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प्राकृतिक योग का महत्व, धरती के स्वास्थ्य का उपचार खुद से करें शुरू

  वीर सिंह Published by: वीर सिंह Updated Mon, 21 Jun 2021 03:43 AM IST
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earth - फोटो : shutterstock.com
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मानव प्रजाति होमो सेपियन्स धरती पर जीवित लगभग आठ लाख प्रजातियों में से मात्र एक है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से सभी गुणों में विलक्षण और अद्वितीय है। अद्भुत बौद्धिक शक्ति और चेतना का आश्चर्यजनक स्तर मनुष्य को शेष जातियों से पूरी तरह भिन्न बनाता है। मनुष्य द्वारा विकसित एक और संभवतः सबसे सुंदर कला योग है। योग केवल शारीरिक व्यायाम, एरोबिक्स या प्राणायाम तक सीमित नहीं है। यह सभी जीवन वर्धक गुणों का योग है। जीवन का उत्थान केवल मानव जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन समस्त जीवन रूपों के उत्थान से जुड़ा है, जो धरती माता की गोद में खेलते हैं, जिनका पालन-पोषण प्रकृति करती है और जो जीवन विकास यात्रा में धरती पर मानव जाति से बहुत पहले अवतरित हुए हैं। योग जीव का विषय नहीं है। यह जीवन का विषय है। 



जब हम केवल अपने स्वास्थ्य और कल्याण की वस्तु बनाकर इसे प्रकृति और पर्यावरण के सरोकार से काट देते हैं, तो योग अपने वास्तविक और गहरे अर्थ से दूर हो जाता है। हमारे समकालीन विश्व में जीवन सिकुड़ रहा है, क्योंकि गैर-मानव प्रजातियां पूरी तरह से तनाव में हैं, अनेक प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं और अनेक विलुप्त होने के कगार पर खड़ी हैं। जैव विविधता निरंतर घट रही है। प्राकृतिक योग का पतन, जीवन का संकुचन, और मानव जाति का स्वास्थ्य और कल्याण की अधोगति साथ-साथ चलने वाली घटनाएं हैं। संपूर्ण जीवन का स्वास्थ्य और कल्याण तथा मानव जाति का स्वास्थ्य और कल्याण एक ही धुरी से जुड़े हैं। 


जीवन का संकट प्रकृति के संकट में निहित है। प्रकृति के संकट और पर्यावरणीय व्यवधान वस्तुनिष्ठ योग (प्रकृति संवर्धन से विच्छेदित योग) में निहित हैं। योग को इको योग में बदलने से हम पर्यावरण संकट के साथ-साथ  सामाजिक-सांस्कृतिक सभी संकटों से छुटकारा पा सकते हैं। प्रत्येक चीज का प्रत्येक चीज से संबद्ध होना, हर प्रक्रिया का हर प्रक्रिया से संबंध-यही पारिस्थितिकी का नियम है। जीव का उनके पर्यावरण के साथ परस्पर संबंध ही पारिस्थितिकी है। इको योग मानव-प्रकृति संबंध को स्थापित करता है, उन्हें सबल बनाता है और प्राकृतिक संतुलन को पुनःस्थापित करता है। प्रसिद्ध इको दार्शनिक हेनरिक स्कोलीमॉस्की कहते हैं, 'इको योग इस सिद्धांत पर आधारित है कि सारा जीवन ही योग है।' प्राकृतिक विकास जीवन का नवीनीकरण करते चलता है, जैव विविधता को संचित करता है और उसमें निरंतर अभिवृद्धि करता जाता है।

