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गंगा का पानी: वैज्ञानिकों के शोध से बड़ा खुलासा, खत्म हो रहे गंगाजल को अमृत बनाने वाले मित्र जीवाणु

अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून Published by: रेनू सकलानी Updated Sun, 14 Aug 2022 08:53 AM IST
सार

भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों के शोध से बड़ा खुलासा हुआ है। वैज्ञानिकों के अनुसार अलकनंदा नदी और भागीरथी नदियों में माइक्रो इनवर्टेब्रेट्स का कम पाया जाना इस बात का संकेत है कि यहां पानी की गुणवत्ता फिलहाल ठीक नहीं है।

नदियां
नदियां - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

गंगा की सहायक नदियों अलकनंदा और भागीरथी की सेहत ठीक नहीं है। पानी को सेहतमंद बनाने वाले मित्र जीवाणु (माइक्रो इनवर्टेब्रेट्स) प्रदूषण के कारण तेजी से विलुप्त हो रहे हैं। इस बात का खुलासा भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों के शोध से हुआ है।



भागीरथी नदी में गोमुख से लेकर देवप्रयाग तक कई स्थान पर या तो मित्र जीवाणु पूरी तरह नदारद हैं या उनकी संख्या बेहद कम है। यही स्थिति अलकनंदा नदी में माणा से लेकर देवप्रयाग तक पाई गई है। वैज्ञानिकों के अनुसार दोनों नदियों में माइक्रो इनवर्टिब्रेट्स का कम पाया जाना इस बात का संकेत है कि यहां पानी की गुणवत्ता फिलहाल ठीक नहीं है। वैज्ञानिकों की टीम विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रही है।


ये कारण बिगाड़ रहे हैं सेहत
ऑल वेदर रोड के साथ ही नदियों के किनारे बड़े पैमाने पर किए जा रहे विकास कार्यों का मलबा सीधे नदियों में डाला जा रहा है। नदियों के किनारे बसे शहरों के घरों से निकलने वाला गंदा पानी बगैर ट्रीटमेंट के नदियों में प्रवाहित किया जा रहा है। बैट्रियाफोस बैक्टीरिया की वजह से बनी रहती है गंगाजल की शुद्धतापूर्व में जलविज्ञानियों द्वारा किए गए शोध में यह बात सामने आई है कि गंगाजल में बैट्रियाफोस नामक बैक्टीरिया पाया जाता है जो गंगाजल के अंदर रासायनिक क्रियाओं से उत्पन्न होने वाले अवांछनीय पदार्थ को खाता रहता है।

इससे गंगाजल की शुद्धता बनी रहती है। वैज्ञानिकों की माने तो गंगाजल में गंधक की बहुत अधिक मात्रा पाए जाने से भी इसकी शुद्धता बनी रहती है और गंगाजल लंबे समय तक खराब नहीं होता है। महज एक किमी के बहाव में खुद ही गंदगी साफ कर लेती है गंगा वैज्ञानिक शोधों से यह बात भी सामने आई है कि देश की अन्य नदियां पंद्रह से लेकर बीस किलोमीटर के बहाव के बाद खुद को साफ कर पाती हैं और नदियों में पाई जाने वाली गंदगी नदियों की तलहटी में जमा हो जाता है। लेकिन, गंगा महज एक किलोमीटर के बहाव में खुद को साफ कर लेती है।

चिंताजनक पहलू
मित्र जीवाणुओं की संख्या कहीं कहीं 15 फीसदी से भी कम दोनों नदियों में मित्र जीवाणुओं का अध्ययन ईफेमेरोपटेरा, प्लेकोपटेरा, ट्राइकोपटेरा (ईपीटी) के मानकों पर किया गया। यदि किसी नदी के जल में ईपीटी इंडेक्स बीस फीसदी पाया जाता है तो इससे साबित होता है कि जल की गुणवत्ता ठीक है। यदि ईपीटी इंडेक्स तीस फीसदी से अधिक है तो इसका मतलब पानी की गुणवत्ता बहुत ही अच्छी है। लेकिन, दोनों नदियों में कई जगहों ईपीटी का इंडेक्स 15 फीसदी से भी कम पाया गया है जो चिंताजनक पहलू है।

इन वैज्ञानिकों ने किया अध्ययन
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर वीपी उनियाल की देखरेख में डॉ. निखिल सिंह व अन्य ने दोनों नदियों में अलग-अलग स्थानों पर मित्र जीवाणु (माइक्रो इनवर्टिब्रेट्स) की जांच की। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीजी) के तहत वैज्ञानिकों ने अलकनंदा नदी में माणा (बदरीनाथ) से लेकर देवप्रयाग तक और भागीरथी नदी में गोमुख से लेकर देवप्रयाग तक अध्ययन किया। गंगाजल में है ऑक्सीजन सोखने की अद्भुत क्षमता वैज्ञानिकों की माने तो गंगाजल में अन्य नदियों के जल की तुलना में वातावरण से ऑक्सीजन सोखने की क्षमता बहुत अधिक होती है। दूसरी नदियों की तुलना में गंगा में गंदगी को हजम करने की क्षमता 20 गुना अधिक पाई जाती है। 20 गुना अधिक है गंगा में गंदगी हजम करने की क्षमता गंगा की सहायक नदियां भागीरथी, अलकनंदा, महाकाली, करनाली, कोसी, गंडक, सरयू, यमुना, सोन नदी और महानंदा नदियां गंगा की मुख्य सहायक नदियां हैं।

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पाई जाती हैं कई प्रजातियां
गंगा नदी में डॉल्फिन समेत मछलियों को 140, सरीसृपों की 35, स्तनधारी जीवों की 42
प्रजातियां पाई जाती हैं।
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