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विजय दिवसः देश के 'महावीर' का सम्मान

अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 16 Dec 2014 02:01 PM IST
bangladesh war 1971.
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16 दिसंबर 1971 को बांग्लादेश की आजादी दिलाने वाले भारतीय जांबाजों को बांग्लादेश की सरकार की ओर से आजादी के जश्न में शामिल होने के लिए मिले न्योते पर उत्तराखंड के लेफ्टिनेंट जनरल आनंद स्वरूप (रिटायर) वहां गए हैं।

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अदम्य साहस के लिए महावीर चक्र से सम्मानित लेफ्टिनेंट जनरल स्वरूप (तत्कालीन ब्रिगेड कमांडर) की किलो फोर्स ब्रिगेड ने चटगांव के क्षेत्र में मोर्चा संभाला था। उनकी कमान में मुक्त वाहिनी के लोग भी थे, जिनसे तब हुई दोस्ती आज भी जनरल स्वरूप को याद है।


ले.ज. स्वरूप सबसे ज्यादा उत्सुक 13 दिन चले युद्ध के दौरान मित्र बने लोगों से मिलने को लेकर हैं। जनरल स्वरूप ने बताया कि बांग्लादेश के आजादी दिवस पर वहां से मिले निमंत्रण पर मैं जा रहा हूं। वहां एक बार पहले भी बुलाया था, लेकिन तब जा नहीं पाया। इस बार वहां जाने का मुख्य उद्देश्य पुराने साथियों से मिलना है।

जिस ब्रिगेड को मैंने कमान किया उसके अधीन भारतीय सेना के अलावा मुक्ति वाहिनी के लोग भी थे। युद्ध के दौरान मुक्ति वाहिनी के कई लोगों से दोस्ती हुई थी, जिनसे अब जाकर दोबारा मिलने का अवसर मिलेगा। यह मौका पर युद्ध में मिले जीत के जश्न के साथ पुराने साथियों से मिलने के चलते भावुक भी रहेगा।

सिर्फ तीन दिन में फेनी पर कब्जा

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23 माउंटेन डिविजन की किलो फोर्स ब्रिगेड कमांड कर रहे ब्रिगेडियर स्वरूप के अधीन उस समय दो भारतीय सेना की बटालियनें, बांग्लादेश की दो बटालियनें, एक बीएसएफ और सीआरपीएफ बटालियन और आर्टिलरी थी।

उनके जिम्मे एक महत्वपूर्ण टास्क था, जिसमें फेनी पर कब्जा कर चटगांव का ढाका से संपर्क खत्म करना था। 3 दिसंबर को किलो ब्रिगेड ने अभियान शुरू कर 6 दिसंबर को फेनी पर कब्जा कर लिया। 15 दिसंबर को चटगांव पर किलो फोर्स पहुंच गई, जिसके अगले दिन ढाका में जनरल एएके नियाजी ने आत्मसमर्पण कर दिया।

भारत में विजय दिवस

1971 के युद्ध में पाकिस्तानी सेना 90 हजार सैनिकों और अधिकारियों को ढाका में आत्मसमर्पण करवाने की याद में भारतीय सेना हर वर्ष 16 दिसंबर को विजय दिवस मनाती है।

उत्तराखंड के जांबाजों ने दिखाया था दम
शहीद - 248
युद्ध अपंग - 78
वीरता पदक विजेता - 57
महावीर चक्र विजेता - 5

कुल - अलंकृत सैनिक - 74

देहरादून से - 36 (पांच मरणोपरांत)
अल्मोड़ा से - 4
बागेश्वर से - 7 ( दो मरणोपरांत)
चमोली से - 2 (मरणोपरांत)
हरिद्वार से - 1
पौड़ी से - 7 (पांच मरणोपरांत)
नैनीताल से - 6
पिथारागढ़ से - 9 (3 मरणोपरांत)
टिहरी और यूएस नगर से - 2

शूरवीरों की धरती है उत्तराखंड
1971 युद्ध में दूसरे सर्वोच्च सैन्य सम्मान महावीर चक्र से मरणोपरांत उत्तराखंड के राइफलमैन अनसुया प्रसाद और लेफ्टिनेंट वेद प्रकाश घई अलंकृत हुए। वहीं लेफ्टिनेंट जनरल आनंद स्वरूप, आनरेरी कैप्टन वीर बहादुर पुन, रियर एडमिरल संतोष कुमार गुप्ता को जीवित रहते हुए एमवीसी दिया गया।

