काई पो चेः फिल्म कम हमारी खुद की कहानी ज्यादा

रोहित मिश्र Updated Fri, 22 Feb 2013 03:29 PM IST
film review of kai po che
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रेलवे प्लेटफार्म की व्हीलर दुकानों से पिछले कुछ सालों में 'थ्री मिस्टेक ऑफ माइ लाइफ' सबसे ज्यादा बिकने वाली किताब बनकर उभरी है। चेतन भगत के इसी उपन्यास पर अभिषेक कपूर ने फिल्म 'काई पो चे' बनायी गयी है। 'थ्री इडियट्स' की तर्ज पर ही 'काई पो चे' भी उपन्यास पर आधारित एक बेहतर फिल्म साबित होती है।  
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सिनेमाहाल में हम हर वक्त यह नहीं सोचते कि हम कोई फिल्म देख रहे हैं। बल्कि यह ऐसी फिल्म है जिससे पात्रों के साथ हर दर्शक अपने को रिलेट करता है। फिल्म के पात्रों की हर समस्या या खुशी से दर्शकों का वास्ता होता है। उनके रोमांस और सपनों से भी। यह फिल्म कहीं पर भी फिल्म नहीं है। इस फिल्म में भूकंप, गोधरा कांड और गुजरात दंगे विषय के रूप में शामिल हुए हैं। यह फिल्म की सबसे बड़ी खूबसूरती है कि इन घटनाओं की वीभत्सता को दिखाने के बजाय निर्देशक ने इस बात को पकड़ने पर ज्यादा जोर दिया है कि इन घटनाओं से फिल्म के पात्रों की जिंदगी में क्या फर्क पड़ता है।


'काई पो चे' दोस्ती की फिलॉसिफी कहने वाली फिल्म है। कुछ-कुछ अभिषेक कपूर की पिछली फिल्म 'रॉक ऑन' जैसी। दिल चाहता है, 'रॉक ऑन' और 'जिंदगी न मिलेगी दोबारा' के बाद दोस्ती के उतार-चढ़ाव को परिभाषित करने वाली यह एक उम्दा फिल्म है। और हां, काई पो चे का मतलब समझ लीजिए। गुजरात में जब कोई किसी की पतंग काट देता है तो उसके मुंह से आनंद में जो शब्द निकलते हैं वह "काई पो चे" होते हैं।  

सपनों के टूटने और संवरने की कहानी
फिल्म की कहानी तीन दोस्तों गोविंद (राजकुमार यादव), इशांत (सुशांत सिंह राजपूत) और ओमी (अमित साध) के इर्द-गिर्द घूमती हैं। अहमदाबाद के मध्यमवर्गीय परिवारों के इन तीनों लड़कों के कुछ खुद के और कुछ सामूहिक सपने होते हैं। सपने भी ऐसे नहीं जिन्हें पाया न जा सके। गोविंद एक सफल व्यवसायी बनना चाहता हैं। इशांत जो एक क्रिकेटर है, अपनी क्रिकेट अकादमी खोलना चाहता है। ओमी जिसका अपना खुद का कोई बड़ा सपना नहीं होता पर वह इनका साथ देता है। बाद में ओमी अपने मामा के कहने पर एक हिंदूवादी पार्टी का सदस्य बन जाता है और नेता बनना उसका सपना बन जाता है। इशांत की बहन विद्या (अमृता पुरी), गोविंद से प्यार करने लगती है। सबकुछ ठीक चल रहा होता है कि तभी भूंकप आ जाता है।

भूकंप आने के बाद इन तीनों की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। अपनी-अपनी जगह पर सही होने के बावजूद यह एक-दूसरे की राह में आकर खड़े हो जाते हैं। भूकंप के बाद गोधरा कांड होता है। गोधरा स्टेशन में जलायी गयी ट्रेन में ओमी के माता-पिता भी होते हैं। इसके बाद दंगे होने शुरू होते हैं। ओमी के सर एक खास समुदाय के प्रति नफरत का एक ज्वर सवार होता है। उधर इशांत की एकेडमी का सबसे अच्छा खिलाड़ी अली मुसलमान है। दंगे के दिन इशांत और गोविंद अली को बचाने के लिए जाते हैं। यही पर एक के बाद एक कई  नाटकीय घटनाएं होती हैं। एक एसएमएस के जरिए इशांत को गोविंद और विद्या के बीच के अफेयर का पता लगता है। इसी के बाद ही ओमी की गोली से इशांत मारा जाता है। फिल्म दस साल के बाद जाकर सबके सपने पूरी होने की बात कहती है। गोविंद एक बिजनेस मैन है और ओमी एक बड़ा राजनेता। अली भारतीय क्रिकेट टीम का ओपनर है और यहीं इशांत का सपना था।

