Tokyo Olympic 2021: संघर्ष की आग में तप कर भिवानी के मुक्केबाजों ने पाई ओलंपिक की राह, निश्चय-इस बार नहीं चूकेंगे

नवनीत शर्मा, भिवानी (हरियाणा) Published by: निवेदिता वर्मा Updated Sat, 24 Jul 2021 08:26 AM IST

सार

किसी की आर्थिक हालत खराब थी तो किसी को परिवार से सहयोग नहीं मिला। इसके बावजूद ये अपने लक्ष्य को साधे रहे।  
भिवानी के मुक्केबाज विकास, पूजा और मनीष।
भिवानी के मुक्केबाज विकास, पूजा और मनीष। - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
ख़बर सुनें

विस्तार

टोक्यो ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करने वाले भिवानी के तीनों मुक्केबाजों के लिए यह मुकाम हासिल करना आसान नहीं था। खेल के प्रति जुनून और लगातार संघर्ष की बदौलत इन खिलाड़ियों ने गांव की पगडंडियों से टोक्यो की उड़ान भरी है। कोच संजय श्योराण ने कहा कि जिले के सभी बॉक्सर हालातों से लड़कर यहां तक पहुंचे हैं। किसी की आर्थिक हालत इतनी खराब थी कि उसके पास दस्ताने खरीदने के पैसे भी नहीं होते थे तो किसी को परिवार से ही सहयोग नहीं मिला। इसके बावजूद ये पीछे नहीं हटे और अपने लक्ष्य को साधे रहे। यही इन सबकी ताकत भी है। सभी बॉक्सरों में जीत के लिए भूख है और यही भूख उन्हें मेडल भी दिलाएगी।
विज्ञापन


लगातार अभ्यास से बीमारी पर पाई जीत, अब पहुंचे ओलंपिक
69 किलोभार वर्ग के बॉक्सर विकास कृष्णन यादव ने महज नौ वर्ष की आयु में मुक्केबाजी शुरू की थी। विकास की माता दर्शना देवी ने बताया कि विकास को बचपन में जुकाम जैसी मौसमी बीमारियां जल्द पकड़ लेती थीं। ऐसे में उन्होंने विकास को अच्छे स्वास्थ्य के उद्देश्य से बैडमिंटन खिलाना शुरू किया था। लेकिन धीरे-धीरे विकास का रुझान मुक्केबाजी की ओर होने लग गया। फिर उसने बॉक्सिंग में ही अपना भविष्य बना लिया। विकास के कोच विष्णु भगवान ने बताया कि विकास दुनिया के छठे नंबर के बॉक्सर हैं।



रिंग में उतरने से पहले सामाजिक बंधन तोड़ने पड़े
75 किलो भार वर्ग की बॉक्सर पूजा बोहरा के कोच संजय श्योराण ने बताया कि पूजा आदर्श महिला महाविद्यालय में पढ़ती थीं। उनकी पत्नी मुकेश रानी कॉलेज में लेक्चरर थी। उसी दौरान उसका पूजा से संपर्क हुआ और उसकी प्रेरणा से पूजा ने बॉक्सिंग शुरू कर दी। शुरुआत में परिजनों का सहयोग न होने के कारण पूजा को काफी दिक्कतें आई। इसी कारण पूजा बीच-बीच में मुकेश रानी के पास भी रहती थी। 2014 में एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीतने के बाद परिजनों ने पूजा का साथ देना शुरू कर दिया और आज वे ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। उन्हें विश्वास है कि पूजा बोहरा गोल्ड मेडल जीत कर देश का नाम रोशन करेंगी।

मनीष के पास न गलव्ज थे और न था अच्छी खुराक
मनीष कौशिक ने वर्ष 2008 में बॉक्सिंग शुरू की थी। उन दिनों परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उन्हें बॉक्सिंग के अभ्यास के हिसाब से डाइट नहीं मिल पाती थी। अभ्यास के लिए बॉक्सिंग गलव्ज और अन्य उपयोगी साधन भी नहीं थे। मनीष ऑटो का किराया बचाने के लिए देवसर से भिवानी साइकिल पर आते थे। साईं हॉस्टल में चयन होने के बाद उन्हें पर्याप्त डाइट मिलनी शुरू हुई। अभ्यास न छूट जाए इसलिए होली और दिवाली जैसे त्यौहार पर भी मनीष घर नहीं आते थे। परिजनों और मनीष का ओलंपिक में गोल्ड मेडल का सपना है, जिसको साकार करने के लिए उन्होंने अपने जीवन को उसी अनुसार ढाल लिया है।

आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है। खबरों को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।

खबर में दी गई जानकारी और सूचना से आप संतुष्ट हैं?
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
  • Downloads

Follow Us

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00