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जाति जनगणना: क्या है इसका ‘कर्नाटक मॉडल’, जिसकी पैरवी बिहार में कर रहे तेजस्वी यादव

प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Mon, 02 Aug 2021 05:28 PM IST

सार

बिहार में जातीय गणना कराने के लिए इन दिनों ‘कर्नाटक मॉडल’ की बहुत चर्चा हो रही है। बिहार के नेता राज्य में इसी तर्ज पर गणना कराने की मांग कर रहे हैं। विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव तो इसकी जबरदस्त पैरवी कर रहे हैं।
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भारत की जनगणना
भारत की जनगणना - फोटो : social media
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विस्तार

जातिगत जनगणना कराने का मुद्दे बिहार में जोर पकड़ रहा है। हर बात में सरकार की आलोचना और मुखालफत करने वाले विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव तो इस मुद्दे पर पूरी तरह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कुमार के साथ खड़े हैं। इसी सिलसिले में दोनों नेताओं की पिछले सप्ताह मुलाकात भी हुई है। जनता दल (यूनाइटेड) की तरह राष्ट्रीय जनता दल (राजद)  भी यह मानती है कि जातिगत जनगणना से यह पता चलेगा कि कौन जाति अभी भी पिछड़ेपन का शिकार है, ताकि उनकी संख्या के अनुरूप उन्हें आरक्षण का लाभ देकर उनकी स्थिति मजबूत की जा सके।
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तेजस्वी का कहना है कि यदि केंद्र सरकार जातिगत जनगणना कराने की मांग अस्वीकार कर देती है तो बिहार सरकार कर्नाटक मॉडल की तर्ज पर अपने खर्चे पर यह जनगणना करवा सकती है। विपक्ष के नेता का कहना है कि सीएम ने इस पर विचार  करने का भरोसा दिया है। गौरतलब है कि फरवरी 2019 में विधानमंडल और 2020 में बिहार विधान सभा में जातीय जनगणना  कराने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास होने के बाद दो बार इसे केंद्र सरकार को भेजा गया। 


नीतीश ने की थी सबसे पहले इसकी मांग
नीतीश कुमार ने सबसे पहले 1990 में जाति आधारित जनगणना कराने की मांग की थी। उन्होंने इसके लिए तब के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को भी पत्र लिखा था। नीतीश लगातार इसकी मांग उठा रहे हैं।  जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने भी प्रस्ताव पास कर जातिगत जनगणना कराने की मांग की है 

क्या है कर्नाटक मॉडल
2015 में सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने ‘सामाजिक-आर्थिक और शिक्षा सर्वेक्षण’ करवाया था, जिसे सियासी गलियारे में जाति-जनगणना का नाम दिया गया। सर्वेक्षण कराया तो गया लेकिन उसके परिणाम सार्वजनिक नहीं किए गए। यह सामाजिक-आर्थिक और शिक्षा सर्वेक्षण सर्वेक्षण राज्य सरकार ने अपने स्तर पर करवाया था और इसके लिए 162 करोड़ रुपए खर्च किए थे। दरअसल, कर्नाटक में 2023 में विधानसभा चुनाव होने हैं और रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से राज्य में वहां की जातीय समीकरण पर महत्वपूर्ण असर पड़ने की संभावना है। खासतौर पर उन जगहों पर जहां लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे प्रमुख समुदायों का शासन रहा है। इसलिए सर्वेक्षण के नतीजों को जारी करने के लिए जोर-आजमाइश भी होती रही।

पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा पर बना था दबाव
इस सर्वेक्षण के निष्कर्ष को जारी करवाने के लिए राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा पर खूब दबाव डाला गया। पू्र्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी इसी साल मार्च में कहा था कि येदियुरप्पा को जाति जनगणना का निष्कर्ष जारी करना चाहिए। सिद्धारमैया का कहना था कि रिपोर्ट तैयार थी लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी ने भी मानने से इनकार कर दिया था। वहीं येदियुरप्पा भी पिछले दो सालों से रिपोर्ट को स्वीकार नहीं कर रहे। माना जा रहा है कि कर्नाटक में बसवराज बोम्मई के नेतृत्व में बनी नई सरकार के सामने भी जल्दी ही यह मुद्दा आ सकता है। 

