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Gyanvapi Controversy: ओवैसी क्यों कह रहे अयोध्या 2.0 बनने की राह पर है ज्ञानवापी? जानें कहां तक जा सकता है विवाद 

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जयदेव सिंह Updated Mon, 16 May 2022 08:27 PM IST
सार

अयोध्या और ज्ञानवापी विवाद में बड़ा फर्क 1991 का पूजा स्थल कानून है। ये कानून कहता है कि 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता।

असदुद्दीन ओवैसी।
असदुद्दीन ओवैसी। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में सर्वे का काम सोमवार को पूरा हो गया। सर्वे के बाद हिन्दू पक्ष दावा कर रहा है कि मस्जिद के वजूखाने में शिवलिंग मिला है। वहीं, मुस्लिम पक्ष इन दावों को खारिज कर रहा है। सर्वे के बाद जो दावे किए जा रहे हैं, उनसे एक बार फिर देश के मंदिर-मस्जिद विवाद बढ़ने की आशंका है। इस मामले को लेकर सियासी बयानबाजी भी शुरू हो गई है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर आरोप लगाया कि जिस तरह अयोध्या की बाबरी मस्जिद को छीना गया, उसी तरह ज्ञानवापी मस्जिद को छीनने की साजिश है। 

ओवैसी आखिर कैसे ज्ञानवापी मामले को बाबरी मस्जिद 2.0 जैसा बता रहे हैं? अयोध्या और ज्ञानवापी मामले में क्या समनाताएं हैं? क्या दोनों में कोई फर्क भी हैं, जिनसे यह तर्क दिए जा सके कि यह विवाद अयोध्या मामले की तरह उस चरम तक नहीं पहुंचेगा? आइये समझते हैं...

