क्रांतिकारी: यह विद्यालय अब दुर्गा भाभी का स्मारक है

sudhir vidyarthi सुधीर विद्यार्थी
Updated Fri, 08 Oct 2021 05:24 AM IST

सार

लखनऊ मांटेसरी इंटर कॉलेज भाभी का स्मारक भी है और उनकी मृत्यु के बाद यहां उनकी आवक्ष प्रतिमा लग गई है। क्रांतिकारी आंदोलन में भाभी अपने पति भगवतीचरण वोहरा के साथ सक्रिय थीं। दोनों चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व वाले 'हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ’ के शीर्ष सदस्यों में शुमार थे। 
दुर्गा भाभी
दुर्गा भाभी - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

लखनऊ में पुराना किला कहे जाने वाले इलाके में आज वर्षों बाद आया हूं, जहां का लखनऊ मांटेसरी इंटर कॉलेज एक समय हमारा आश्रय-स्थल था। इसकी स्थापना प्रसिद्ध क्रांतिकारी दुर्गा भाभी ने आजादी के बाद की थी। मॉडल हाउस में जहां मोहनलाल गौतम रहा करते थे, उस मकान के बीच का हिस्सा उन्होंने किराये पर ले लिया था और कैंट रोड पर पांच बच्चों को लेकर ‘लखनऊ मांटेसरी’ की स्थापना की थी। यह 1940 की बात है। 
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धीरे-धीरे स्कूल बढ़ने लगा और जल्दी ही पास की एक बिल्डिंग में स्थान मिल गया। यह स्कूल ही आज लखनऊ मांटेसरी इंटर कॉलेज के नाम से जाना जाता है। इसमें एक ओर बने पांच हॉलनुमा कमरों में भाभी ने ‘शहीद स्मारक एवं स्वतंत्रता संग्राम शोध केंद्र’ की स्थापना की थी। भाभी के निधन के बाद इस प्रांगण में उनकी एक आवक्ष प्रतिमा लग गई है।


क्रांतिकारी आंदोलन में भाभी अपने पति भगवतीचरण वोहरा के साथ सक्रिय थीं। दोनों चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व वाले 'हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ’ के शीर्ष सदस्यों में शुमार थे। भगवतीचरण को सशस्त्र क्रांतिकारी संग्राम का मस्तिष्क कहा जाता था, जिन्होंने ‘नौजवान भारत सभा’ के घोषणापत्र के साथ ही गांधी जी के ‘कल्ट ऑफ द बम’ के जवाब में 'बम का दर्शन’ जैसे तर्कपूर्ण दस्तावेजों को लिपिबद्ध किया। 

भगवतीचरण दल को आर्थिक मदद भी देते थे। साइमन कमीशन के भारत आने के प्रतिरोध का नेतृत्व करते हुए जब लाला लाजपत राय शहीद हो गए, तब आजाद, भगत सिंह और राजगुरु ने लाहौर में पुलिस अफसर सांडर्स को मारकर उसका बदला ले लिया। उसके बाद भगत सिंह छद्म वेश में भाभी के साथ कलकत्ता निकल जाने में कामयाब हो गए। ब्रिटिश सरकार द्वारा जन-विरोधी कानून पास किए जाने के विरोध में आठ अप्रैल, 1929 को भगत सिंह के दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में बम और पर्चे फेंके जाने से पहले भाभी और सुशीला दीदी ने अपने रक्त से तिलक कर उन्हें अंतिम विदाई दी थी। वह बहुत मार्मिक दृश्य था।