जाति जनगणना का निष्कर्ष जारी करने के लिए उन नेताओं ने एक वर्ग ने कानूनी प्रक्रिया का सहारा लेने कोशिश की थी जो अभी हाशिए पर हैं। बताया जाता है कि राज्य में अभी अस्तित्व में आए अति हिंदुलिदा जागृति वेदिके (कन्नड़ फॉर एक्स्ट्रीम बैकवर्ड अवेयरनेस फोरम) ने रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और कांग्रेस पार्टी से संपर्क भी किया है। 

फोरम के अध्यक्ष और पूर्व विधायक ने कुछ दिनों पहले मीडिया से बातचीत में कहा था कि अभी जो आरक्षण दिया जा रहा है, अतार्किक आंकड़ों पर आधारित है। जबकि अभी ऐसे कई अत्यंत पिछड़े वर्ग हैं, जिनका आर्थिक, सामाजिक या राजनीतिक रूप से कोई विकास नहीं हुआ है और न ही उन्हें प्रतिनिधित्व मिला है। 

ये छोटे समुदाय राजनीतिक दलों के लिए क्यों हैं अहम
राज्य के राजनीतिक परिदृश्य पर लिंगायतों और वोक्कालिगाओं का शासन रहा है, जिन्हें राज्य के दो सबसे बड़े समुदायों के रूप में माना जाता है। हालांकि इन समुदायों की संख्या प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में महज हजारों में है लेकिन राजनीतिक दलों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे करीबी मुकाबले में निर्णायक कारक बन सकते हैं। 


अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) आरक्षण की नई राजनीति का रास्ता खुल सकता है
नीतीश कुमार की मांग रही है कि देश में आबादी के अनुरूप आरक्षण का प्रावधान किया जाए। मौजूदा समय में पिछड़ी जातियों को 27 फीसदी आरक्षण मिलता है। इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव और पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी सब एक मत हैं। इन नेताओं का मानना है कि यह पता चलने पर कि पिछड़ी जातियों में किस जाति के लोगों की संख्या कितनी है और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति कैसी है। उनके लिए खास योजना बनाई जा सकती है।

2011 की जनगणना के मुताबिक, बिहार की जनसंख्या 10.38 करोड़ थी। इसमें 82.69 फीसदी आबादी हिंदू और 16.87 प्रतिशत आबादी मुस्लिम समुदाय की थी। हिंदू आबादी में 17 प्रतिशत सवर्ण, 51 फीसदी ओबीसी, 15.7 प्रतिशत अनुसूचित जाति और करीब 1 फीसदी अनुसूचित जनजाति है। 

बिहार में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव का ओबीसी पर प्रभाव बढ़ रहा है जबकि नीतीश कुमार भी ओबीसी पर अपना असर छोड़ना चाहते हैं इसलिए इस मुद्दे पर सियासी दल एक साथ आ गए हैं। बहाना पिछड़ी जातियों के सामाजिक उत्थान का है लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इससे ओबीसी आरक्षण की नई राजनीति का रास्ता खुल सकता है।

दरअसल केंद्र और राज्य की सत्ता मे ओबीसी का प्रभाव बढ़ रहा है। बिहार में ओबीसी जदयू, राजद और भाजपा तीनों के साथ है। उत्तर प्रदेश की बात करें तो ओबीसी वोटर भाजपा और सपा के साथ खड़े नजर आते हैं। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे ओबीसी को साधने की कोशिश में लगे हैं। 

केंद्र इस तरह की जनगणना के लिए तैयार नहीं
केंद्र सरकार इस तरह की जनगणना कराने के पक्ष में नहीं है। पिछले दिनों लोकसभा में एक सवाल पर केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने कहा था कि सरकार ने नीतिगत तौर पर यह फैसला किया है कि 2021 की जनगणना में केवल अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए गणना कराया जाएगा, जातीय जनगणना नहीं। सरकार के सदन में दिए गए इसी बयान के बाद खासतौर पर बिहार की राजनीति गरमा गई है। 

हालांकि धीरे से ओबीसी कार्ड खेलने में भाजपा भी पीछे नहीं है। हाल में ही केंद्र ने मेडिकल एजुकेशन में 10 फीसदी आर्थिक पिछड़ों के साथ-साथ 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को मंजूरी दी है। वहीं मोदी मंत्रिमंडल में भी सबसे ज्यादा मंत्री ओबीसी से ही हैं। 
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