नरेंद्र गिरि: बैरागी और संन्यासियों के बीच सेतु बने थे श्रीमहंत, तल्खियां बढ़ने पर भी सफलता से कराया था कुंभ का आयोजन

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हरिद्वार Published by: अलका त्यागी Updated Tue, 21 Sep 2021 08:30 PM IST

सार

Mahant Narendra Giri Death:  महाकुंभ की अवधि अप्रैल में मात्र एक माह की थी। बैरागी संतों के लिए बैरागी कैंप में अस्थायी तौर पर जमीन भी आवंटित देरी से हुई। 
महंत नरेंद्र गिरि
महंत नरेंद्र गिरि - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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विस्तार

महाकुंभ में श्रीमहंत नरेंद्र गिरि ने बैरागी और संन्यासी संतों के बीच सेतु का काम किया था। कुंभ अवधि और सुविधाओं को लेकर दोनों के बीच तल्खियां बढ़ गई थीं। खुद श्रीमहंत नरेंद्र गिरि भी बैरागियों के निशाने पर आ गए थे। श्रीमहंत नरेंद्र गिरि ने सभी 13 अखाड़ों के समन्वय से कुंभ का आयोजन कराया और हरिद्वार कुंभ उनका आखिरी कुंभ हुआ।
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नरेंद्र गिरि: ...जब कुंभ को सांकेतिक कराने पर झेली थी संतों की नाराजगी, संक्रमित होने के बाद नहीं कर पाए थे शाही स्नान


महाकुंभ की अवधि अप्रैल में मात्र एक माह की थी। बैरागी संतों के लिए बैरागी कैंप में अस्थायी तौर पर जमीन भी आवंटित देरी से हुई। बैरागी संतों ने सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग करते रहे। प्रशासन और शासन बैरागी संतों के लिए पंडाल लगाने के पक्ष में नहीं था। बैरागी संतों ने अखाड़ा परिषद से अलग होने की घोषणा कर दी थी। 



श्रीमहंत नरेंद्र गिरि से भी नाराजगी जताई थी। आरोप लगा कि अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत नरेंद्र गिरि और महामंत्री हरिगिरि बैरागी कैंप सुविधाओं की तरफ ध्यान नहीं दे रहे हैं। वह केवल संन्यासी अखाड़ों को सुविधाएं दिलाने में लगे हुए हैं। इससे महाकुंभ में सबसे अधिक बैरागी संत आने के बाद भी उनकी उपेक्षा की जा रही है। नरेंद्र गिरि ने बैरागी और संन्यासी संतों के बीच समन्वय बनाकर शासन और प्रशासन पर दबाव बनाया और मूलभूत सुविधाएं मुहैया करवाई थी। 

स्वामी कैलाशानंद को बनाया निरंजनी पीठाधीश्वर

अखाड़ा परिषद अध्यक्ष नरेंद्र गिरि ने कुंभ के दौरान स्वामी कैलाशानंद को श्री निरंजनी का पीठाधीश्वर बनाकर अपना लोहा मनवाया था। कई संत नरेंद्र गिरि के फैसले के विरोध में थे। लेकिन नरेंद्र गिरि ने स्वामी प्रज्ञानंद गिरि की जगह स्वामी कैलाशानंद को पीठाधीश्वर बनाकर विवाद का पटाक्षेप किया। इसके बाद खुद नरेंद्र गिरि कई संतों के निशाने पर भी आए थे। 

श्री निरंजनी के पीठाधीश्वर स्वामी प्रज्ञानंद थे। कुंभ के दौरान अखाड़ा परिषद अध्यक्ष एवं श्री निरंजनी अखाड़ा के श्रीमहंत नरेंद्र गिरि ने स्वामी प्रज्ञानंद को अखाड़े से बाहर का रास्ता दिखा दिया। आरोप था कि पीठाधीश्वर बनने के बाद स्वामी प्रज्ञानंद कभी हरिद्वार अखाड़ा में नहीं आए। इसमें काफी विवाद भी हुआ। स्वामी कैलाशानंद को पीठाधीश्वर की गद्दी पर बैठाया गया। इसका कई बड़े संतों ने विरोध भी किया। 

पुरी मढ़ी से गिरि मढ़ी के संत बने थे 
60 वर्षीय श्रीमहंत नरेंद्र गिरि प्रयागराज मठ बाघंबरी पीठ लेटे हनुमान के महंत से पहले नागा संन्यासियों की पुरी मढ़ी के संत थे। श्रीमहंत ने पुरी मढ़ी छोड़कर गिरि मढ़ी के संत बन गए। इसके बाद ही उनको बाघंबरी पीठ लेटे हनुमान के महंत की पदवी मिली।

प्राचीन कालेज को अग्रणी बनाने में निभाई भूमिका
एसएमजेएन कॉलेज प्रबंध समिति के वरिष्ठ सदस्य एवं अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत नरेंद्र गिरि के निधन पर मंगलवार को कालेज में श्रद्धांजलि सभा हुई। इस मौके पर प्राचार्य डॉ. सुनील कुमार बत्रा ने कहा कि ब्रह्मलीन श्रीमहंत नरेंद्र गिरि सच्चे एवं दिव्य संत थे। सनातन धर्म के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। अधिष्ठाता छात्र कल्याण डॉ. संजय कुमार माहेश्वरी ने कहा कि श्रीमहंत नरेंद्र गिरि ने जनपद के सबसे प्राचीन महाविद्यालय को अग्रणी बनाने के लिए अथक प्रयास किया। इस दौरान मुख्य अनुशासन अधिकारी डॉ. सरस्वती पाठक, डॉ. मनमोहन गुप्ता, डॉ. सरस्वती पाठक, डॉ. तेजवीर सिंह तोमर, विनय थपलियाल, रिकंल गोयल, डॉ. विनीता चौहान, रिचा मिनोचा आदि मौजूद रहे। 

संत समाज को हुई अपूरणीय क्षति
भारतीय हिंदू वाहिनी के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रमोहन कौशिक ने श्रीमहंत नरेंद्र गिरि के निधन पर शोक जताते हुए कहा कि देश और संत समाज को अपूरणीय क्षति हुई है। उन्होंने नरेंद्र गिरि का संत समाज में विशेष योगदान रहा है। संत समाज में उनको सदैव याद किया जाएगा।
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