इसके अलावा अन्य राज्यों से यहां आकर रहने लगे 1971 युद्ध के महावीर चक्र से सम्मानित लेफ्टिनेंट जनरल हनुत सिंह और मेजर जनरल शमशेर सिंह भी हैं। इसके साथ दस शूरवीरों को मरणोपरांत वीरचक्र मिला जबकि 21 को जीवित रहते हुए यह सम्मान हासिल हुआ। जबकि 20 सैनिकों को सेना मेडल मिला, जिसमें तीन मरणोपरांत हैं।

14 दिन में पाक को चटाई थी धूल

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नवीन भट्ट/ रानीखेत (अल्मोड़ा)

साल 1971, दिन तीन दिसंबर, समय रात 8.45 बजे। अचानक दुश्मन देश की ओर से अखनूर के छंब सेक्टर में भारी गोलाबारी शुरू होती है।

छंब सेक्टर में 7 गढ़वाल रायफल की चार्ली कंपनी मोर्चे पर डटी थी, दुश्मन देश मनव्वर तवी स्थित बडियाला ब्रिज पर कब्जा करना चाहता था, लेकिन भारतीय सेना के अदम्य साहस ने न सिर्फ पाकिस्तानी सैनिकों के छक्के छुड़ाए, बल्कि बांग्लादेश के रूप में नए देश को दुनिया के मानचित्र में जगह दी।

ले. जनरल मोहन चंद्र भंडारी ने 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान बेहद कठिन छंब सेक्टर में हुए भीषण युद्ध का आंखों देखा हाल बयां किया। तब वह छंब सेक्टर में कंपनी कमांडर थे। केवल छंब सेक्टर में 440 भारतीय सैनिक शहीद हुए, जबकि 723 सैनिक जख्मी हुए। पाकिस्तान की ओर से 1385 सैनिक मारे गए और 4120 सैनिक घायल हुए।
 
रक्षा मामलों के विशेषज्ञ श्री भंडारी बताते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यह दूसरा सबसे भयानक युद्ध था। भारतीय सशस्त्र सेना के जांबाजों ने अदम्य साहस दिखाते हुए सिर्फ 14 दिनों में पाकिस्तान को धूल चटाई। ले. जनरल भंडारी 1971 में 7 गढ़वाल रायफल में थे। वह बताते हैं कि अक्तूबर माह से ही युद्ध की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी।

उनकी कंपनी 7 गढ़वाल रायफल्स चार्ली अखनूर के छंब सेक्टर में तैनात थी। कंपनी को 52 इन्फेंट्री का हिस्सा बनाया गया था। उनके साथ आर्मर्ड और आर्टलरी ब्रिगेड भी तैनात थी। तीन दिसंबर की शाम साढ़े छह बजे अचानक पाकिस्तान ने राजस्थान और पंजाब के एयरक्राफ्ट पर हमला बोला।

रात्रि 8.45 पर चार टैंक से छम सेक्टर के खौड़ नामक स्थान पर भारी गोलाबारी शुरू कर दी। उनकी कंपनी ने भी जवाबी कार्रवाई शुरू की और यह तय किया गया दुश्मन देश को पूरब की दिशा में आगे नहीं बढ़ने दिया जाएगा। युद्ध चार, पांच, छह और सात दिसंबर को भी चला।

दुश्मन देश मुनव्वरतवी के किनारे बडियाला ब्रिज पर कब्जा करना चाहता था, लेकिन वहां भी उन्हें मुंह की खानी पड़ी। भारतीय सेना ने धड़ क्रासिंग, रायपुर क्रासिंग, और ठाकुर चक पर जवाबी हमले भी बोले।

9 दिसंबर की सुबह पाकिस्तानी के चार टैंकर छंब सेक्टर की ओर बढ़ रह थे, इसी दौरान इंडियन एयर फोर्स ने दुश्मनों के इरादों को नाकाम कर दिया और दुश्मन देश के 10-15 टैंक उड़ा दिए। 15 दिसंबर को भारतीय सेना ने ढाका पर कब्जा कर लिया। उन्होंने कहा कि इस युद्ध को 14 डेज लाइटिंग युद्ध के नाम से जाना जाता है।

1971 के पूरे युद्ध में भारत की तरफ से 1500 जवानों ने शहादत दी, जबकि छह हजार सैनिक घायल हुए।  पाकिस्तान के नौ हजार सैनिक शहीद हुए और साढ़े सात हजार सैनिक घायल हुए। जबकि 93 हजार सैनिकों ने पाकिस्तानी सेना का नेतृत्व कर रहे जनरल एके नियाजी साथ ढाका में भारतीय कमांडर ले. जनरल जगदीश सिंह अरोड़ा के सम्मुख आत्मसमर्पण कर दिया।
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