पहले समझें- बाबरी मस्जिद और ज्ञानवापी विवाद को?
 दरअसल, अक्सर दावा होता रहा है कि ज्ञानवापी मस्जिद को मुगलकाल में हिंदू मंदिर को तोड़कर बनाया गया था। वहीं, बाबरी मस्जिद को लेकर हिन्दू पक्ष दावा करता था कि बाबर के सेनापति मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद बनवाई थी। इसके लिए यहां स्थित मंदिर को तोड़ा गया था। 
दोनों मामलों की बात करें तो ज्ञानवापी मामला 1991 में पहली बार कोर्ट पहुंचा। जब एक स्थानीय पुजारी ने ज्ञानवापी मस्जिद के परिसर में पूजा करने की मांग की थी। हालांकि, चंद महीनों बाद ही पूजा स्थल कानून आया। बाद में इसी कानून का हवाला देकर मामले को खारिज कर दिया गया। 2019 में पांच महिलाओं ने कोर्ट में याचिका दायर कर मस्जिद परिसर स्थित शृंगार गौरी की रोज पूजा करने का अधिकार देने की मांग की है। इसी याचिका पर सर्वे हुआ है।  
वहीं, अयोध्या विवाद में भी घटनाक्रम कुछ इसी तरह आगे बढ़ा था। 1885 में पहली बार बाबरी मस्जिद परिसर पर स्थित चबूतरे को राम जन्मभूमि का स्थान बताते हुए सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया गया था। कोर्ट से अपील की गई थी कि निर्मोही अखाड़े को इस जगह पर मंदिर बनाने की इजाजत दी जाए। हालांकि, तब कोर्ट ने मस्जिद के बाहरी परिसर में मंदिर बनाने का पहला मुकदमा निर्मोही अखाड़े के खिलाफ सुनाया। 
इस पूरे विवाद का अगला चरण आता है भारत की आजादी के बाद 1949 में, जब हिंदू वैरागियों ने मस्जिद के सामने यज्ञ और रामायण पाठ किया। आरोप लगाए जाते हैं कि दिसंबर 1949 की एक रात को कुछ लोगों ने बाबरी मस्जिद की दीवार फांदकर यहां राम-जानकी और लक्ष्मण की मूर्तियां रख दी थीं। 16 जनवरी 1950 को सिविल जज की अदालत में एक केस दायर हुआ, जिसमें कहा गया कि जन्मभूमि पर स्थापित श्री भगवान राम और अन्य मूर्तियों को हटाया न जाए और उन्हें दर्शन और पूजा के लिए जाने से रोका न जाए।
ओवैसी कैसे बता रहे दोनों मामलों में समानता? 
ओवैसी कहते हैं कि मैंने बाबरी मस्जिद मामले में फैसला आने के वक्त ही उसका विरोध किया था। तब ही मैंने कहा था कि मैं इस फैसले के खिलाफ इसलिए हूं क्योंकि इस फैसले के बाद और विवादों के दरवाजे खोल देगा। ओवैसी कहते हैं कि 1949 में बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखी गई। इसके बाद वहां के डीएम ने मस्जिद को सील कर दिया। उसके बाद सिर्फ पुजारियों से पूजा करवाई। इसके बाद 1986 में राजीव गांधी ने बगैर मुस्लिम पक्ष को सुने ताले खुलवा दिए। यहां भी वही हो रहा है। एक चैनल से बात करते हुए ओवैसी दावा करते हैं कि ज्ञानवापी मामले में असली बवाल खड़ा होना बाकी है। उसके बाद ज्ञानवापी के मस्जिद को भी गिरा दिया जाएगा। ओवैसी कोर्ट के आदेश को 1991 के पूजा स्थल कानून का उल्लंघन बताते हैं।  
ओवैसी कहते हैं कि देश में ऐसे 50 हजार मस्जिद हैं जिनके बारे में आरएसएस दावा करती है कि उन्हें मंदिर तोड़कर बनाया गया। तो क्या हर मामले को खोला जाएगा। क्या ये देश संविधान से नहीं चलेगा। क्योंकि 1991 का कानून कहता है कि किसी भी धार्मिक स्थान का कैरेक्टर और नेचर को नहीं बदला जा सकता है। 
इस बार मंदिर-मस्जिद विवाद में क्या हैं फर्क?
अयोध्या और ज्ञानवापी विवाद में सबसे बड़ा फर्क 1991 का पूजा स्थल कानून है। ये कानून कहता है कि 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता। अगर कोई ऐसा करने की कोशिश करता है तो उसे एक से तीन साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है। अयोध्या का मामला उस वक्त कोर्ट में था इसलिए उसे इस कानून से अलग रखा गया था। जबकि, ज्ञानवापी जैसे मामलों को इसी कानून के आधार पर कोर्ट में खारिज किया जा चुका है।  
हालांकि, ज्ञानवापी मामले में दायर याचिकाओं में हिंदू पक्ष फिलहाल मस्जिद को हटाने या मंदिर बनाने की कोई मांग नहीं कर रहा। याचिकाकर्ता मस्जिद परिसरम में स्थित मां श्रंगार गौरी की मूर्ति की हर दिन पूजा का अधिकार चाहते हैं। जो अभी उन्हें साल में केवल एक बार करने की इजाजत है। 
क्या ज्ञानवापी मामले की अयोध्या मामले से तुलना सही है?
राजनेता भले दोनों मामलों की तुलना अपने-अपने लिहाज से करें लेकिन एक्सपर्ट्स  इससे बचने की हिदायत देते हैं।  विशेषज्ञों का कहना है कि अयोध्या का मामला एक बड़े जन आंदोलन की वजह से यहां तक पहुंचा। एक ऐसा आंदोलन जिसने लगभग पूरे देश को प्रभावित किया। ऐसे आंदोलन न तो हर रोज हो सकते हैं ना ही इन्हें सुनियोजित तरीके से किया जा सकता है।  
इसी तरह अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थान पर अधिकारों के लिए दावा किया गया था। वहीं,  वाराणसी में विवाद मंदिर की बाहरी दीवार और अंदर के इलाके में मौजूद देवताओं की मूर्ति के दावे और उनकी पूजा के अधिकार को लेकर है। अब तक किसी भी पक्ष से मस्जिद की जगह मंदिर बनाए जाने जैसी कोई मांग नहीं की गई है। वैसे भी 1991 का कानून किसी भी मौजूदा धार्मिक स्थल में किसी तरह के बदलाव का विरोध करता है। 
 क्या आगे बढ़ सकता है विवाद, कोर्ट में दायर केसों से समझें
इस पूरे मामले में एक पेंच यह है कि पूजा स्थल अधिनियम सितंबर 1991 में पारित हुआ, जबकि ज्ञानवापी का मामला कानून आने से कुछ महीने पहले ही कोर्ट पहुंचा था। हिन्दू पक्ष इस आधार पर भी राहत चाहता है। 2019 में अयोध्या का फैसला आने के बाद बनारस के वकील विजय शंकर रस्तोगी ने निचली अदालत में याचिका दायर कर ज्ञानवापी मस्जिद के निर्माण को अवैध ठहराया था और आर्केयलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) से इसकी जांच कराने की मांग की थी।
 वाराणसी कोर्ट ने अप्रैल 2021 में ही एएसआई को सर्वे कराने और अपनी रिपोर्ट देने के लिए कहा था। हालांकि, ज्ञानवापी मस्जिद की प्रबंधक यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड और अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद कमेटी ने इसका विरोध किया और मामला इलाहबाद हाईकोर्ट पहुंच गया। उच्च न्यायालय ने एएसआई के सर्वे पर अंतरिम रोक लगाई है। साथ ही कोर्ट ने पूजा स्थल अधिनियम का हवाला देते इस मसले पर हिंदू पक्ष को झटका दिया। 
इस बीच यह पूरा विवाद एक बार फिर बढ़ गया, जब मार्च 2021 को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एसए बोबडे की बेंच ने पूजा स्थल अधिनियम की वैधता की जांच की मांग वाली याचिका को स्वीकार कर लिया। यानी भविष्य में अगर इस कानून को ही बदला या रद्द किया जाता है, तो मंदिर-मस्जिद को लेकर जारी विवाद आगे भी बढ़ा रहेगा।

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