मंदिर पॉलिटिक्स: राहुल गांधी के मंदिर-मंदिर जाने से कांग्रेस को क्या मिला, क्या वे अब तक भाजपा के जाल में उलझे हैं

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Thu, 09 Sep 2021 07:09 PM IST

सार

धर्म या धार्मिक निष्ठा किसी का भी व्यक्तिगत मामला होता है। लेकिन राहुल गांधी राजनीतिक व्यक्ति हैं, इसलिए उनकी धार्मिकता भी सियासत में चर्चा का विषय बन जाती है। भाजपा के ठोस हिंदुत्व का मुकाबला करने के लिए राहुल गांधी ने मंदिर की यात्राओं का विकल्प तो चुना लेकिन कांग्रेस को इसका फायदा मिलता नहीं दिख रहा।  
वैष्णो देवी के दर्शन के लिए पैदल चलते राहुल गांधी
वैष्णो देवी के दर्शन के लिए पैदल चलते राहुल गांधी - फोटो : Social Media
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विस्तार

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद आज दो दिनों के दौरे पर जम्मू पहुंचे हैं। राहुल गांधी मां वैष्णो देवी के दर्शनों के लिए पैदल चले। वे पैदल मार्ग से ही वापस नीचे आएंगे। राहुल गांधी की वैष्णो देवी की यात्रा को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने उन पर निशाना साधा है। राहुल गांधी पिछले महीने 9-10 अगस्त को भी कश्मीर के दो दिनों के दौरे पर थे। इस दौरान वे माता खीर भवानी मंदिर और हजरतबल दरगाह भी गए थे। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राहुल गांधी को यदि लगता है कि वैष्णो देवी की यात्रा से जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में उन्हें कोई फायदा होगा, तो इसके आसार बहुत कम है। हालांकि वैष्णो देवी मंदिर में दर्शन करने के उनके कदम को अगले साल की शुरुआत में यूपी में होने वाले चुनाव से जोड़ कर देखा जा रहा है क्योंकि सियासी नजरिए से देश के अहम इस राज्य में सभी पार्टियां ब्राह्मणों को लुभाने की कोशिश में हैं।
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कांग्रेस नेतृत्व की नई पैकेजिंग है। 
मंदिर-मंदिर जाने की यह कांग्रेस नेतृत्व की नई पैकेजिंग है एंटनी समिति की सिफारिशों के बाद ही कांग्रेस ने भाजपा के हिंदुत्व की काट के लिए साफ्ट हिंदुत्व का रास्ता अपनाया है। 2017 से व्यवस्थित तरीके से राहुल गांधी के मठों, स्वामियों, बाबाओं और मंदिरों की यात्रा की योजना बनाई गई है। साथ ही इसका जमकर प्रचार भी किया गया। जिसका विशुद्ध राजनीतिक उद्देश्य साफ है। इसका आध्यात्मिकता की खोज से कोई लेना-देना नहीं है लेकिन राहुल गांधी यह संदेश देते हैं कि वह भी  एक भक्त हैं। दरअसल 1980 के दशक से अयोध्या आंदोलन के बाद से, धार्मिक पहचान और धार्मिकता का सार्वजनिक प्रदर्शन राजनीति का मुख्य कारक बन गया। भाजपा तो इसके बाद से अब तक हिंदुत्व और राम मंदिर निर्माण के एजेंडे के रथ पर सवार है और लगता है राहुल गांधी अभी तक भाजपा की जाल में फंसे हुए हैं।   


भाजपा से मुकाबला मुश्किल 
लंबे समय से कांग्रेस पार्टी कवर कर रहीं वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता इस बात से इंकार नहीं करती हैं। उनका कहना है कि राहुल गांधी ने भाजपा की चुनौती को स्वीकार तो कर ली, लेकिन वे यह नहीं समझ पाए कि भाजपा की ताकत हिंदू और मंदिर की राजनीति है। उसका मुकाबला करना मुश्किल है। जैसे आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की बात कीजिए, कोई कितना भी कहें कि किसान आंदोलन और कोरोना की वजह से भाजपा को नुकसान हो सकता है लेकिन सच्चाई यह है कि अयोध्या और राम मंदिर एक ऐसा मुद्दा है जिससे निश्चित तौर पर यूपी में भाजपा को फायदा होने की संभावना है। इसकी सबसे बड़ी वजह हिंदुत्व और भाजपा है. जिसमें विकास का भी तड़का लगा हुआ है। इसलिए मेरा मानना है कि राहुल गांधी अपनी ऐसी यात्राओं को ज्यादा प्रचार देने की कोशिश नहीं करें, क्योंकि इससे चुनावों में कांग्रेस को कोई लाभ नहीं मिलेगा।  

कांग्रेस को कोई फायदा नहीं मिला
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रशीद किदवई कहते हैं देश की राजनीति में धर्म और राजनीति को लेकर विरोधाभास है। एक राजनीतिक दल तरह-तरह के प्रयोग करता है और कांग्रेस भी मंदिर की राजनीति से एक प्रयोग कर रही है। राहुल गांधी पहले यह सोचते थे कि धर्म निजी मामला है और पार्टी के सलाहकारों ने उन्हें कहा कि अब उन्हें अपनी धार्मिक आस्था को  सार्वजनिक करना चाहिए तो वे करने लगे। लेकिन इसका राजनीतिक लाभ कांग्रेस को नहीं मिल पा रहा है, क्योंकि किसी धर्म विशेष को लेकर पार्टी में दृढ़ता नहीं है। यह भाजपा में यह दृढ़ता है। कांग्रेस की राजनीतिक सोच उससे मेल नहीं खाती है। कांग्रेस आंतकवाद को किसी धर्म विशेष को नहीं जोड़ती है, इसलिए राजनीतिक धरातल पर जहां चुनाव होते हैं वहां उसका फायदा नहीं मिलता है।
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