उत्तराखंड का चुनावी रण: पहाड़ की नारी ने हमेशा आंचल को इंकलाबी परचम बनाया

अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Tue, 30 Nov 2021 04:10 PM IST

सार

Uttarakhand Election 2022: उत्तराखंडी महिलाएं अपने सीमित दायरे और सामाजिक रूढ़िवादिता के बावजूद हर समस्या के समाधान के लिए लड़ाई लड़ने में अग्रिम पंक्ति में रही हैं।
चिपको आंदोलन
चिपको आंदोलन - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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विस्तार

उत्तराखंड की महिलाओं ने चुनौतियों का मुकाबला कर जन आंदोलनों को मुकाम तक पहुंचाया। बात चाहे स्वतंत्रता आंदोलन की हो या राज्य गठन के आंदोलन की। महिलाओं ने अपने संघर्ष से इन आंदोलन को कामयाबी दिलाई है। इसके अलावा प्रदेश में पेड़ को कटाने को रोकने के लिए चिपको आंदोलन और नशे बढ़ती प्रवृत्ति के खिलाफ भी महिलाओं ने आवाज को बुलंद किया। उत्तराखंडी महिलाएं अपने सीमित दायरे और सामाजिक रूढ़िवादिता के बावजूद हर समस्या के समाधान के लिए लड़ाई लड़ने में अग्रिम पंक्ति में रही हैं। उन्होंने अपने आंचल को हमेशा ही इंकलाबी परचम बना दिया।
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स्वतंत्रता आंदोलन
स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को देखा जाए तो उत्तराखंड की नारियों ने इस आंदोलन में अहम भूमिका निभाई है। 1930 में नमक सत्याग्रह व पेशावर कांड की घटनाओं ने पहाड़ी की महिलाओं को सामूहिक रूप से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आंदोलन के लिए प्रेरित किया। 5 मई 1930 को अल्मोड़ा के नंदा देवी मंदिर परिसर में पुरुष आंदोलनकारियों के साथ बड़ी संख्या में महिलाओं ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन किया। जिसमें महिलाओं का नेतृत्व भागुली देवी, कुथी देवी ने किया था। 25 मई 1930 को अल्मोड़ा नगर पालिका में राष्ट्रीय ध्वज फहराने को  रोकने के लिए ब्रिटिश सरकार ने गोरखा सैनिकों को तैनात किया और आंदोलनकारियों पर हमले किए। उस समय बिशनी देवी शाह, दुर्गा देवी पंत, तुलसी देवी रावत, भक्ति देवी त्रिवेदी समेत कई महिलाओं ने राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक बनाने के लिए संगठन खड़ा किया। अल्मोड़ा में आंदोलनकारी महिला कुंती देवी वर्मा,  मंगला देवी, भागीरथी देवी, जीवंती देवी व रेवती देवी को मदद देने के लिए स्वयं बद्री दत्त पांडे, देवी दत्त पंत ने साथ दिया। उनकी वीरता ने पूरे पहाड़ को प्रोत्साहित किया और महिलाओं ने झंडारोहण करने में सफलता मिली।

चिपको आंदोलन
वर्ष 1974 में ठेकेदारी प्रणाली के तहत चमोली जिले के रैणी गांव से चिपको आंदोलन की नींव गौरा देवी ने रखी। जंगल में 2451 पेड़ों की नीलामी के लिए पहाड़ों में इसका भारी विरोध हो रहा था। रैणी गांव की महिलाओं के विरोध प्रदर्शन के बावजूद भी ठेकेदार पेड़ काटने के लिए पहुंचा। जबरन पेड़ों को काटने का प्रयास करने लगे। गौरा देवी गांव की महिलाओं के साथ जंगल पहुंच कर पेड़ काटने का विरोध किया और पेड़ों से चिपक पड़े। इसके बाद पर्यारणविद् सुंदर लाल बहुगुणा ने इस आंदोलन की कमान संभाली और विश्व में पर्यावरण चेतना के चिपको आंदोलन एक मिसाल है।

