यजनक रूप से 54 फीसदी लोग हाथ का काम करते हैं और अस्थायी मजदूर हैं या घरेलू कामकाज के लिए बाहर जाते हैं। दस में से एक व्यक्ति ही सरकारी, सार्वजनिक उपक्रमों या निजी क्षेत्र में सवैतनिक रोजगार करता है। ऐसे देश में, जहां लाखों लोग स्वरोजगार उद्यमी के रूप में परिभाषित किए जाते हैं, मात्र 2.3 फीसदी (चालीस लाख परिवार) के पास ही पंजीकृत उद्यम है।

उनका जीवन कैसा है? दस में तीन परिवार एक कमरे के घरों में रहते हैं, 2.2 करोड़ परिवार (करीब दस करोड़ लोग यानी ऑस्ट्रेलिया की आबादी का चार गुना) घास-फूस, बांस या प्लास्टिक या पॉलिथीन से बने घरों में रहते हैं।

बारीक विवरण तो समग्र तस्वीर से भी बदतर है। बिहार के ग्रामीण इलाकों के 70 फीसदी लोग हाथ का काम करते हैं या अनियमित मजदूर हैं। आंध्र प्रदेश में 1.93 फीसदी ग्रामीण आबादी के पास ही सवैतनिक रोजगार है। छत्तीसगढ़ में मात्र 1.81 फीसदी परिवार ही आयकर या पेशेवर कर का भुगतान करते हैं। ग्रामीण राजस्थान में लगभग हर दूसरा व्यक्ति (47.5 फीसदी) निरक्षर है। ग्रामीण भारत के 30 करोड़ से ज्यादा निरक्षरों में से 18 करोड़ निरक्षर पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ में हैं।

सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना की रिपोर्ट छह दशकों की उपेक्षा और इन्कार का दस्तावेज है। इन विफलताओं को स्थायी समस्याओं के निदान के अवसर की तरह देखना चाहिए। ये चुनौतियां इस देश की आकांक्षाएं पूरी करने का मौका देती हैं। मसलन, ग्रामीण गरीबी कम उत्पादकता और इसलिए कम आय का नतीजा है। ऐसे में अधिक उपज के लिए कृषि क्षेत्र में प्रौद्योगिकी के निवेश की जरूरत है। सच यह है कि सरकारी समाधान का विचार ही भारत को जरूरतमंद बनाए रखता है। जल संकट को ही लीजिए। पंचायतों को जल निकायों के पुनर्जीवन, विकास और प्रबंधन की अनुमति क्यों नहीं दी जाती? दस में से छह किसानों के पास क्रेडिट कार्ड नहीं हैं। ऐसे में सब्सिडी के साथ कर्ज देने के लिए क्या हम जन धन का उपयोग कर सकते हैं?

बंजर जमीन बागवानी, बायोफ्यूल या पशु आहार के लिए लीज पर दी जा सकती है। अमूल के विचार को विस्तार देकर दूध की कमी से निपटा जा सकता है। इसी तरह पशुपालन के लिए अनुदान देकर रोजगार सृजन के साथ प्रोटीन की कमी पर अंकुश लगाया जा सकता है।

श्रमबल के एक बड़े हिस्से को खेती से फैक्टरी या व्यावसायिक फ्रेंचाइजी की तरफ ले जाने की जरूरत है। अगर ये कुशल नहीं होंगे, तो औद्योगिक गलियारे और मेक इन इंडिया का विचार अकाल कवलित हो जाएगा। ई-शिक्षा (कंप्यूटर और यहां तक कि मोबाइल पर निःशुल्क डाटा उपलब्ध कराके) की शुरुआत करके स्कूली छात्रों और ड्रॉपआउट विद्यार्थियों की मदद की जा सकती है। करीब 45 फीसदी ग्रामीण साक्षर स्कूल ड्रॉपआउट हैं। निर्माण, विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्र में सर्टिफिकेट कोर्स उन्हें रोजगार के लायक तो बनाएगा ही। वास्तव में एक समग्र अवसर की जरूरत है-इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट और सेवा क्षेत्र के लिए मोबाइल एप्लिकेशन आधारित रोजगार विनिमय के बारे में क्या राय है?
गरीबी उन्मूलन संबंधी बहस के साथ मुश्किल यही है कि यह विकास की अनिवार्यता और जनता के हक के दो ध्रुवों के बीच अटका है। भारत को नारों और योजनाओं की संस्कृति को खत्म कर उसकी जगह समाधान लाने की जरूरत है।

अर्थशास्त्र की राजनीति के विशेषज्ञ और एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक

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