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ऑक्सीजन रिपोर्ट: सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में दिल्ली सरकार पर क्या पड़ेगा असर, कमेटी के दो सदस्यों की असहमति कितनी है जरूरी?

अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Sat, 26 Jun 2021 03:10 PM IST
सार

विशेषज्ञों का कहना है कि इस बढ़ी मांग के लिए दिल्ली सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसकी बड़ी वजह है कि दिल्ली सरकार की ऑक्सीजन की मांग चार बड़े अस्पतालों द्वारा भारी ऑक्सीजन की मांग करने पर आधारित थी। दिल्ली सरकार ने तो केवल अस्पतालों की इसी मांग को केंद्र तक पहुंचाने का काम किया था...

ऑक्सीजन ऑडिट रिपोर्ट
ऑक्सीजन ऑडिट रिपोर्ट - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

ऑक्सीजन ऑडिट कमेटी की अंतरिम रिपोर्ट पर विवाद गहरा गया है। पांच सदस्यीय कमेटी में दिल्ली सरकार द्वारा नामित सदस्यों डॉ. संदीप बुद्धिराजा और भुपिंदर एस भल्ला की असहमति अंतरिम रिपोर्ट में शामिल न किए जाने से रिपोर्ट की निष्पक्षता पर ही सवाल उठ गया है। ऐसे में बड़ा सवाल यह भी पैदा हो रहा है कि अगर इस अंतरिम रिपोर्ट को सर्वोच्च न्यायालय के सामने रखा जाता है तो इस पर अदालत का रुख क्या हो सकता है? इस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय में 30 जून को अगली सुनवाई होगी।

क्या है विवाद

दरअसल, भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने शुक्रवार को ऑक्सीजन ऑडिट कमेटी की अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर आरोप लगाया कि दिल्ली सरकार ने कोरोना महामारी के दौरान ऑक्सीजन की मांग चार गुना बढ़ाकर बताई। अपने इस आरोप के लिए उन्होंने कमेटी की उस रिपोर्ट को आधार बनाया जिसमें कहा गया है कि दिल्ली की ऑक्सीजन की कुल डिमांड 289 मिट्रिक टन ही थी (ऑक्सीजन की यह अनुमानित मांग केंद्र सरकार के फॉर्मूले के आधार पर थी, जिसमें यह आधार माना गया है कि कुल नॉन-आईसीयू मरीजों के लगभग 50 फीसदी को ही ऑक्सीजन की आवश्यकता पड़ती है)। लेकिन दिल्ली सरकार ने अपने लिए इसी दौरान 1140 मिट्रिक टन ऑक्सीजन की मांग की।



लेकिन अगर इसी ऑक्सीजन की मांग को दिल्ली सरकार के फॉर्मूले के आधार पर आंका जाए तो यही मांग 289 मिट्रिक टन से बढ़कर 391 मिट्रिक टन पहुंच जाती है। दिल्ली सरकार का फॉर्मूला यह था कि आईसीयू मरीजों के साथ-साथ सभी नॉन-आईसीयू मरीजों (100 फीसदी) को भी ऑक्सीजन की आवश्यकता है।

ये अस्पताल हैं जिम्मेदार

विशेषज्ञों का कहना है कि इस बढ़ी मांग के लिए दिल्ली सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसकी बड़ी वजह है कि दिल्ली सरकार की ऑक्सीजन की मांग चार बड़े अस्पतालों द्वारा भारी ऑक्सीजन की मांग करने पर आधारित थी। दिल्ली सरकार ने तो केवल अस्पतालों की इसी मांग को केंद्र तक पहुंचाने का काम किया था। ऐसे में बड़ा सवाल दिल्ली सरकार पर नहीं, उन चार अस्पतालों पर उठता है जिन्होंने ऑक्सीजन की भारी मांग बताई। उन्हें यह बताना होगा कि उन्होंने ऑक्सीजन की इतनी भारी मांग किस आधार पर दिखाई?