शराब बंदी के खिलाफ आंदोलन
1960 के दशक में गढ़वाल के पौड़ी, श्रीनगर कोटद्वार, लैंसडान, टिहरी में टिंचरी और कुमाऊं में कच्ची शराब के नाम से शराब का धंधा तेजी से फैल रहा था। पुरुषों में शराब की लत बढ़ रही थी। तभी श्रीनगर गढ़वाल की रेवती उनियाल सामाजिक बुराई शराब के विरुद्ध आवाज बुलंद किया। घर-घर जाकर शराबबंदी के लिए कार्य प्रारंभ कर दिया। रेवती उनियाल के स्थापित महिला संघ में देवेश्वरी खंडूरी, चांदनी काला, शकुंतला देवी तथा अनेक महिलाएं शामिल थी। शराब आंदोलन की सामाजिक पहल 1968 में जाजल (टिहरी) निवासी श्रीमती हेमा देवी ने आगे बढ़ाई। 1968 में महिलाओं के बीच एक ऐसा नाम उभरा जिसने अपने क्षेत्र की महिलाओं को शराब बंदी आंदोलन में लामबंद किया। 1986 में नशा नहीं रोजगार दो नारों के साथ उत्तराखंड संघर्ष वाहनी ने आंदोलन शुरू किया।

मैती आंदोलन

मैती आंदोलन एक भावनात्मक आंदोलन है। जो आज उत्तराखंड की महिलाओं के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हो चुका है। मैती शब्द का अर्थ मायका होता है। इस आंदोलन के प्रणेता  कल्याण सिंह रावत ने महिलाओं व पर्यावरण के बीच एक रचनात्मक एवं भावनात्मक रिश्ता बनाने का प्रयास किया है। इस संगठन का संचालन गांव की सभी अविवाहित महिलाएं मैती नाम से करती हैं। वे इस संगठन के माध्यम से फल, चारा ईंधन तथा जमीन के जल स्तर को बनाए रखने वाले वृक्ष के पौधे तैयार करती हैं। मैती आंदोलन का भावनात्मक पक्ष यह है कि जब कोई लड़की किसी पौधे को अपने हाथों से रोपती है, तो उस पौधे से उसका भावनात्मक रिश्ता जुड़ जाता है। और शायद यही भाव उसे उस पौधे की देखभाल के लिए करने के लिए प्रेरित करता है।

उत्तराखंड राज्य आंदोलन
उत्तराखंड राज्य आंदोलन में महिलाओं की अहम भूमिका रही है। 1994 में उत्तराखंड की महिलाओं ने अलग राज्य की मांग को लेकर सड़कों पर उतर कर आंदोलन किया। उत्तराखंड को अलग राज्य का दर्जा दिलाने में जितना योगदान यहां के पुरुष वर्ग ने दिया उससे कई गुना अधिक योगदान यहां की महिलाओं ने दिया। इस आंदोलन के दौरान घटित मुजफ्फरनगर कांड महिलाओं की सक्रिय भागीदारी की याद दिलाता है। इस आंदोलन के दौरान आंदोलनकारी महिलाएं हंसा धनाई एवं बेलमती चौहान शहीद हो गई थीं। वह सन 1994 का वर्ष ही था जिसने उत्तराखंड की मातृशक्ति को घर-बार चूल्हा-चौका छोड़ हाथों में दराती लिए सड़कों पर उतार दिया था। आंदोलन में स्व. कौशल्या डबराल समेत  सुशीला बलूनी, द्वारिका बिष्ट, कमलापंत, धनेश्वरी देवी, निर्मला बिष्ट, जगदंबा रतूड़ी, शकुंतला गुसाई, स्व. शकुंतला मैठानी, कलावती जोशी, यशोदा रावत, उषा नेगी, विमला कोठियाल  विमला नौटियाल समेत तमाम उत्तराखंड की महिलाओं के संघर्ष से राज्य गठन का सपना साकार हुआ है।
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