आंदोलन की राह: छोटे किसान और बड़े जमींदार

anil prakash joshi अनिल प्रकाश जोशी
Updated Tue, 12 Oct 2021 06:31 AM IST

सार

देश के किसानों में 80 प्रतिशत सीमांत व छोटे किसान हैं, बाकी मुट्ठी भर वे किसान हैं, जिनके पास बड़ी जमींदारी है। किसान हित की बात कर ये बड़े किसान अपने हित साध लेते हैं। यदि 80 फीसदी किसानों को न सुनकर हम दूसरी ओर भटक जाएं, तो किसानी के प्रति न्याय नहीं कर पाएंगे।
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प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

किसानों को लेकर देश भर में चला आंदोलन और इससे तमाम तरह के विवाद व घटनाएं, जो पिछले एक वर्ष से लगातार जुड़ी हैं, कई तरह के सवाल भी खड़ा करती हैं। इसमें दोराय नहीं कि किसानी इस देश की सबसे बड़ी पहचान है और शुरुआती दौर से ही देश को हमेशा से कृषि आधारित आर्थिकी को बल देने का काम करती रही है। अगर 60 से 70 प्रतिशत लोगों की आजीविका खेती-बाड़ी से जुड़ी हो, तो स्वाभाविक है कि वे देश की आर्थिकी की रीढ़ की तरह हैं। 
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पिछले करीब 70-75 साल पर नजर डालें, तो इस दौरान उद्योग क्षेत्र ने जो बढ़त बनाई, उसकी तुलना में किसानी उतनी लाभप्रद नहीं रही। सच यह है कि आज किसानी एक ऐसा काम बन चुका है, जिसमें कोई आकर्षण नहीं दिखाई देता। इसके लाभ बेहतर तरीके से सुनिश्चित नहीं किए गए हैं। आज देश भर में चल रहे किसान आंदोलन पर गहरी दृष्टि डालें, तो इसमें किसानी कैसे बेहतर होगी, इस पर कोई बहस या चिंता नहीं है। 


सवाल देश के सीमांत और छोटे किसानों का है, जो न तो इस तरह के आंदोलनों में दिखाई देते हैं और न ही उनसे जुड़े मुद्दे उठते हैं। आज की पहली बड़ी बहस यह होनी चाहिए कि हम किसान किसे कहें? वैसे तो बड़े-बड़े फिल्म स्टार भी किसान के दायरे में आते हैं और रसूख रखने वाले जमींदार तो किसानी का दावा करते ही हैं। पर इनमें से शायद ही कभी किसी ने हल चलाया हो और पौधे रोपकर या फसल की कटाई कर पसीना बहाया हो। आज देश में किसान दो बड़े हिस्से में बंटे हैं। एक तरफ जमींदार लोग हैं, जिनकी कथित किसानी किसी उद्योग से कम नहीं और दूसरी तरफ छोटे व सीमांत किसान हैं, जिनकी कहीं कोई पूछ नहीं।

आज देश के किसानों में करीब 80 प्रतिशत सीमांत और छोटे किसान हैं और बाकी मुट्ठी भर वे किसान हैं, जिनके पास बड़ी जमींदारी है। यही बड़े किसान किसान हित की बात कर अपने हित साध लेते हैं। छोटे किसानों के पास ऐसा कोई मंच नहीं, जहां वे अपनी बात रख सकें। आज भी इन सीमांत किसानों की देश के कुल कृषि उत्पादन में 50 प्रतिशत से ज्यादा की भागीदारी है।

मतलब साफ है कि यदि 80 प्रतिशत किसानों को न सुनकर हम अन्य ओर भटक जाएं, तो किसान और किसानी के प्रति न्याय नहीं कर पाएंगे। लोकतंत्र भी यही सिखाता है। जमींदार लोग तो खेती-बाड़ी को उद्योग के रूप में ही देखते हैं, इसलिए उनके मुद्दे भी उसी तरह के होते हैं। वैसे भी सरकारी योजनाओं के सारे लाभ इन्हीं के हिस्से में आते हैं। सीमांत और छोटे किसानों को न तो इस बारे में कुछ पता होता है और न ही इस तरह के लाभ उठाने की उनकी पहुंच होती है, क्योंकि हमारा वर्तमान सरकारी ढांचा ही ऐसा है।