कमेटी ने रिपोर्ट में चार अस्पतालों का नाम लेते हुए कहा है कि इन अस्पतालों ने अप्रत्याशित ढंग से ऑक्सीजन की भारी मांग की जबकि उनके पास उतनी संख्या में गंभीर मरीज ही नहीं थे। रिपोर्ट में अरुणा आसफ अली अस्पताल, ईएसआईसी मॉडल हॉस्पिटल, लाइफरे हॉस्पिटल और सिंघल अस्पताल पर भारी ऑक्सीजन मात्रा में ऑक्सीजन की मांग करने का आरोप लगाया गया है।

यहां है विवाद

कथित तौर पर मैक्स अस्पताल के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. संदीप बुद्धिराजा ने ऑक्सीजन कमेटी की बैठकों के दौरान अपनी यह असहमति जताई थी, लेकिन उनका यह सुझाव रिपोर्ट में शामिल नहीं किया गया। कमेटी के सदस्यों में इस बात पर असहमति इतनी ज्यादा बढ़ गई थी कि 18 मई को कमेटी के सदस्यों की बैठक में डॉ. संदीप बुद्धिराजा शामिल भी नहीं हुए।

इसी प्रकार दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव (गृह) भुपिंदर एस भल्ला ने भी कमेटी की बैठकों के दौरान अपनी असहमति जताते रहे। उन्होंने ऑक्सीजन की कुल मांग के लिए दिल्ली सरकार के फॉर्मूले को पेश करते हुए अन्य सदस्यों की राय से अपनी असहमति भी जताई थी। लेकिन आरोप है कि उनके सुझाव को भी उचित महत्व नहीं दिया गया।

क्या पड़ेगा असर

वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर स्वत: संज्ञान लेते हुए 9 मई 2021 को इस कमेटी का गठन किया था। कमेटी की रिपोर्ट में गंभीर खामियां उजागर हुई हैं। लेकिन इसके आधार पर दिल्ली सरकार पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं हो सकती। सुप्रीम कोर्ट आगे के लिए सिस्टम में एक उचित व्यवस्था बनाने का निर्देश अवश्य दे सकता है।

लेकिन इसी कमेटी के रिपोर्ट के आधार पर अगर दिल्ली सरकार के विरुद्ध कोई आपराधिक मामला दर्ज कराया जाता है तो इस पर अलग से सुनवाई होगी, और उसमें अगर कोर्ट सरकार या किसी अधिकारी को जिम्मेदार पाती है तो वह उसे दंडित कर सकती है।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी कुमार दुबे ने अमर उजाला को बताया कि सर्वोच्च न्यायालय स्वत: संज्ञान लेकर न केवल सुनवाई कर सकता है, बल्कि वह जिम्मेदार अधिकारियों को दंडित भी कर सकता है। उन्होंने कहा कि किसी भी कमेटी की रिपोर्ट में इसके सभी सदस्यों की राय शामिल करना अनिवार्य है। चाहे उससे समिति के अन्य सदस्य सहमत हों, या न हों। इससे सर्वोच्च न्यायालय को मामले के सभी पक्षों को समझने में मदद मिलती है। इसी के आधार पर वह कोई निर्णय लेती है।

लेकिन, अगर अदालत कमेटी की बहुमत की रिपोर्ट से संतुष्ट होती है (जैसा कि इस मामले में अभी तक सामने आया है) तो वह इसे भयंकर लापरवाही का मामला मानते हुए दिल्ली सरकार पर जुर्माना लगा सकती है, दिल्ली सरकार के इस निर्णय तक पहुंचने में शामिल रहे अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई भी कर सकती है।

क्या अब सुप्रीम कोर्ट को भी नहीं मानेंगे केजरीवाल?

ऑडिट कमेटी की इस रिपोर्ट पर आम आदमी पार्टी और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने सवाल उठाया है। इस पर दिल्ली भाजपा मीडिया प्रमुख नवीन कुमार जिंदल ने कहा कि क्या अरविंद केजरीवाल अब सुप्रीम कोर्ट को भी नहीं मानेंगे? इस कमेटी का गठन स्वयं सर्वोच्च अदालत ने किया है और उसके विशेषज्ञ देश के वरिष्ठ विशेषज्ञ हैं। उनके ज्ञान और निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता।

उन्होंने कहा कि अरविंद केजरीवाल को इस बात का जवाब देना चाहिए कि उन्होंने ऑक्सीजन की झूठी मांग क्यों पैदा की, जिसके कारण देश के 12 अन्य राज्यों में ऑक्सीजन की आपूर्ति प्रभावित हुई। इसके कारण हजारों लोगों की जान गई है और अरविंद केजरीवाल इसके जिम्मेदार हैं।
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