Shiddat Movie Review: राजकुमार राव की नकल करते पकड़े गए सनी कौशल, कुणाल देशमुख की एक और कमजोर फिल्म

Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Fri, 01 Oct 2021 05:56 PM IST
शिद्दत
शिद्दत - फोटो : अमर उजाला मुंबई
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Movie Review
शिद्दत
कलाकार
मोहित रैना , सनी कौशल , डायना पेंटी और राधिका मदान
लेखक
धीरज रतन , श्रीधर राघवन और पूजा लाढा सुरती
निर्देशक
कुणाल देशमुख
निर्माता
भूषण कुमार और दिनेश विजन
ओटीटी
डिज्नी प्लस हॉटस्टार
रेटिंग
1/5

कुणाल देशमुख का नाम लेते ही इमरान हाशमी का नाम जुबां पर पैकेज डील में चला आता है। मोहित सूरी के सहायक के तौर पर कुणाल ने अपना निर्देशन करियर शुरू किया और स्वतंत्र निर्देशक बनने के बाद भी उनके सिनेमा पर इमरान हाशमी का ही साया रहा। इमरान हाशमी हिंदी सिनेमा का ऐसा ब्रांड है जिसकी ब्रांडिंग उसके अपनों ने ही खराब कर दी। कमाल के इस अभिनेता की असली अदाकारी कभी दर्शकों तक पहुंचने ही नहीं दी गई। भट्ट कैंप की इसी फिल्मी पाठशाला से निकले निर्देशक कुणाल देशमुख ने पहली बार बजाय इमरान हाशमी के किसी दूसरे हीरो के साथ काम किया है। वैसे फिल्म ‘शिद्दत’ में हीरो जैसा कोई दिखता नहीं है। एक जरूरत से ज्यादा सख्त दिखने की कोशिश करने वाला सरकारी अफसर है और दूसरा खेल के मैदान पर छिछोरापंथी करने वाला एक खिलाड़ी जिसे हॉकी खेलना किसी दोयम दर्जे की जिम्मेदारी सी लगती है। दोनों बहुत ही बनावटी किरदार हैं और वैसी ही बनावटी हैं इनकी हीरोइनें।

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शिद्दत
शिद्दत - फोटो : अमर उजाला मुंबई
फिल्म ‘शिद्दत’ का नाम जितना आकर्षक है, काश कि ये फिल्म उतनी ही आकर्षक बन पाती। नाम और फिल्म के ट्रेलर देखकर यूं लगा था कि ये शिद्दत से प्यार करने वालों की कहानी होगी। लेकिन, गोवा, मुंबई और न्यूयॉर्क में सिनेमा सीखते रहे कुणाल को तो खैर शिद्दत शब्द का एहसास नहीं ही पता होगा, ये फिल्म लिखने वालों ने भी इस शब्द के मायने फिल्म में पिरोने की रत्ती भर भी कोशिश नहीं की है। धीरज रतन ने विक्रम भट्ट के साथ खासा काम किया है। पंजाबी सिनेमा ने उन्हें नाम भी दिया। लेकिन यहां न उनकी कहानी में दम दिखा और न ही संवाद पूरी फिल्म का एक भी ऐसा है कि याद रह जाए। पूजा लाढा सुरती और श्रीधर राघवन जैसे दिग्गजों का नाम सिर्फ फिल्म की ब्रांड वैल्यू बढ़ाने के लिए ही इस्तेमाल किया गया दिखता है।

शिद्दत
शिद्दत - फोटो : अमर उजाला मुंबई
कथा मंडली ने दो जोड़ों को लेकर दो प्रेम कहानियां बनाईं और उन्हें ले जाकर परदेस में जोड़ दिया। शरणार्थी, विदेश में बसने और कुछ कर दिखाने की जिद को शिद्दत का नाम दे दिया। नेशनल स्पोर्ट्स कैंप में हॉकी खेलने वाला अच्छा प्लेयर एक खराब तैरने वाली लड़की पर फिदा हो जाए, बड़ी बात नहीं। लेकिन, जो हरकतें ये हॉकी खिलाड़ी करता दिखता है, ऐसा किसी कैंप में होता नहीं है। और, बदले में महिला खिलाड़ियों का पुरुष खिलाड़ियों की नंगी तस्वीरें खींचना? ये महिला सशक्तीकरण को दिखाने का जिसका भी विचार रहा हो, बहुत घटिया है। बाद में प्रेम, लालसा, आचार, विचार की लंबी बहस है। शाहरुख खान और काजोल जैसे कुछ सीन्स हैं और फिल्म किसी कोल्ड ड्रिंक के विज्ञापन की टैगलाइन जितनी आगे बढ़ने के बाद ढप्पा हो जाती है।

शिद्दत
शिद्दत - फोटो : अमर उजाला मुंबई
फिल्म ‘शिद्दत’ से पहले भी सनी कौशल हीरो बनने की कोशिश ‘भंगड़ा पा ले’ में कर चुके हैं। साइड रोल भी उन्होंने बहुतेरे कर लिए। बड़ा भाई विकी कौशल हीरो है तो छोटा भाई भी कमाल कर ले जाएगा। ये सोच गड़बड़ है। अपारशक्ति खुराना वाली बेंच पर बैठ सनी कौशल को अभिनेता बनने के लिए अभी बहुत मेहनत की जरूरत है। अभिनय करते समय वह अधिकतर तो राजकुमार राव की ही नकल करते दिखते हैं, टिकने के लिए ओरिजनल ही चाहिए यहां। राधिका मदान को लगता है नखरा गुस्से में ही है। लेकिन, नखरा, नजाकत और नकचढ़ा होना तीनों अलग अलग तेवर हैं। इनमें फर्क सीखने के लिए राधिका को कुछ दिन थिएटर करना चाहिए। फिल्म में डायना पेंटी से भी ज्यादा खास कुछ हो नहीं पाया। मोहित रैना इतना ज्यादा दिखने लगे हैं ओटीटी पर इन दिनों कि इस चक्कर में लोग उनका अच्छा काम भी स्किप कर देते हैं।

शिद्दत
शिद्दत - फोटो : अमर उजाला मुंबई
कुणाल देशमुख ने फिल्म ‘शिद्दत’ की एबीसीडी से लेकर एक्सवाईजेड तक कुछ भी करीने से सजाने की कोशिश नहीं की है। कहानी में दम नहीं है। पटकथा में इतने सारे झोल हैं और संगीत भी साल 2021 का नहीं लगता। यूं लगता है जैसे जस्सी और दलेर मेहंदी के किसी पुराने अलबम के गाने उठाकर सचिन जिगर ने फिर से बना दिए हैं। ए श्रीकर प्रसाद ने अपनी तरफ से फिल्म की एडीटिंग चुस्त करने की कोशिश की है लेकिन ये फिल्म 90 मिनट से ज्यादा की नहीं होनी चाहिए थी। अमलेंदु चौधरी का कैमरावर्क बेहतरीन है लेकिन सिर्फ उससे होना भी कुछ नहीं है। डिज्नी प्लस हॉटस्टार की हिंदी फिल्मों की सेलेक्शन टीम को देश का मूड समझने के लिए थोड़ा घूमना फिरना चाहिए। चौक चौबारों पर जाकर देश का मिजाज भी समझना चाहिए। बार बार, लगातार ऐसी कमजोर फिल्में परोसते रहना ओटीटी की ब्रांडिंग के लिए ठीक नही हैं।
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