नक्सल मुठभेड़: अनुभवी 'सीआरपीएफ' कमांडर क्यों किए जाते हैं नजरअंदाज, गोपनीय रिपोर्ट से लेकर प्रमोशन तक हैं कई सवाल

जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 05 Apr 2021 02:24 PM IST

सार

सीआरपीएफ के पूर्व आईजी वीपीएस पवार कहते हैं, 'फील्ड में तैनात कैडर अफसर को पोस्टिंग कमांड मिलनी चाहिए। जो युवा अफसर नक्सल, कश्मीर या उत्तर-पूर्व में तैनात हैं, उन्हें पदोन्नति से वंचित किया जा रहा है। मजबूरी में अफसरों को अदालतों का रुख करना पड़ रहा है।'
नक्सलियों का सामना करते शहीद हुए बहादुर सुरक्षाकर्मियों को जगदलपुर में श्रद्धांजलि अर्पित करते गृह मंत्री अमित शाह
नक्सलियों का सामना करते शहीद हुए बहादुर सुरक्षाकर्मियों को जगदलपुर में श्रद्धांजलि अर्पित करते गृह मंत्री अमित शाह - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

बीजापुर में नक्सलियों के साथ हुई मुठभेड़ अपने पीछे कई अहम सवाल छोड़ गई है। इस ऑपरेशन में सीआरपीएफ की कोबरा विंग, डीआरजी और एसटीएफ जैसी विशेषज्ञ फोर्स शामिल थीं। सीआरपीएफ डीजी कुलदीप सिंह भले ही इसे रणनीतिक चूक नहीं मानते हैं, लेकिन इसी बल के पूर्व अधिकारी कुछ ऐसी बातों की तरफ इशारा कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर जोखिम भरे ऑपरेशन की कमान संभालने वाले कमांडरों के मनोबल से जुड़ी हैं।
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इतना ही नहीं, वे यह भी दावा करते हैं कि ऐसे ऑपरेशनों की रणनीति जो मौजूदा या पूर्व आईपीएस तैयार कर रहे हैं, उन्हें फील्ड स्तर की पूरी जानकारी नहीं है। पूर्व अफसरों ने केंद्रीय गृह मंत्रालय में लंबे समय से कार्यरत एक सलाहकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। सीआरपीएफ के ग्राउंड कमांडर, जो नक्सलियों की रणनीति और उनके ठिकानों से वाकिफ हैं, ऑपरेशन का खाका खींचते वक्त उन्हें नजरअंदाज किया जाता है। मुंह खोलने पर गोपनीय रिपोर्ट खराब करने से लेकर उनके पदोन्नति रोकने, जैसी बातें ग्राउंड कमांडरों का मनोबल कमजोर कर रही हैं।

आर्मी में डेपुटेशन नहीं है तो सीएपीएफ में क्यों?   

सीआरपीएफ के पूर्व आईजी वीपीएस पवार कहते हैं, फील्ड में तैनात कैडर अफसर को पोस्टिंग कमांड मिलनी चाहिए। वजह, इनका लंबा सेवाकाल फील्ड में ही गुजरता है। जो युवा अफसर नक्सल, कश्मीर या उत्तर-पूर्व में तैनात हैं, उन्हें पदोन्नति से वंचित किया जा रहा है। मजबूरी में अफसरों को अदालतों का रुख करना पड़ रहा है। सरकार इन्हें ओजीएएस का फायदा देकर प्रमोशन दे। इसके बाद उन्हें ऑपरेशन की कमांड दे दी जाए।

वे कहते हैं, जब आर्मी में कोई डेपुटेशन पर नहीं आता तो सीएपीएफ में क्यों यह व्यवस्था जारी रखी गई है। केंद्र में सलाहकार के पद पर एक ही अफसर दस साल से सेवाएं दे रहा है, जबकि अब उनके पास फील्ड का अनुभव नहीं है। नक्सली तो रोज अपनी रणनीति बदलते हैं। कैडर के जिन अफसरों ने अपने जीवन के 30 साल फील्ड में गुजारे हैं, हर तरह का अनुभव हासिल किया है, इंटेलिजेंस रिपोर्ट कैसे लेनी है, उसका क्रॉस चेक कैसे करना है, ये सब बातें अच्छे से जानने के बाद भी उन्हें सलाहकार पद की जिम्मेदारी नहीं मिलती। यहां तक कि नक्सली ऑपरेशन में उन्हें दिल्ली या बड़े शहर में बैठे अधिकारियों द्वारा तैयार रणनीति के तहत आगे बढ़ना पड़ता है। बतौर पवार, सरकार यदि रणनीतिक बैठक में कैडर अफसरों को अपनी बात कहने का मौका दे तो नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई बहुत प्रभावी तरीके से एवं जल्द जीती जा सकती है।

हमले में शहीद जवानों पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग

कॉन्फेडरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्स वेलफेयर एसोसिएशन के महासचिव रणबीर सिंह कहते हैं, सीआरपीएफ हमेशा युद्धरत रहती है। कभी माओवादी प्रभावित इलाकों में तो कभी आतंकवादियों से टक्कर लेते रहते हैं। साधारण घरों से आए इसके जाबांज जवानों ने कभी पीछे कदम नहीं खींचा। इनका काम पूरा सैनिक का है, फिर भी इसे अर्ध सैनिक बल कहते हैं। सरकारी श्रेणियों की अपनी व्यवस्था होती है। हम सोचते नहीं कि अर्ध सैनिक क्या होता है। सैनिक होता है या सैनिक नहीं होता है। मुंह से सभी बोल देते हैं कि इतने जवान शहीद हो गए, लेकिन फाइलों में तो 'डेड' शब्द का इस्तेमाल होता है। संसद में कितनी बार यह सवाल उठा कि इन बलों में जान देने वालों को शहीद का दर्जा दिया जाए, लेकिन सरकार नहीं सुन रही। सरकार की इच्छा शक्ति पर संदेह व्यक्त करते हुए रणबीर सिंह ने कहा, आए दिन अर्धसैनिक बलों के जवान शहीद हो रहे हैं। ट्वीटर पर मात्र शोक सांत्वना संदेश देकर खाना पूर्ति कर दी जाती है। एसोसिएशन ने 15 सालों के दौरान नक्सली हमले में शहीद हुए अर्धसैनिकों पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग की है।
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