नायकों का नयापन ही उनकी खूबसूरती
इस फिल्म की खूबसूरती कलाकारों के नएपन में भी है। फिल्म में मुख्य भूमिका निभा रहे सुशांत सिंह, राजकुमार यादव और अमित साध तीनों ही फिल्मों के लिए नए हैं। राजकुमार तो पहले कुछ फिल्मों में दिखे भी हैं पर बाकी दोनों कलाकारों की यह पहली फिल्म है। चूंकि इन कलाकारों की अपनी कोई पिछली इमेज तो थी नहीं इसलिए यह बहुत आसानी से फिल्म के पात्रों में समा जाते हैं।

इशान, ओमी और गोविंद के किरदारों में यह तीनों ही कलाकार बहुत नेचुरल लगे हैं। अभिनय की यह स्वाभाविकता फिल्म की खूबसूरती को बढ़ा देता है। एक भी जगह पर ऐसा नहीं लगा है कि ये फिल्म के लिए संवाद बोल रहे हैं। राजकुमार यादव की घबड़ा-घबड़ा कर बात कहने की अदा उन पर बहुत शूट करती है। सुशांत सिंह राजपूत और अमित साध के रूप में इंडस्ट्री को नए प्रतिभाशाली कलाकार मिले हैं।

इन तीन नायकों के अलावा फिल्म में एक नायिका अमृता पुरी भी है। कहने को तो एक नायक की बहन और दूसरी की प्रेमिका हैं फिल्म में वह दसेक मिनट ही नजर आती हैं। लेकिन जब-जब अमृता पर्दे पर आती हैं वह बड़ी फ्रेश सी लगती हैं। अपने किरदार विद्या की हर जरूरत को पूरा करती हुई। जिसे मैथ्य से डर लगता है और बॉयोलॉजी से प्यार है।

फिल्म का असली नायक कैमरे के पीछे
एक निर्देशक के रूप अभिषेक कपूर की यह तीसरी फिल्म है। इसके पहले अभिषेक आर्यन और रॉक ऑन फिल्म डायरेक्ट कर चुके हैं। एक निर्देशक के रूप में 'काई पो चे' उनकी सबसे सुंदर फिल्म हैं। दोस्ती, उसके बिखराव और फिर उनके रीयूनियन होने का खूबसूरत ताना-बाना अभिषेक 'रॉक ऑन' में बुन चुके हैं। इस फिल्म में वह एक कदम आगे ही निकलते हैं।

दोस्ती की कहानी कहने के साथ अभिषेक को इस फिल्म में अपने पात्रों के साथ घट रहे जीवन की कहानी कहनी थी। हर किरदार का जिंदगी देखने का अपना नजरिया था। हर उस अलग-अलग नजरिये को अभिषेक कपूर बड़ी आसानी से एक नजरिया बनाकर दिखा देते हैं। भूकंप, गोधरा कांड और उसके बाद हुई हिंसा जैसी बड़ी घटनाओं को भी फिल्मी तरीके से न दिखाना निर्देशक की सबसे बड़ी खूबी है। फिल्म के संवाद थोड़े से और बेहतर होने चाहिए थे।  

हर गाना मौके के अनुरूप
आज का हर गाना मौके पर आता है और चुपके से कहानी का हिस्सा बन जाता है। गरबा सॉन्ग 'शहनाई' इस साल नवरात्र पर खूब बजने वाला है। 'सुलझा लेंगे रिश्तों का मंझा' को स्वानंद किरकरे ने जिस खूबसूरती के साथ लिखा है उतनी ही खूबसूरती से अमित त्रिवेदी ने उसे कंपोज किया और गाया है। 'मीठी बोलियां' गाना भी एक बेहद सुंदर गाना है।

क्यों देखें
एक खूबसूरत और संवेदनशील फिल्म देखने के लिए। एक फिल्म जो आपका मनोरंजन तो करती ही है आपको एक किस्म का सुकून भी देती है।

क्यों न देखें
फिल्म के हीरो में यदि आप हीरो वाली बात तलाशते हों। साथ ही कुछ नाटकीयपन भी।

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