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Supreme Court: यूपी सरकार को सौंपनी पड़ सकती है आम्रपाली आवास परियोजना, पढ़ें कोर्ट की अहम खबरें

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: निर्मल कांत Updated Fri, 02 Dec 2022 09:02 PM IST
सार

चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की पीठ ने हिंदू महासभा नेता की ओर से पेश वकील की दलीलों को सुना और कहा कि याचिकाकर्ता के पास ट्रस्ट में शामिल होने का कोई निहित अधिकार नहीं है

सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अटॉर्नी जनरल (एजी) आर वेंकटरमणी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि कोर्ट को आम्रपाली आवास परियोजना का प्रबंधन उत्तर प्रदेश सरकार को सौंपने का आदेश पारित करना पड़ सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि अधूरी आवास परियोजनाओं से जुड़े वित्तीय संकट जटिल हैं। आम्रपाली मामले में एजी कोर्ट रिसीवर हैं। जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने वेंकटरमणी की बात सुनने के बाद मामले की अगली सुनवाई 8 दिसंबर को तय कर दी। 



वेंकटरमणी ने इससे पहले परियोजनाओं को पूरा करने के लिए धन जुटाने की खातिर इसमें अप्रयुक्त और अतिरिक्त एफएआर बेचने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों के वकील रवींद्र कुमार ने एफएआर बेचने के प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि इससे और बकाया बढ़ सकता है। 


नवंबर में तत्कालीन सीजेआई यूयू ललित की पीठ ने आम्रपाली आवासीय परियोजनाओं में अप्रयुक्त एफएआर की बिक्री पर कोई भी आदेश पारित करने से इनकार कर दिया था। सेवानिवृत्ति से पहले उन्होंने एफएआर बेचने के प्रस्ताव पर प्राधिकरण के विरोध को देखते हुए इस मामले पर विचार का फैसला भविष्य की पीठ पर छोड़ दिया था।

एफएआर की बिक्री से 1000 करोड़ रुपये से अधिक प्राप्त करने का प्रस्ताव था। मालूम हो कि आम्रपाली की अधूरी पड़ी परियोजनाओं को पूरा करने का काम सरकारी स्वामित्व वाली एनबीसीसी कर रही है।

स्वामी चक्रपाणि
स्वामी चक्रपाणि - फोटो : Social Media
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें राम मंदिर के निर्माण के लिए नियुक्त ट्रस्ट के सदस्य के रूप में हिंदू महासभा के स्वामी चक्रपाणि का नाम शामिल करने के लिए 'श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र' को निर्देश देने की मांग की गई थी। 

चीफ जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की पीठ ने हिंदू महासभा नेता की ओर से पेश वकील की दलीलों को सुना और कहा कि याचिकाकर्ता के पास ट्रस्ट में शामिल होने का कोई निहित अधिकार नहीं है। वकील ने दलील दी कि अभी तक ट्रस्ट के लिए नियम नहीं बनाए गए हैं। बेंच ने कहा, या तो आप याचिका वापस ले लें या हम इसे खारिज कर देंगे। 

बेंच ने आगे कहा, अगर हम रिट याचिका खारिज करते हैं तो कुछ नहीं होगा। आप अयोध्या ट्रस्ट का हिस्सा बनना चाहते हैं, अपना प्रतिनिधित्व करें। हम इस पर विचार नहीं करेंगे। हम इसमें बिल्कुल भी नहीं पड़ना चाहते हैं। 

पांच जजों की संविधान पीठ ने 9 नवंबर 2019 को अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया था। शीर्ष कोर्ट ने केंद्र को फैसले की तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर अयोध्या अधिनियम, 1993 मेमं निश्चित क्षेत्र के अधिग्रहण के तहत एक योजना तैयार करने का निर्देश दिया था। 

लोकतांत्रिक प्रक्रिया की एलीट समझ के हर रूप को खारिज किया जाना चाहिए : सीजेआई

CJI DY Chandrachud
CJI DY Chandrachud - फोटो : ANI
चीफ जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की एलीट समझ के हर उस स्वरूप को खारिज किया जाना चाहिए जो बताती है कि शिक्षित लोग ही बेहतर निर्णय लेने वाले होते हैं।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की अवधारणा लोकतंत्र और व्यक्तियों के उस विचार से जुड़ी हुई है, जिन्हें समाज ने अशिक्षित होने के कारण तिरस्कृत किया गया है। उन्होंने जबरदस्त राजनीतिक कौशल और स्थानीय समस्याओं के प्रति जागरूकता दिखाई है। 

वह यहां 'यूनिवर्सल एंडल्ड फ्रैंचाइज : ट्रांसलेटिंग इंडियाज पॉलिटिकल ट्रांसफॉर्मेशन इनटू ए सोशल ट्रांसफोर्मेशन' विषय पर डॉ. एम. एम. सिंघवी मेमोरियल में बोल रहे थे। इस दौरान उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ भी मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थे। 
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