उस घटना के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने वहीं असेंबली में गिरफ्तारी दे दी। कुछ समय बाद उन्हें छुड़ाने की कोशिशें फिर शुरू हुईं। बम बनाए गए, जिनमें से एक का परीक्षण करते हुए भाभी के पति भगवतीचरण शहीद हो गए। पर भाभी चुप नहीं बैठीं। अपने तीन साल के बेटे की चिंता न कर वह विप्लव-पथ पर अडिग चलती रहीं। लाहौर में भगत सिंह और दत्त को जेल से छुड़ाने के लिए जब आजाद के नेतृत्व में क्रांतिकारी रवाना हुए, तब भाभी ने कहा, ‘इस संघर्ष में मुझे भी साथ चलने दें, यह हक सर्वप्रथम मेरा है।’ पर आजाद ने इसकी स्वीकृति नहीं दी। वह योजना भी कामयाब नहीं हो पाई। 

कहा जाता है कि भगत सिंह ने स्वयं ही जेल से बाहर आने के लिए मना कर दिया था। तब भाभी जेल जाकर भगत सिंह से मिलीं। उनके मुकदमे के लिए जगह-जगह जाकर चंदा इकट्ठा किया। फिर वह शची को लेकर बंबई जा पहुंचीं। वहां पृथ्वीसिंह आजाद और सुखदेव राज के साथ लेमिंग्टन रोड पर गवर्नर पर गोलियां चलाईं। पुलिस कोई भेद न पा सकी। भाभी को फरार घोषित कर दिया गया। वारंट में उनका नाम लिखा था शारदा बेन और उनके पुत्र शची का हरीश।

भाभी के लाहौर के तीन और इलाहाबाद के दो मकान जब्त हो गए थे। भगवतीचरण के वारंट पर पहले ही सब कुछ कुर्क हो चुका था। उनके ससुर ने जो 40 हजार रुपये उन्हें दिए थे, उनमें से कुछ क्रांतिकारी कार्यों पर व्यय हो गए थे। बाकी रुपये जिस सज्जन के यहां रखे गए थे, वे मिले नहीं। वह मुझे बताती थीं कि तब राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने उनसे बहुत स्नेहपूर्वक कहा था कि 'बेटी, मेरे यहां आकर रहो।’ भाभी उनके पास पांच-छह महीने रहीं। फिर चली आईं और खुद को गिरफ्तार कराया। बयान देने के लिए उन पर बहुत जोर डाला गया। लेकिन भाभी झुकने वाली कहां थीं? पुलिस वालों ने ही हार मान ली।

आजादी के बाद की राजनीति भाभी को रास नहीं आई और वह संसदीय राजनीति से दूर रहीं। एक बार जब कुछ क्रांतिकारी साथियों ने गाजियाबाद से तार भेजकर भाभी से चुनाव लड़ने की प्रार्थना की, तो भाभी ने उत्तर दिया कि 'चुनाव में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है।’ बाद में उन्होंने अपने जीवन का शेष हिस्सा नई पीढ़ी के निर्माण के लिए अपने इसी विद्यालय को समर्पित कर दिया, जो आज लखनऊ का प्रमुख शिक्षा संस्थान है। 

बाद के दिनों में जब वह बहुत अशक्त हो गईं, तब कुछ दिन बेटे के पास गाजियाबाद जाकर रहीं और वहीं 14 अक्तूबर, 1999 को उनका निधन हो गया। इस विद्यालय में मैं जब कभी भाभी से बातें करने बैठता, तो वह कहतीं, ‘भगवतीचरण (पति) को छोड़कर बाकी सब कुछ पूछ सकते हो। उनकी चर्चा होने पर मैं कई दिन सामान्य नहीं रह पाती।’ पर बातचीत में वह उनके अनेक मार्मिक संस्मरण सुनाती थीं। 

आजादी के संघर्ष में भाभी ने उस समय अपना भाग्य तय कर लिया था, जब स्त्री की स्वाधीनता और उसके अधिकारों के नारे हवा में नहीं थे। भाभी का यह शिक्षण संस्थान उनका स्मारक भी है। हमारी कोशिश है कि अब इसे दुर्गा भाभी लखनऊ मांटेसरी इंटर कॉलेज के नाम से जाना जाए।

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