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असदुद्दीन ओवैसी का सियासी सफर और एआईएमआईएम की कमान मिलने की पूरी कहानी 

अमित कुमार मंडल, अमर उजाला Updated Thu, 06 Dec 2018 04:50 PM IST
असदुद्दीन ओवैसी के सियासी सफर पर नजर
असदुद्दीन ओवैसी के सियासी सफर पर नजर - फोटो : Amar Ujala
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भारतीय राजनीति में कुछ ऐसे नेता हैं जो विवादास्पद और भड़काऊ बयान देने के कारण अक्सर सुर्खियों में रहते हैं। इनके बयानों से सियासत में एक नई बहस छिड़ जाती है। ऐसे ही एक नेता हैं ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के नेता असदुद्दीन ओवैसी जो चर्चित ही विवादों भरे बयानों को लेकर हैं। ओवैसी का जन्म 13 मई 1969 को हुआ था और वह लगातार तीन बार से हैदराबाद के सांसद हैं। सियासत उन्हें पिता से विरासत में मिली और आज इसे अपने अंदाज में आगे भी बढ़ा रहे हैं। उनकी कोशिश हैदराबाद से बाहर निकलकर दूसरे राज्यों में पैर फैलाने की है। 

1994 में राजनीति में उतरे 

ओवैसी ने अपने राजनीति की शुरुआत 1994 में आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में उतरकर की। उन्होंने हैदराबाद के चारमीनार से मजलिस बचाओ तहरीक के उम्मीदवार को 40 हजार वोटों से हराकर चुनाव जीता। ये सीट एमआईएम के पास 1967 से ही थी। फिर 1999 चुनाव में तेलुगु देशम पार्टी के सैयद शाह नुरुल हक कादरी को 93 हजार वोटों से हराया। 2004 चुनाव में उन्होंने पिता की जगह हैदराबाद से लोकसभा चुनाव जीता।   


एआईएमआईएम करीब 80 साल पुराना संगठन है जिसकी शुरुआत एक धार्मिक और सामाजिक संस्था के रूप में हुई थी। लेकिन बाद में यह एक राजनीतिक पार्टी में तब्दील हो गई जो हैदराबाद में एक बड़ी ताकत बन चुकी है। हालांकि इस संगठन पर 1957 में बैन भी लगा था। हैदराबाद की सियासत पर चर्चा उनका और उनकी पार्टी का जिक्र किए बिना नहीं हो सकता। हैदराबाद की लोकसभा सीट पर एमआईएम का कब्जा 1984 से ही रहा है। हैदराबाद के मेयर भी इसी पार्टी के हैं।

करीब पांच दशकों में इस पार्टी का प्रभाव हैदराबाद में जबरदस्त तरीके से बढ़ा है। तेलंगाना विधानसभा में उसके सात विधायक हैं और विधान परिषद में दो सदस्य। मजलिस को एक मुस्लिम सियासी संगठन के तौर पर देखा जाता है और हैदराबाद के मुसलमान इस पार्टी का जबरदस्त समर्थन करते हैं। आज हैदराबाद में एमआईएम एक बड़ी ताकत है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। ओवैसी परिवार अक्सर विवादों में भी रहा है। समुदाय के भीतर से ही परिवार के खिलाफ आवाजें उठीं, लेकिन इसकी ताकत बरकरार रही। इस परिवार के हाथ में पार्टी की कमान 1957 में पाबंदी हटने के बाद आई थी।

सियासी इतिहास बेहद दिलचस्प 

असदुद्दीन ओवैसी
असदुद्दीन ओवैसी

इस पार्टी का सियासी इतिहास बेहद दिलचस्प है। 1928 में नवाब महमूद नवाज खान ने इसकी स्थापना की थी। ये संगठन हैदराबाद को अलग मुस्लिम राष्ट्र बनाने की मांग करता था। 1948 में हैदराबाद के भारत विलय के बाद संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। 1957 में पार्टी से पाबंदी हटी तो इसमें ऑल इंडिया नाम जोड़ दिया गया और संविधान भी बदला गया। हैदराबाद के खिलाफ भारत सरकार की कार्रवाई के समय कासिम रिजवी इसके अध्यक्ष थे। पाकिस्तान जाने से पहले वह पार्टी की कमान मशहूर वकील अब्दुल वाहेद ओवैसी के हाथ दे गए। 


तभी से पार्टी ओवैसी परिवार के हाथों में रही। अब्दुल वाहेद के बाद सलाहुद्दीन ओवैसी पार्टी के अध्यक्ष बने। अब उनके बेटे असदुद्दीन ओवैसी एआईएमआईएम के अध्यक्ष और सांसद हैं। छोटे भाई अकबरुद्दीन ओवैसी विधानसभा में पार्टी के नेता हैं। ये वही अकबरुद्दीन हैं जो अपने भड़काऊ भाषण के लिए जेल भी जा चुके हैं। आज भी विरोधी पार्टियां अकबरुद्दीन के उसी भाषण का जिक्र कर असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी को निशाना बनाते हैं। 

हैदराबाद सीट रही ओवैसी परिवार के कब्जे में

1984 में अब्दुल ओवैसी पहली बार हैदराबाद से जीतकर लोक सभा पहुंचे। इसके बाद से ही जीत का सिलसिला उनके बेटे असदुद्दीन ओवैसी ने जारी रखा। एआईएमआईएम और ओवैसी पर सांप्रदायिक होने के आरोप लगते रहे हैं। छोटे भाई अकबरुद्दीन के एक भड़काऊ बयान ने न सिर्फ उन्हें जेल पहुंचाया, असदुद्दीन ओवैसी के लिए असहज स्थिति भी पैदा कर दी। चाहे बात पीएम मोदी को उनके बयानों पर घेरने की हो, या कांग्रेस को खरी खरी सुनाने की, ओवैसी ने सख्त बयानों ने उन्हें खूब सुर्खियां दिलाई हैं। ओवैसी अब हैदराबाद के बाहर पार्टी का प्रभाव बढ़ाने की जुगत में हैं। महाराष्ट्र में वह लगातार अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं। बिहार में विधानसभा चुनाव में पार्टी को उतार चुके हैं। अब तेलंगाना में केसी राव की पार्टी से उनका अंदरखाने का समझौता बताया जाता है।
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