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सावन 2019: यहां कण-कण में हैं शिव और सती के पदचिह्न, पूरे माह विराजेंगे भगवान भोलेनाथ

कौशल सिखौला, अमर उजाला, हरिद्वार Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Thu, 18 Jul 2019 02:42 PM IST
दक्ष मंदिर
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गंगा और शिव का महापर्व आज से प्रारंभ हो गया है। मान्यता है कि सावन शुरू होते ही भगवान शंकर सूर्योदय के साथ ही कैलाश से कनखल के दक्ष मंदिर में आ जाते हैं। यहां वे पूरे श्रावण मास दक्षेश्वर बनकर विराजमान रहेंगे। 
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राजा दक्ष को दिया वचन निभाने ब्रह्मांड नायक भगवान आशुतोष कनखल नगरी आते हैं। परमात्मा के धरती पर आने के कारण ही देश भर में फैले तमाम शिवालयों में श्रावण मास में जलाभिषेक किया जाता है। श्रावण मास उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में प्रारंभ हो रहा है और इसका दुर्लभ श्रवण नक्षत्र में होगा।

श्रावण से श्रवण का जुड़ना अद्भुत योग

श्रावण से श्रवण का जुड़ना अद्भुत योग माना जाता है। शिव को साक्षात अपनी नजरों से देखने के लिए देश भर के करोड़ों श्रद्धालु हरकी पैड़ी की गंगा से जलभरने श्रावण में पहुंचते हैं। इस जल से भोलेनाथ का जलाभिषेक शिवचौदस के दिन किया जाएगा। 

त्रयोदशी और चर्तुदशी के संगमकाल में हरकी पैड़ी का गंगाजल देश भर के शिव मंदिरों में चढ़ने लगेगा और चर्तुदशी तक ऐसा ही चलता रहेगा। पवित्र श्रावणमास सभी मासों में भगवान शिव को विशेष प्रिय है। खासबात यह भी है कि इस महीने कैलाशपति शंकर हिमालय छोड़कर पृथ्वी पर आते हैं।

कनखल में भगवान शंकर की ससुराल

कनखल में भगवान शंकर की ससुराल है। राजा दक्ष की पुत्री सती से वे इसी नगरी में ब्याहे गए थे। भगवान शंकर और भगवान ब्रह्मा का सीधा रिश्ता इसी नगरी में बना था। राजा दक्ष वास्तव में ब्रह्मा के पुत्र थे। इस नाते इस नगरी में ब्रह्मा और शिव को नाती भी बना दिया। हरिद्वार के कण-कण में शिव के पदचिन्ह विद्यमान हैं।

मान्यता के अनुसार दक्ष के अलावा जिस स्थल पर भगवान शिव की बारात ठहरी थी, वह जनवासा मंदिर आज भी मौजूद है। नीलपर्वत स्थित नीलेश्वर मंदिर में बैठकर शिव ने कनखल में राजा दक्ष के यज्ञ का विध्वंस देखा था। पास में ही बिल्वकेश्वर महादेव हैं, जहां सती ने पार्वती के रूप में दूसरा जन्म लेकर शिव को पाने की तपस्या की थी।

श्रावणमास शिवभक्तों द्वारा जलाभिषेक किया जाता है

शिव पार्वती जब एकाकार हो गए तो वे नील पर्वत पर जा बैठे, जहां आज गौरीशंकर महादेव मंदिर मौजूद है। शिव की पत्नी सती जहां दग्ध हुई थी, वह सतीकुंड भी मौजूद है।

सती की पार्थिव देह जिस स्थल पर रखी गई थी, वह मायादेवी हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी बनी हुई है। तिलभांडेश्वर, दरिद्रभंजन  दुखभंजन मंदिर साक्षात शिव से जुड़े हुए पौराणिक मंदिर हैं। इन मंदिरों में पूरे श्रावणमास शिवभक्तों द्वारा जलाभिषेक किया जाता है। 
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