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MCD Election Result: भाजपा ने केजरीवाल को हराने का 'फॉर्मूला' खोज लिया, विधानसभा चुनावों में क्या होगी तस्वीर?

Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Wed, 07 Dec 2022 06:52 PM IST
सार

चुनाव विश्लेषक मानते हैं कि यदि अप्रैल महीने में ही नगर निगम चुनाव हो गए होते तो चुनाव परिणाम पंजाब या दिल्ली विधानसभा की तरह ही हो सकते थे। लेकिन एक रणनीति के अंतर्गत केंद्र ने तीनों नगर निगमों को एक करने का निर्णय लिया और नगर निगम चुनाव छह महीनों के लिए टाल दिए गए।    

Delhi MCD Election Results
Delhi MCD Election Results - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

साल 2012-13 में अरविंद केजरीवाल धूमकेतु की तरह राजनीति में चमके थे। उनकी राजनीतिक आभा के सामने शीला दीक्षित का जादू धराशायी हो गया, जो दिल्ली में 15 साल शासन कर चुकी थीं और विकास कार्यों और गरीब जनता के लिए हमेशा समर्पित रहने के लिए जानी जाती थीं। दिल्ली की राजनीति में अरविंद केजरीवाल के सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करिश्मा भी काम नहीं आया जिन्होंने 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में ऐतिहासिक सफलता हासिल कर राजनीतिक विश्लेषकों को चकित कर दिया था। मोदी-शाह की टीम की भरपूर कोशिश के बाद भी भाजपा 2015 और 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में अरविंद केजरीवाल को ऐतिहासिक सफलता हासिल करने से रोक नहीं पाई। लेकिन दिल्ली नगर निगम चुनाव के परिणामों ने भाजपा को केजरीवाल को रोकने का 'फॉर्मूला' सुझा दिया है। क्या आने वाले समय में दिल्ली की राजनीतिक तस्वीर बदलेगी? 



दरअसल, 2022 साल की शुरूआत में ही आम आदमी पार्टी ने पंजाब में ऐतिहासिक सफलता हासिल की थी। उसे पंजाब की 117 सदस्यीय विधानसभा में रिकॉर्ड 92 सीटों पर जीत मिली थी। केवल दो महीने बाद ही दिल्ली नगर निगम के चुनाव होने थे और पंजाब विजय से लबरेज आम आदमी पार्टी को उम्मीद थी कि वह एमसीडी चुनावों में भी रिकॉर्ड जीत हासिल करने में कामयाब रहेगी। चुनाव विश्लेषक मानते हैं कि यदि अप्रैल महीने में ही नगर निगम चुनाव हो गए होते तो चुनाव परिणाम पंजाब या दिल्ली विधानसभा की तरह ही हो सकते थे। लेकिन एक रणनीति के अंतर्गत केंद्र ने तीनों नगर निगमों को एक करने का निर्णय लिया और नगर निगम चुनाव छह महीनों के लिए टाल दिए गए।    


निगम चुनाव स्थगित करने के बाद भाजपा अचानक आम आदमी पार्टी पर आक्रामक तरीके से हमलावर हो गई। एक के बाद एक दिल्ली सरकार के मंत्रियों और आम आदमी पार्टी नेताओं पर भ्रष्टाचार के मामले सामने आने लगे। अरविंद केजरीवाल के राइट हैंड के तौर पर देखे जाने वाले मनीष सिसोदिया पर एक्साइज पॉलिसी में बदलाव कर भ्रष्टाचार में भारी पैसा कमाने का आरोप लगा। केजरीवाल के दूसरे भरोसेमंद साथी सत्येंद्र जैन पर मनी लांडरिंग के मामले में गंभीर आरोप लगे और वे पिछले छह महीनों से तिहाड़ जेल में बंद हैं। तिहाड़ जेल से सामने आए उनके वीडियो ने अरविंद केजरीवाल सरकार के खिलाफ एक जनमानस तैयार करने का काम किया। आम आदमी पार्टी के मुस्लिम चेहरे अमानतुल्लाह खान पर भी वक्फ बोर्ड में गंभीर अनियमितता करने के आरोप लगे। 

