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Vikram Vedha Review: लखनऊ के वेधा बेताल ने बोली पूरब की लंगड़ी भोजपुरी, वीभत्स से डर कर भागे बाकी नाट्य रस

Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Fri, 30 Sep 2022 07:08 PM IST
सार

‘विक्रम वेधा’ कहने को विक्रम बेताल की लोक कथाओं का फिल्मीकरण है लेकिन ये सिर्फ एक छलावा है। विक्रम बेताल की कथाओं में बेताल जो कहानियां सुनाता है उनका विक्रम या बेताल से कोई लेना देना नहीं होता।

विक्रम वेधा रिव्यू
विक्रम वेधा रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
विक्रम वेधा
कलाकार
ऋतिक रोशन , सैफ अली खान , राधिका आप्टे , रोहित सराफ , योगिता बिहानी , शारिब हाशमी और सत्यदीप मिश्रा आदि
लेखक
पुष्कर , गायत्री , मनोज मुंतशिर और बी ए फिदा
निर्देशक
पुष्कर और गायत्री
निर्माता
रिलायंस एंटरटेनमेंट , टी सीरीज और जियो स्टूडियोज
रिलीज डेट
30 सितंबर 2022
रेटिंग
2/5

विस्तार

बालकनी में स्वस्तिक के चिन्ह बने हैं। गलियारों में गोलियां चल रही हैं। हीरो और विलेन सबका प्रिय भोजन निहारी कुलचा है। यूं लगता है जैसे उत्तर प्रदेश में कोई सात्विक भोजन खाता ही नहीं। नेता भ्रष्ट है तो पंडित है। कमिश्नरेट की अपनी एसटीएफ है। इसमें एसीपी, डीसीपी नही हैं। एक आईजी है। दो एसएसपी हैं। गंगा किनारे खरबूजों की सिंचाई के लिए पानी निकालने के लिए बनने वाले ‘चूहे’ में छिपी पकड़ है। और, हैं जलती आग में जूठी शराब फेंकते सैफ अली खान। उत्तर प्रदेश की पृष्ठभूमि पर बनी एक फिल्म में इतना सब गड़बड़झाला साउथ की रीमेक हिंदी में बनाने वाले साउथ के निर्देशक ही कर सकते हैं। फिल्म का हिंदी में अनुकूलन करने वाले बी ए फिदा अगर निर्माता निर्देशक नीरज पांडे का ही पेन नेम है तो उनके लेखन पर ये फिल्म देखकर तरस आता है। कानपुर का अपराधी होगा तो जाजमऊ के पास किसी टैनरी में ही रहता होगा, ये भी किरदारों के कैरीकेचर बनाने वाले लेखकों की ही सोच का नतीजा है।

विक्रम वेधा में ऋतिक रोशन और सैफ अली खान
विक्रम वेधा में ऋतिक रोशन और सैफ अली खान - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
ऋतिक का एक और प्रयोगवादी सिनेमा
खान सितारों के हिंदी सिनेमा में आगमन और उनके बाद की पीढ़ी में रणबीर कपूर, रणवीर सिंह, कार्तिक आर्यन, आयुष्मान खुराना जैसे सितारों के बीच के संक्रमण काल में जिस एक सितारे ने दर्शकों का खूब प्यार पाया है, वह हैं ऋतिक रोशन नागरथ उर्फ डुग्गू। ऋतिक की भाव भंगिमाएं, उनके नाचने के अंदाज और उनकी हंसी को देखते हुए पूरी एक पीढ़ी जवान हुई है। ऋतिक का हिंदी भाषी क्षेत्रों में मजबूत दर्शक वर्ग है, लेकिन प्रशंसकों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यही होती है कि वे अपने पसंदीदा सितारे को हर बार उसी छवि में देखना चाहते हैं जिसके वे पहली बार दीवाने बने थे। यही वजह है कि ऋतिक रोशन की बेहतरीन अदाकारी से सजी उनकी फिल्में ‘फिजा’, ‘लक्ष्य’, ‘काइट्स’, ‘गुजारिश’, ‘मोहेनजो दारो’ और ‘काबिल’ बॉक्स ऑफिस पर धमाके नहीं कर सकीं। ऋतिक को तमिल फिल्म ‘विक्रम वेधा’ की हिंदी रीमेक आमिर खान के ये न फिल्म करने पर मिली। मेहनत उन्होंने इसमें जी तोड़कर की है। लेकिन, मामला जमता दिख नहीं रहा है।

