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सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी: कहा- पुरुष अगर शारीरिक रूप से सक्षम, तो परिवार को वित्तीय मदद देना उसका कर्तव्य

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: निर्मल कांत Updated Wed, 28 Sep 2022 11:02 PM IST
सार

अदालत एक महिला के भरण पोषण की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। महिला ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी।

supreme court, सुप्रीम कोर्ट
supreme court, सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ani
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विस्तार

देश की सर्वोच्च अदालत ने बुधवार को एक अहम फैसला दिया है। अदालत ने कहा है कि पति अगर शारीरिक रूप से सक्षम है तो पत्नी और नाबालिग बच्चों को वित्तीय मदद देना उसका पवित्र दायित्व है।   



न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी की पीठ ने कहा, पत्नी और नाबालिग बच्चों को वित्तीय सहायता देने पति का पवित्र दायित्व है। यदि वह सक्षम है तो उसे शारीरिक श्रम करके पैसा कमाने की जरूरत है। पीठ ने कहा कि पति अपने दायित्वों से नहीं बच सकता है। 


शीर्ष अदालत ने कहा कि सीआरपीसी की धारा-125 सामाजिक न्याय का एक उपाय है और इसे विशेष रूप से महिलाओं व बच्चों की सुरक्षा के लिए अधिनियमित किया गया है। यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 15 (3) के दायरे में भी आता है जिसे संविधान का अनुच्छेद 39 और अधिक मजबूत बनाता है। 

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश को दी थी चुनौती
अदालत एक महिला की भरण पोषण वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। महिला ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर चुनौती दी थी। 

शीर्ष अदालत ने पति के तर्क को किया खारिज
वहीं पति की ओर से अदालत में वकील दुष्यंत पाराशर पेश हुए थे। अदालत ने पति के उस तर्क को खारिज किया जिसमें उसने बताया था कि उसका एक छोटा बिजनेस है, जो बंद हो गया है, इसलिए उसके पास आय का कोई साधन नहीं है।

बेटे को 6 हजार और पत्नी को 10 हजार देने के निर्देश
शीर्ष अदालत ने पति को निर्देश दिया है कि वह बेटे को 6 हजार रुपये दे और इसके अलावा पत्नी को 10 हजार रुपये का भुगतान करे। 

फैमिली कोर्ट ने खारिज की डीएनए परीक्षण की याचिका
वहीं वकील पाराशर ने पहले फैमिली कोर्ट में पत्नी की शुद्धता पर सवाल उठाया था और दावा किया था कि लड़का (उसका) जैविक पुत्र नहीं है। पति ने डीएनए परीक्षण के लिए याचिका दाखिल की थी  लेकिन फैमिली कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया था। कोर्ट ने उस याचिका को भी खारिज कर दिया था जिसमें  महिला और बेटे के लिए भरण पोषण की मांग की गई थी। कोर्ट ने हालांकि 6 हजार रुपेय मासिक भुगतान करने का निर्देश दिया था। 
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शीर्ष अदालत ने फैमिली कोर्ट के आदेश को बताया दुर्भाग्यपूर्ण
फैमिली कोर्ट के फैसले पर सर्वोच्च अदालत ने कहा, उसने न केवल तय कानूनी स्थिति को नजरअंदाज किया है बल्कि उसने खुद को गलत दिशा दी है। इस तरह के गलत और विकृत आदेश को हाईकोर्ट द्वारा भी बरकरार रखना दुर्भाग्यपूर्ण है। 

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