झांसी: पुराना टकसाल अब 'मास्टर रुद्रनारायण मुहल्ला' है

sudhir vidyarthi सुधीर विद्यार्थी
Updated Fri, 15 Oct 2021 06:32 AM IST

सार

मास्टर साहब ने अपने शुरुआती दिनों में बुंदेलखंड के मूर्धन्य चित्रकार और देश के सुप्रसिद्ध रंग तूलिका के जादूगर कालीचरण शर्मा व हरगोविंद वर्मा से चित्रकला की बारीकियां सीखी थीं।
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विस्तार

झांसी शहर में कोतवाली के सामने ढालनुमा सड़क। थोड़ा आगे चलने पर दाहिनी ओर पुराने टकसाल मुहल्ले का संकरा रास्ता। इसी गली में भीतर दो-तीन घरों के आगे शहीद चंद्रशेखर आजाद के अभिन्न साथी क्रांतिकारी मास्टर रुद्रनारायण के मकान का बाहरी ढांचा अब बदल गया है, जहां मैं दुतल्ले पर उनके परिवारजन के साथ बैठा हूं। मास्टर साहब हमारे शहर शाहजहांपुर के रहने वाले थे, जिन्हें रानी झांसी की वीरगाथा इस कदर प्रिय थी कि एक दिन झोला उठाकर झांसी आए, तो फिर यहीं बस गए। चंद्रशेखर आजाद को फरारी के दिनों में मास्टर साहब ने सर्वाधिक संरक्षण दिया। झांसी के उनके मित्रों में क्रांतिकारी सदाशिव राव मलकापुरकर, शचींद्रनाथ बख्शी और भगवान दास माहौर के साथ वृंदावन लाल वर्मा तथा डॉ. रामविलास शर्मा से भी उनकी घनिष्ठता थी।
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मास्टर साहब यहां की प्रसिद्ध सरस्वती पाठशाला के अध्यापक थे, व्यायामशाला चलाते थे, नाटककार, चित्रकार, फोटोग्राफर और गजब के मूर्तिकार भी थे। झांसी और उसके आसपास क्रांतिकारी दल को संगठित करने और संरक्षण देने में मास्टर साहब ने अपूर्व भूमिका निभाई। शहीद आजाद का जो सर्वाधिक प्रचलित चित्र उनके कसरत करने के समय का है, जिसमें उनका एक हाथ मूंछों पर है, उसे मास्टर साहब ने ही चुपके से अपने कैमरे में उतारा था। बाद में आजाद ने उसे नष्ट करने के लिए कड़ाई से आदेश दिया और मास्टर साहब ने आजाद से झूठ बोलकर उसे कच्ची दीवार में दो शीशों के बीच छिपाकर रख दिया। आजाद की यही छवि देश भर में प्रचलित हुई। आजाद का एक और दुर्लभ चित्र मास्टर साहब की पत्नी और दोनों बच्चों के साथ है।


मास्टर साहब ने अपने शुरुआती दिनों में बुंदेलखंड के मूर्धन्य चित्रकार और देश के सुप्रसिद्ध रंग तूलिका के जादूगर कालीचरण शर्मा व हरगोविंद वर्मा से चित्रकला की बारीकियां सीखी थीं। मास्टर साहब की पौत्रवधू पूनम मुझे उस कमरे में ले गईं, जिसमें मास्टर साहब की कुछ कलाकृतियां और तस्वीरें सुरक्षित हैं। उनकी बनाई आजाद की एक पुरानी पेंटिंग भी है, जो कभी टूटकर दो हिस्सों में बंट गई थी, लेकिन उसे जोड़कर दीवार के सहारे लगा दिया गया है। झांसी में रहने के दिनों में मास्टर साहब आजाद के बड़े भाई और घर के सदस्य जैसे थे। वह उनकी पत्नी के झगड़ालू देवर और उनके बच्चों के चहेते चाचा बन गए थे। 

