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कोरोना के बाद भी 'खाकी' पर बरसते रहें फूल, पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह बोले, ये संभव है बशर्ते... 

जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली  Published by: मुकेश कुमार झा Updated Mon, 27 Apr 2020 06:18 PM IST
'खाकी' पर बरसते रहें फूल
'खाकी' पर बरसते रहें फूल - फोटो : social media
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कोरोना वायरस की लड़ाई में 'खाकी' पर फूलों की बरसात होती हुई दिखी है। गलियों से जब पुलिस वाले गुजरते हैं तो छतों पर खड़े लोग या अपने घर की दहलीज से बच्चों और महिलाओं ने उनका अभिवादन किया है। बीएसएफ, सीआरपीएफ और आईटीबीपी जैसे केंद्रीय सुरक्षा बल भी दिन रात लोगों की सेवा में लगे हैं। कोरोना से पहले पुलिस को लेकर पथराव की खबरें तो आती थी, लेकिन उन पर फूल बरसे हों, ये बहुत कम देखने सुनने को मिलता था।



कोरोना के बाद भी 'खाकी' पर फूल बरसते रहें, इस बाबत पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह का कहना है कि ये संभव है बशर्ते कि सरकार, पुलिस और लोग अपनी सोच बदलें। आपसी विश्वास बहाली के लिए संस्थागत परिवर्तन लाने होंगे।राजनेताओं को अपने एजेंडे के लिए पुलिस का इस्तेमाल करने की आदत छोड़नी पड़ेगी। इनके आपसी संदेह और डर को दूर करना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधार को लेकर जो कुछ कहा है, केंद्र और राज्यों को उस पर इच्छाशक्ति के साथ काम करने के लिए आगे आना चाहिए।


कोरोना की लड़ाई में पुलिस पर लोगों ने भरोसा जताया है...
यूपी और असम के पुलिस प्रमुख एवं बीएसएफ के डीजी रहे सेवानिवृत आईपीएस अधिकारी प्रकाश सिंह, जिन्हें देश में पुलिस सुधारों की मुहिम शुरु करने के लिए जाना जाता है, उन्होंने कोरोना संक्रमण के दौरान पुलिस का जो चेहरा बदला है, उसे लेकर अमर उजाला डॉट कॉम के साथ खास बातचीत की है। प्रकाश सिंह का कहना है कि हम सब चाहते हैं कि कोरोना की लड़ाई में पुलिस पर लोगों ने जो भरोसा जताया है, वह आगे भी जारी रहे। हालांकि यह इतना आसान भी नहीं है।मुझे खुद डर लगा रहता है कि पुलिस क्या आगे भी ऐसे काम करेगी कि जिससे लोग उन पर फूल बरसाएं।

मुझे शंका है कि सरकार, पुलिस और जनता ये काम कर पाएगी या नहीं। ऐसा भी नहीं है कि पुलिस का ये बदला हुआ चेहरा सदैव बरकरार नहीं रह सकता। अगर हम संस्थागत बदलाव लाने में कामयाब हुए तो फूलों की बरसात आगे भी होती रहेगी।

तीनों को बदलनी होगी अपनी कार्यशैली... 

पुलिस, सरकार और जनता, इन तीनों को ही अपनी कार्यशैली बदलनी पड़ेगी। मौजूदा समय में इन तीनों के बीच आपसी विश्वास की डोर टूट चुकी है। मैं यहां पर पुलिस का समर्थन नहीं करूंगा।कोरोना की लड़ाई शुरु होने से पहले तक यही पुलिस ऐसी थी कि जिसके पास जाने से लोग डरते थे। पुलिस पर रोजाना न जाने कैसे कैसे आरोप लगते थे।

जनता तो पुलिस पर बिल्कुल भरोसा नहीं करती थी। अब कोरोना में ये सब बदलाव देखने को मिल रहा है। बतौर प्रकाश सिंह, तीनों अंगों के बीच विश्चास बहाल करना होगा।पुलिस को भी कुछ ऐसा करना है कि लोग हमदर्द समझकर उसके पास जाएं।

मैं आपको पुलिस पर विश्वास का उदाहरण देता हूं। इसमें तीनों अंग शामिल हैं।ये पुलिस जो प्राचीन काल से चली आ रही है, लेकिन आज भी पुलिस के सामने दी गई गवाही को कोर्ट में नहीं माना जाता। पुलिस वाले कहां से आते हैं। क्या वे दूसरे गृह से आए हैं। हम सबके बीच से ही हैं।

पुलिस का कसूर तो है ही, मगर साथ ही उन्हें अपने एजेंडे को पूरा करने का हथियार बनाने वाली सरकारें भी दोषी हैं। राजनेता अपने सारे धंधे बंद कर दें और पुलिस को जरिया बनाना छोड़ दें तो फिर देखो ये फूल आगे कैसे नहीं बरसते।

पुलिस को धीरे धीरे लोगों का विश्वास जीतना होगा... 

प्रकाश सिंह के अनुसार, सबसे पहले तो केंद्र और राज्यों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुलिस सुधारों को लेकर जो कुछ कहा गया है, उसे ईमानदारी के साथ लागू करें। मसलन, पुलिस की संख्या, उनके रहने की जगह, रिफ्रेशर कोर्स, सेवाकाल से जुड़ी सुविधाएं और दूसरे अनेक पहलू हैं, जिन पर काम करना बाकी है।

कुछ बातों को लेकर कानून में बदलाव करना होगा। जैसे, मजिस्ट्रेट को यह भरोसा करना चाहिए कि पुलिस झूठ नहीं बोल रही है।ये तब मुमकिन है जब पुलिस अपनी सभी बुराईयों को छोड़कर लोगों की सुरक्षा में खुद को लगा देगी। पुलिस के प्रति लोगों को भी अपना मन साफ करना होगा।

बहुत से लोग किसी के बहकावे में आकर झूठी एफआईआर लिखवा देते हैं। यहीं से भ्रष्टाचार की कई कड़ियां जन्म ले लेती हैं।कुछ लोग तो वकील से पूछकर एफआईआर लिखवाने जाते हैं।ऐसे में तीनों संस्थाओं को आगे आकर काम करना पड़ेगा।

ये काम मुश्किल नहीं है, लेकिन इसके लिए निजी स्वार्थ का त्याग करना बहुत जरूरी है।मुझे उम्मीद है कि पुलिस, सरकार और जनता ये जरूरी चाहेगी कि फूल बरसाने का सिलसिला थमने न पाए।
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