आम आदमी पार्टी नेताओं पर लगे गंभीर आरोप अदालत की चौखट पर चल रहे हैं। इन आरोपों का अंतिम परिणाम क्या होता है, यह अभी कोई नहीं कह सकता, लेकिन इससे आम आदमी पार्टी की छवि धूमिल जरूर हुई है। जनता के बीच अरविंद केजरीवाल जिस ईमानदारी और जनहितैषी राजनीति का दावा करते हैं, उस पर चोट लगी है। यही कारण है कि एक समय जिस नगर निगम में आम आदमी पार्टी को 200 से ज्यादा सीटें मिलने का अनुमान लगाया जा रहा था, वह मुश्किल से बहुमत के आंकड़े को पार कर पाई है। 

केजरीवाल ने भी किया था ये काम
राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडे ने अमर उजाला से कहा कि अरविंद  केजरीवाल ने अपनी राजनीति की शुरूआत दूसरों पर आरोप लगाने से की थी। उन्होंने यूपीए सरकार से लेकर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर भी अनगिनत आरोप लगाए और दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने पर उन्हें जेल में डालने की बात कही। इसके लिए वे अपने पास पर्याप्त सबूत होने की बात भी कहते थे, लेकिन अब यह बात सभी को समझ आ चुकी है कि उनके पास ऐसे कोई सबूत नहीं थे। भाजपा नेताओं अरुण जेटली (अब दिवंगत) और नितिन गडकरी से उन्हें क्षमा भी मांगनी पड़ी थी। लेकिन इन आरोपों की राजनीति का अरविंद केजरीवाल को लाभ हुआ और वे ईमानदार नेता के तौर पर उभरे और दिल्ली के मुख्यमंत्री बन बैठे। 

आज अरविंद केजरीवाल पर उसी तरह के गंभीर आरोप हैं। उनके मंत्रियों के ऊपर ऐसे गंभीर आरोप हैं जिसे इनकार करना संभव नहीं है। चूंकि कई मामलों में लेन-देन के दस्तावेज जांच एजेंसियों के पास हैं, और कुछ वीडियो सबूत सामने हैं जिनसे छेड़छाड़ करना या उन्हें इनकार कर पाना किसी के लिए भी संभव नहीं है, माना जा सकता है कि आने वाले दिनों में भी अरविंद केजरीवाल की मुश्किलें कम होने वाली नहीं हैं। यानी भाजपा अरविंद केजरीवाल को रोकने के लिए उसी आरोप की राजनीति का इस्तेमाल करती दिखाई पड़ रही है  जिसके बूते उन्होंने अपनी राजनीति की शुरूआत की थी। 
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जारी रहेंगे हमले
पहली नजर में ही भाजपा को इस राजनीति का फायदा मिलता दिखाई पड़ रहा है कि वह जिस निगम में 20-25 सीटों से ज्यादा पर आती नहीं दिख रही थी, वह अचानक 104 तक जा पहुंची है। भाजपा इस 'हथियार' का बखूबी इस्तेमाल करेगी और 2025 दिल्ली विधानसभा चुनावों और इसके पहले 2024 के लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी को काबू में रखेगी।    

आसान नहीं होगी राह
अरविंद केजरीवाल के लिए आने वाली राह भी आसान नहीं रहने वाली है। चूंकि, नगर निगम में भाजपा पर्याप्त मजबूत संख्या में है, वह आम आदमी पार्टी सरकार का पुरजोर विरोध करती दिखेगी। भाजपा नेता निगम चुनाव हारने के बाद भी अपना मेयर बनाने की बात कहकर केजरीवाल के दिलों की धड़कनें बढ़ा रहे हैं। चूंकि मेयर के चुनाव में पार्षदों पर ह्विप जैसी कोई बात लागू नहीं होती, पार्षद पार्टी लाइन तोड़कर दूसरे दल के मेयर प्रत्याशी को भी वोट कर सकते हैं। हर साल मेयरों का चुनाव होगा। ऐसे में केजरीवाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पार्षदों को पूरे कार्यकाल में एकजुट रखने की होगी। यदि वे एक बार भी पार्षदों को एक रखने में नाकाम होंगे तो इससे उनकी छवि खराब होगी और इसका राजनीतिक लाभ भाजपा को होगा। ऐसे में अरविंद केजरीवाल के एक बड़े राजनीतिक कौशल की परीक्षा होने वाली है। यह देखने वाली बात होगी कि वे इससे किस तरह निबटते हैं। 

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