मास्टर साहब के जरिये आजाद का परिचय बुंदेलखंड के कुछ बड़े लोगों से हो गया था, जो दल के बहुत काम आया। मैं इस समय रामविलास शर्मा की यादों को जोड़कर मास्टर साहब का एक चित्र बनाने की कोशिश करता हूं, ‘क्रांतिकारियों के शिक्षक, पंजा लड़ाने के आचार्य, नाटे कद, लेकिन लंबी नुकीले नाक वाले मास्टर रुद्रनारायण हमें ड्रॉइंग पढ़ाते थे। उन्होंने रेखाओं से निराकार कला का अभ्यास कराके सीधे मनुष्य की आकृति के चित्र बनाना सिखाया। स्कूल के पास काली मिट्टी थी। 

उसे हम लोग खोद लाते थे और वह हमें मूर्तियां बनाना सिखाते थे।’ आजादी की लड़ाई में मास्टर साहब स्वयं भी 1920, 1921, 1930 और 1931 में जेल गए। जब सांडर्स-वध के बाद आजाद लाहौर से लौटे, तो मिलते ही मास्टर साहब ने उनके चरण-स्पर्श कर लिए। आजाद चौंके और पीछे हटते हुए बोले, ‘यह क्या उल्टी बात आपने कर डाली!' मास्टर साहब ने गंभीर होकर कहा, ‘मैंने इस समय चंद्रशेखर की नहीं, लाला लाजपत राय का अपमान करने वालों से बदला चुकाने वाले महापुरुष की चरण रज ली है, जिस पर मैं गर्व से फूला नहीं समा रहा हूं।’

मास्टर साहब ने अत्यंत सक्रिय जीवन जीते हुए आजाद को इस शहर में अनेक वर्षों तक सुरक्षित रखा। आर्थिक स्थिति अच्छी न होते हुए भी वह आजाद को यथाशक्ति सहायता देते रहे। वर्ष 1928 की बात है, जब एक रोज मास्टर साहब की पुत्री यह कहते हुए नीचे के हिस्से में आ गई कि 'आज दाल नहीं है, रोटी नहीं बनेगी, मां ने कहा है।' सुनकर आजाद दंग रह गए। उनसे रहा न गया। बोले, 'भैया, बहुत हो गया। एक काम कर ही दो। मुझे पकड़वाकर 25 हजार रुपये सरकार से लेकर आधी रकम से घर-गृहस्थी संभालो और आधी पार्टी को दे दो।' मास्टर साहब का तो चेहरा ही तमतमा गया, 'माटी में जाएं पच्चीस हजार रुपये। मेरे जीते जी कोई पकड़ नहीं सकता तुम्हें। मैं बर्बाद हो जाऊं। मेरा देश तो आजाद हो जाए।’ आजाद ने यह सुना, तो मास्टर साहब के पैरों पर गिर पड़े।

मैं 1933 में स्थापित लक्ष्मी व्यास मंदिर की चहारदीवारी में आ गया हूं, जहां लक्ष्मीबाई इंटर कॉलेज के प्रांगण में घोड़े पर सवार युद्धरत रानी लक्ष्मीबाई की भव्य प्रतिमा लगी है, जिसे मास्टर साहब के हुनरमंद हाथों ने गढ़ा था। ओमशंकर ‘असर’ मुझे बताते हैं कि बिलइया हवेली में मास्टर साहब का स्टुडियो था। बिलइया बाग का तो अब नाम-ओ-निशान नहीं। आज मैं ‘झांसी बम केस’ के काला पानी गए क्रांतिकारी लक्ष्मीकांत शुक्ल की यादों में भी मास्टर साहब को तलाश कर रहा हूं। वर्ष 1958 में मास्टर रुद्रनारायण का निधन हुआ। जिस टकसाल मुहल्ले में वह रहा करते थे, अब उसका नाम ‘क्रांतिकारी मास्टर रुद्रनारायण मुहल्ला’ है। झांसी हमारे लिए मास्टर साहब का शहर है।

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