इस आंदोलन का नेतृत्व करने वालों और उनकी मांग की समीक्षा कर लें, तो ये किसी भी हालत में किसान के दर्जे में नहीं रखे जा सकते। हमें इस पर भी विचार करना चाहिए कि पिछले करीब 75 साल में हमने कितने सीमांत और छोटे किसान खोए हैं और इस दरम्यान बड़ी जमींदारी किस हद तक बढ़ी, क्योंकि यह भी देखने में आया है कि छोटे किसानों ने अभाव में अपने खेत बड़े किसानों को बेच दिए। आंदोलन में इस तरह के मुद्दे नहीं उठते। 

किसानों के नाम पर बनने वाले तमाम तरह के कानूनों के लाभ व उनकी सार्थकता तब तक संभव नहीं, जब तक किसान और किसानी की सही परिभाषा न गढ़ ली जाए। बड़े जमींदार छोटे किसानों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। सीमांत किसानों के मुद्दे ही अलग हैं। बड़ी जमींदारी पर केंद्रित निर्णयों से छोटे और सीमांत किसानों के साथ न्याय नहीं होगा। 

इसे इस तरह से भी देखा जा सकता है कि फसलों का एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) कुछ भी तय हो जाए, छोटे किसानों के पल्ले कुछ नहीं पड़ने वाला, क्योंकि जमींदार या बिचौलिये उनको लूट लेते हैं, क्योंकि हमारे पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे कि हम सीमांत और छोटे किसानों से सीधे खरीदारी तय कर उनके लाभ सुनिश्चित कर दें। ये अनुभव देश भर में की गई उस साइकिल यात्रा के आधार पर साझा किए जा रहे हैं, जो किसान और किसानी को समझने के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तथा उत्तराखंड से पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी तक की गई थी। 

उस यात्रा के दौरान छोटे किसानों के संपर्क में आने का अवसर मिला। उनका कहना था कि वे तमाम तरह की सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ इसलिए नहीं उठा पाते, क्योंकि या तो बड़े जमींदार उन योजनाओं का लाभ पहले हड़प लेते हैं या फिर छोटे किसानों के पास जानकारी का अभाव है। ऐसी कोई व्यवस्था भी सरकारी तंत्र में नहीं दिखती, जो सीधे छोटे किसानों तक पहुंच सके।

ऐसे में इस तरह के आंदोलन सीमांत किसानों की बोली नहीं बोलते, महत्वाकांक्षा व अहंकार से भी जुड़ जाते हैं। इस लंबे आंदोलन के कारण किसानों के प्रति अब आम जनों व शहरी लोगों में रोष बढ़ने लगा है। यह विडंबना ही है कि इस अड़ियलपन से किसानों के प्रति सम्मान घटने लगा है। देश हमेशा अन्नदाताओं के साथ रहा है। लेकिन आज इस आंदोलन के साथ तमाम तरह के विवाद जुड़ने के कारण इसका मूल स्वभाव तितर-बितर हो गया है। समय आ चुका है कि हम किसानों की परिभाषा नए सिरे से तय करें। किसान वह है, जो धूप और बारिश झेलता है, जो फसल तैयार करने के  लिए खेत में जूझता रहता है। हम किसानी की पहचान कर लें, तो वैसे ही कई विवाद खत्म हो जाएंगे।

किसानी की परिभाषा को न्यायपालिका को भी संज्ञान में लेना चाहिए। उसने किसानों से कहा भी है कि जब कोई मामला अदालत में हो, तो फिर प्रदर्शन का कोई मतलब नहीं रह जाता। ऐसा अड़ियल स्वभाव इस देश के किसान का हो ही नहीं सकता। आंदोलन की मूल भावना अपने अधिकारों के लिए पहल करने व किसी अन्य वर्ग को नुकसान न पहुंचाते हुए सामूहिक हित की पैरवी से जुड़ी होती है। 

आज यह आंदोलन अपने हितों के अलावा राजनीतिक हितों पर भी केंद्रित होता दिखता है, जिसमें सीमांत और छोटे किसानों की कोई चिंता नहीं दिखाई देती। सर्वोच्च न्यायालय को इस आंदोलन की नए सिरे से समीक्षा करनी चाहिए कि यह इस देश के सीमांत और छोटे किसानों के हित में कितना है, क्योंकि यह आंदोलन तो किसानों के हित से बहुत ऊपर उठ चुका है, जहां से न तो खेत दिखाई देते हैं और न ही किसानों के मुद्दे।

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