बेहतर अनुभव के लिए एप चुनें।
INSTALL APP

उत्तराखंड भूमि कानून: भू-कानून विरोध कितना जमीनी, कितना सियासी, यहां जानिए सारे पहलू

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Thu, 15 Jul 2021 12:09 PM IST

सार

भूमि कानून के विरोध के समय को लेकर भी सवाल उठे हैं। प्रदेश में विधानसभा चुनावों में ज्यादा वक्त नहीं रह गया है।  
विज्ञापन
उत्तराखंड
उत्तराखंड - फोटो : Facebook/House of Travel inc.
ख़बर सुनें

विस्तार

उत्तराखंड में एक बार फिर भूमि कानून का मुद्दा जोर पकड़ गया है। यह मुद्दा आज का नहीं है। इस मुद्दे पर खामोश रहने वाले सियासी दल एकाएक मुखर हो चले हैं। जगह-जगह आंदोलन की सुगबुगाहट है। आंदोलनकारियों का तर्क है अगर यह कानून बना रहा तो बाहरी लोगों का प्रदेश की जमीनों पर कब्जा हो जाएगा।
विज्ञापन

आर्थिक रूप से कमजोर स्थानीय लोग बेबस और लाचार होकर अपनी जमीनों को बाहरी लोगों के हाथ में जाते हुए देखते रहेंगे। इसी आधार पर इस मुद्दे को कुछ लोग स्थानीय बनाम बाहरी की शक्ल भी देना चाहते हैं।


अपेक्षाकृत पिछड़े प्रदेश उत्तराखंड में पूंजी निवेश को न्योता देने, आर्थिक जरूरत और तकाजों पर अपनी जमीन को मनचाहे दाम पर मनचाहे शख्स को बेचने की आजादी की वकालत भी एक वर्ग करता है। भूमि कानून के विरोध के समय को लेकर भी सवाल उठे हैं। क्योंकि प्रदेश में विधानसभा चुनावों में ज्यादा वक्त नहीं रह गया है।  

आशंका : नहीं बचेगी उत्तराखंडियों के लिए जमीन
भू-कानून का विरोध करने वालों का तर्क है कि प्रदेश में ‘उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि व्यवस्था सुधार अधिनियम 1950 (अनुकलन एवं उपरांतरण आदेश 2001) (संशोधन) अध्यादेश-2018’ के जरिये जमीन की खरीद फरोख्त के नियमों को इतना लचीला कर दिया गया कि अब कोई भी पूंजीपति प्रदेश में कितनी भी जमीन खरीद सकता है। इसमें में जोड़ी गई दो धाराओं को लेकर विरोध हो रहा है। 

स्वत: बदल जाता है भू उपयोग
इस कानून की धारा 143 (क) में यह प्रावधान है पहाड़ में उद्योग लगाने के लिए भूमिधर स्वयं भूमि बेचे या उससे कोई भूमि खरीदे तो भूमि को अकृषि कराने के लिए अलग से कोई प्रक्रिया नहीं अपनानी होगी। औद्योगिक प्रायोजन से भूमि खरीदने पर भूमि का स्वत: भू उपयोग बदल जाएगा।

एतराज : कानून के लचीले बनने से पहाड़ में खेती की जमीन कम हो जाएगी
अधिनियम की धारा-154 के अनुसार कोई भी किसान 12.5 एकड़ यानी 260 नाली जमीन का मालिक ही हो सकता था। इससे ज्यादा जमीन पर सीलिंग थी लेकिन त्रिवेंद्र सरकार ने अधिनियम की धारा 154 (4) (3) (क) में बदलाव कर उपधारा (2) जोड़ कर न केवल 12.5 एकड़ की बाध्यता को समाप्त कर दिया। बल्कि किसान होने की अनिवार्यता भी खत्म कर दी।

इसी कानून की धारा-156 में संशोधन कर तीस साल के लिए लीज पर जमीन देने का प्रावधान भी कर दिया। ऐसा करने वाला उत्तराखंड देश का एकमात्र राज्य है। चिंता जताई जा रही है कि औद्योगिक निवेश के नाम पर पूंजीपतियों के लिए पहाड़ में भूमि खरीदने का दरवाजा खोल दिया गया। इससे पहाड़ में जमीन नहीं बचेगी और लोग पलायन को मजबूर हो जाएंगे।
विज्ञापन
आगे पढ़ें

राज्य बनने के दिन से है जमीन का खेल

आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है। खबरों को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।

खबर में दी गई जानकारी और सूचना से आप संतुष्ट हैं?
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
  • Downloads

Follow Us

X

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00
X