विक्रम वेधा रिव्यू
विक्रम वेधा रिव्यू - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
साउथ की एक और कमजोर रीमेक
‘विक्रम वेधा’ और ‘लाल सिंह चड्ढा’ दोनों सोशल मीडिया पर बायकॉट ट्रेंड का शिकार रही फिल्में हैं। लेकिन, फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र पार्ट वन शिवा’ की कमाई ने ये भी साबित किया है कि फिल्म अगर युवा पीढ़ी और पारिवारिक दर्शकों को भाती है तो ये बायकॉट ट्रेंड अब खास असर किसी सिनेमा पर नहीं करता। रिलायंस एंटरटेनमेंट की सहयोगी कंपनी वाई नॉट स्टूडियोज की बनाई तमिल फिल्म ‘विक्रम वेधा’ साल 2017 में जब हिट हुई तभी रिलायंस एंटरटेनमेंट की ही दूसरी कंपनी फ्राइडे फिल्मवर्क्स ने इसकी रीमेक बनाने का काम शुरू कर दिया। लेकिन बीच में कोरोना आ गया। तमिल वाली ‘विक्रम वेधा’ भी जी5 पर आ गई। ‘विक्रम वेधा’ कहने को विक्रम बेताल की लोक कथाओं का फिल्मीकरण है लेकिन ये सिर्फ एक छलावा है। विक्रम बेताल की कथाओं में बेताल जो कहानियां सुनाता है उनका विक्रम या बेताल से कोई लेना देना नहीं होता। वह सिर्फ आखिर में सिर्फ एक प्रश्न पूछता है। विक्रम को चुप रहना है। लेकिन प्रश्न ऐसा है कि उसे उत्तर देना ही है। और, जैसे ही विक्रम का मुंह खुलता है। दोनों के बीच की शर्त टूटती है और बेताल फिर पेड़ की डाल पर जा लटकता है। ये क्रम चलता रहता है।

ऋतिक रोशन, पुष्कर, गायत्री और सैफ अली खान
ऋतिक रोशन, पुष्कर, गायत्री और सैफ अली खान - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अवध को समझने में चूके पुष्कर गायत्री
यहां बेताल यानी वेधा अपनी कहानियां सुनाता है। अपनी मानसिक दशा को बयान करते किस्से सुनाता है। उसका उद्देश्य यहां विक्रम से किसी गूढ़ नैतिक प्रश्न का उत्तर पाना नहीं है बल्कि उसके सवाल सच और झूठ की पारंपरिक परिभाषाओं को बदलने की कोशिश करते हैं। विक्रम एक पुलिस अफसर है। सत्य की जीत कराने की उसने शपथ ली है। कहानी इस बार तमिलनाडु की बस्तियों से निकलकर उत्तर प्रदेश की राजधानी तक आ पहुंची है। और, हिंदी फिल्में बनाने वालों के लिए अब भी उत्तर प्रदेश और बिहार की बोली बस भोजपुरी ही है। उनके लिए मगही, मैथिली का फर्क समझना तो दूर की बात है, लखनऊ और आसपास के क्षेत्र की अवधी भी इनके लिए दूर की कौड़ी है। फिल्म ‘विक्रम वेधा’ की पहली कमजोर कड़ी यही है जो ऋतिक के किरदार को पहले ही संवाद में लंगड़ा कर देती है। विक्रम को इस बार भी किसी तरह वेधा को शिकंजे में कसना है और कहानी का शिकंजा इस बार देसी अंदाज वाला न होकर बिल्कुल बॉलीवुडिया है।

विक्रम वेधा रिव्यू
विक्रम वेधा रिव्यू - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्मी चमक में खोया असली तेवर
फिल्म ‘विक्रम वेधा’ को बनाने का अंदाज इसकी दूसरी कमजोर कड़ी है। मूल तमिल फिल्म का देसीपन ही उस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत रही। विजय सेतुपति और आर माधवन दोनों ने क्रमश: वेधा और विक्रम के किरदार तमिल में जिस तरह से खांटी अनगढ़ अंदाज में किए, उसमें किसी तरह की बनावट नहीं दिखी। साथ ही मूल कहानी की क्षेपक कथाओं ने और इन क्षेपक कथाओं के सितारों ने मूल तमिल फिल्म को मजबूत बनाया। यहां फिल्म इस मामले में अपने रीमेक लेखकों से मार खाती है। फिल्म का पूरा फोकस बस ऋतिक रोशन और सैफ अली खान के द्वंद्व पर है। हवा में गोलियां चलती हैं। अट्टहास होते हैं। दीदे फाड़कर कैमरे की तरफ देखकर वीभत्स रस भी पैदा करने की कोशिश की जाती है, लेकिन इन सारी हरकतों में बनावटीपन साफ नजर आता है। यहां फिल्म तीसरी बार गच्चा खाती है।

अबू धाबी का नकली उत्तर प्रदेश
हिंदी में बनी फिल्म ‘विक्रम वेधा’ एक तरह से इस बात का एक और सबक है कि किसी दूसरी भाषा की फिल्म का रीमेक बनाते समय सिर्फ कहानी को ही नई भाषा में नहीं सजा देना होता है। इसके लिए उस कहानी की अंतर्धारा, वहां के लोक का कलेवर और वहां की पृष्ठभूमि भी किसी हीरो से कम नहीं होते। यहां तो उत्तर प्रदेश ही नकली है। अबू धाबी में मेहनत करके इसे बना तो लिया गया लेकिन फिल्म की ये चौथी कमजोर कड़ी साफ पकड़ में आती है। कला निर्देशन की तारीफ इसी में है कि नकली सेट भी असली जैसे लगें, लेकिन ऐसा होता नहीं है। लेखन, निर्देशन, कला निर्देशन और अभिनय के अलावा फिल्म संगीत विभाग में भी मात खाती है। ‘एल्कोहोलिया’ गाना बिना जरूरत के फिल्म में है।और फिल्म की पांचवी कमजोर कड़े के रूप में सिवाय शराब का प्रचार करने और ऋतिक की युवाओं में बनी छवि को खराब करने के ये गाना और कुछ नहीं करता। फिल्म जरूरत से ज्यादा लंबी भी है और ट्रिपल क्लाइमेक्स के चक्कर में दर्शकों के धीरज का जमकर इम्तिहान लेती है।

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