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नजरबंदी का आदेश खारिज: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- जमानत नहीं देने का आधार ठोस होना चाहिए

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: गौरव पाण्डेय Updated Mon, 02 Aug 2021 09:15 PM IST

सार

सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को एक व्यक्ति के खिलाफ तेलंगाना सरकार के नजरबंदी के आदेश को खारिज कर दिया। इस व्यक्ति को धोखाधड़ी और जालसाजी से संबंधित मामलों में गिरफ्तार किया गया था। अदालत ने कहा कि  'सार्वजनिक व्यवस्था' को भंग करने के लिए निश्चित रूप से 'सार्वजनिक अव्यवस्था' होनी चाहिए, जिससे व्यापक रूप से समाज प्रभावित हो।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार

उच्चतम न्यायालय ने एक व्यक्ति के खिलाफ तेलंगाना सरकार की ओर से जारी किए गए नजरबंदी के आदेश को सोमवार को खारिज कर दिया। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ को भंग करने के लिए निश्चित रूप से एक 'सार्वजनिक अव्यवस्था' होनी चाहिए, जिससे हमारा समाज व्यापक रूप से प्रभावित हो। बता दें कि आरोपी के खिलाफ धोखाधड़ी व जालसाजी के कई मामले दर्ज हैं।
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सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि तेलंगाना खतरनाक गतिविधि निरोधक अधिनियम (टीपीडीएए) के तहत नजरबंदी के आदेश को ध्यान से पढ़ने पर यह साफ होता है कि इसे व्यापक सार्वजनिक नुकसान, खतरे या अलार्म की किसी भी आशंका पर जारी नहीं किया गया था। बल्कि, केवल इसलिए जारी किया गया था क्योंकि आरोपी शख्स अपने खिलाफ सभी पांचों प्राथमिकियों में न्यायालयों से अग्रिम जमानत या जमानत पाने में सफल रहा था।


न्यायाधीश आरएफ नरीमन और बीआर गवई की पीठ ने टीपीडीएए के तहत अपने पति के खिलाफ पारित निरोध आदेश को चुनौती देने वाली एक महिला की ओर से दायर याचिका को खारिज करने के तेलंगाना उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील की अनुमति दी। बता दें कि महिला के पति के खिलाफ बेईमानी, धोखाधड़ी के लिए कई एफआईआर दर्ज हैं, लेकिन उसे अपने खिलाफ दर्ज सभी मामलों में जमानत मिली है।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि मामले में साफ है कि तेलंगाना सरकार ने अपने नजरबंदी के आदेश में अधिक से अधिक यह आशंका जताई है कि अगर हिरासत में लिए व्यक्ति को छोड़ दिया गया तो वह आम नागरिकों के साथ धोखाधड़ी करेगा और इससे कानून व्यवस्था के लिए खतरा उत्पन्न होगा।

पीठ ने अपने फैसले में कहा, 'इसलिए हम इस आधार पर तेलंगाना सरकार की ओर से जारी नजरबंदी के आदेश को रद्द करते हैं। इसके परिणामस्वरूप, याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता द्वारा बताए गए किसी दूसरे आधार की तह तक जाना गैरजरूरी है। आक्षेपित फैसले को खारिज किया जाता है और हिरासत में लिए गए शख्स को मुक्त करने का आदेश दिया जाता है। इसके मुताबिक, याचिका को स्वीकार किया जाता है।'
 

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