आजादी का अमृत महोत्सव: पहले प्रधानमंत्री के जन्मस्थान के ध्वंसावशेष भी शेष नहीं, पढ़ें विशेष रिपोर्ट

मनोज मिश्र मनोज मिश्र
Updated Sun, 10 Oct 2021 07:15 AM IST

सार

आज़ादी के अमृत महोत्सव के समय हम पीछे मुड़कर देखें कि देश को बनाने में जिन्होंने अपना जीवन दे दिया उनकी विरासत को हमने कितना सहेजा है? उनकी स्मृतियों से हम कितनी शक्ति लेते हैं? इस महत्त्वपूर्ण अभियान के तहत अमर उजाला ने अपने प्रतिनिधियों को देशभर में भेजा। पिछली बार आपने सरदार पटेल के जन्म स्थान से रिपोर्ट पढ़ी, इस बार पंडित नेहरू की जन्मस्थली...
पंडित जवाहरलाल नेहरू
पंडित जवाहरलाल नेहरू - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

आनंद भवन, जो कभी देश की राजनीति का केंद्र था, जहां गांधी से लेकर तमाम शीर्ष नेताओं ने कुछ न कुछ दिन डेरा डाला, अगर उसे देखने -समझने की चाहत से खिंचकर लोग नहीं चले आ रहे हैं तो यह अपने आप में एक त्रासदी है। अभी कुछ वर्ष पहले तक इलाहाबाद के नाम से मशहूर और अब प्रयागराज हो चुके इस शहर में नेहरू को तलाशने निकलिए तो पहली नजर में निराशा ही हाथ लगती है। नेहरू की चर्चा छेड़ने पर सामान्यतया लोग हंस देते हैं। किस जमाने की बात कर रहे हैं जनाब!’ 
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कहता तो कोई नहीं लेकिन, सामने वाले के चेहरे पर छपी इस इबारत को आसानी से पढ़ा जा सकता है। समय ने इतनी तेजी से करवट ली है कि जवाहर लाल नेहरू अपने ही शहर में अजनबी हो गए हैं। नेहरू के बहुआयामी व्यक्तित्व की कोई भी छाप इस शहर में आसानी से ढूंढे नहीं मिलती। यहां तक कि नेहरू के जन्मस्थान के ध्वंसावशेष भी शेष नहीं हैं।       


...एक जवाहर को खोजते हुए
पुराने शहर के लोकनाथ चौराहे पर खंडहर सरीखी एक इमारत से सटी दुकान पर मोटे-मोटे हर्फों में लिखा है-यहां कटे-फटे नोट बदले जाते हैं!’  इमारत ऐसी ही और तमाम दुकानों से घिरी है। किसी पर पान बिकता है तो किसी पर सब्जी। माहौल मछली बाजार सरीखा है। इमारत के बरामदे में किसी ने बेतरतीब-सी कपड़ों की दुकान लगा रखी है। ऊपर बड़ा सा बोर्ड लगा है, जिससे खबर मिलती है कि बरामदे से सटे कमरे में कभी कोई इत्र की बड़ी दुकान रही होगी। इस तीन तल्ला मकान की ऊपरी दो मंजिलों की हालत निचली मंजिल से भी गई बीती है। यह उस जवाहर लाल नेहरू की जन्मस्थली है, जिसे कभी कविवर रवींद्रनाथ टैगोर ने राजनीति के वसंत का राजकुमार कहा था।

दरअसल, इलाहाबाद में जब भी नेहरू के घर की बात होती है तो जिक्र आनंद भवन का ही आता है। नेहरू के जन्मस्थान का उल्लेख इतिहास की किताबों में भी कायदे से नहीं मिलता है। सच तो यह है कि नेहरू जिस घर में जन्मे, उसकी अब कोई निशानी बाकी नहीं है। शहर की सांस्कृतिक विरासत पर करीब से नजर रखने वाले अभय अवस्थी कहते हैं, मौजूदा लोकनाथ चौराहे पर कभी एक कारोबारी का बाग था। इसी में बने खपरैल के एक मकान में मोतीलाल नेहरू किराये पर रहते थे। 14 नवंबर 1889 को जवाहर लाल का जन्म इसी मकान के एक कमरे में हुआ था।’
 
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