मानव जीवन, जीवन के विकास की घटना से छिटका हुआ नहीं है, बल्कि पूरे जीवन का अभिन्न हिस्सा है। प्रत्येक प्रजाति में विशिष्ट गुण हैं। प्राकृतिक विकास द्वारा मानव प्रजाति को जो अति विशिष्ट गुण प्रदान किए गए हैं, उनमें असाधारण बौद्धिक स्थितियां सम्मिलित हैं। ये शक्तियां प्राकृतिक विकास के डिजाइन की विशेषता हैं। यह प्राकृतिक विकास के रहस्य में निहित योग है। योग स्वयं में इको योग ही है। जीवन की घटना का योग प्रकाश द्वारा बीजित पारिस्थितिक प्रक्रियाओं से उत्पन्न होता है और पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र के भीतर विकास द्वारा पोषित होता है। प्राकृतिक विकास द्वारा प्रदत्त बौद्धिक शक्तियों के कारण हम मनुष्य जैव-भौतिक आयाम, जीवों के अंतर्संबंधों और जीवन प्रक्रियाओं की घटना को समझ सकते हैं। प्रकृति को महत्व देना, सभी प्रजातियों की रक्षा करना, पारिस्थितिक तंत्र का संरक्षण करना, मनुष्य और अन्य प्रजातियों और उनके पर्यावरण के बीच गहरे संबंध को प्रोत्साहित करना, धरती माता के प्रति श्रद्धापूर्ण व्यवहार रखना-ये सभी गुण हमारे इको योग के सकारात्मक आयाम हैं।

यदि हम स्वयं को इको योग से दूर रखते हैं, तो केवल बॉडी फिटनेस तक सीमित रखने वाले योग के सहारे जीवन के अक्षय विकास का मार्ग प्रशस्त नहीं कर सकते। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा संयुक्त राष्ट्र को दिए गए सुझाव के बाद 2015 से प्रतिवर्ष 21 जून को योग दिवस मनाया जाता है। लेकिन उसके बाद से दुनिया एक वैश्विक महामारी का दंश भी झेल रही है। पिछले वर्ष योग दिवस महामारी के बीच मना था, इस बार भी वह महामारी के साये में मनाया जा रहा है। इस बार हमें यह सबक मिला है कि ऑक्सीजन का अभाव किस तरह जीवन नैया पलट सकता है! ऑक्सीजन प्रकाश संश्लेषण से बनता है, जिसके लिए हमारे परिवेश पेड़-पौधे से भरे होने चाहिए। हमारी धरती पर जैव विविधता से धड़कते वन होने चाहिए। हमारे समुद्र, झील, नदियां-सब स्वच्छ जल धारण करते हों। हमारी मिट्टी स्वस्थ हो। हमारा वातावरण विषैली गैसों से मुक्त हो। और हमारी जीवन प्रणालियां पारिस्थितिक विकास की अनुगामी हों। हमारे कर्म का यही योग इको योग अर्थात पारिस्थितिक योग है। 

कंकरीट के निरंतर उभरते जंगलों में हम कब तक अपने वायु को चलताऊ योग का संबल दे पाएंगे? मिट्टी, पानी और बयार के निरंतर बढ़ते संकट में हम कब तक अपना अस्तित्व बचाए रखेंगे? इको योग को मन-वचन-कर्म और विधि-विधान से व्यवहार में लाने से हमें प्रसन्नता से भरे भविष्य में प्रवेश का सुअवसर मिलेगा। इको योग पृथ्वी को पुनः स्वस्थ करने की एक कला है। पृथ्वी के स्वास्थ्य की शुरुआत स्वयं के उपचार से होनी चाहिए। हम जानते हैं कि हमारे ग्रह पर जीवन खतरे में है। ग्रह की पारिस्थितिक अखंडता दांव पर लगी है, जो महामारी की अपनी अखंडता के खतरे का प्रकटीकरण है।

इको योग हमारे जैवमंडल की पारिस्थितिक अखंडता को पुनः स्थापित करने की कला है। यह हमारी अपनी सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक अखंडता सुनिश्चित करने की कला है। हम अपनी धरती को पुनः अधिकतम हरियाली से आच्छादित कर प्रकाश संश्लेषण को उसके चरम तक ले जाएं, जैव विविधता को संरक्षण दें, मिट्टी का स्वास्थ्य बनाए रखें, धरती के जलाशयों की स्वच्छता कायम रख सकें, अपने वायुमंडल में जहरीली गैस का उत्सर्जन न होने दें और अपनी सामाजिक-आर्थिक विकास प्रणालियों को अक्षय विकास के मार्ग पर ले आएं, तो निश्चित रूप से इको योगी बन जाएंगे और पृथ्वी पर पारिस्थितिक न्याय कर अपने स्वास्थ्य और अपने अस्तित्व के लिए न्याय कर रहे होंगे।

-पूर्व प्रोफेसर, जीबी पंत कृषि एवं प्रोद्यौगिकी विश्वविद्यालय

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