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Gujarat Elections: क्या भाजपा चुनावी चक्रव्यूह का सातवां द्वार तोड़ पाएगी, उत्तर और मध्य गुजरात में मतदान आज

महेंद्र तिवारी, गांधीनगर। Published by: देव कश्यप Updated Mon, 05 Dec 2022 05:37 AM IST
सार

गुजरात में विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण का प्रचार खत्म होने के बाद प्रत्याशी और समर्थक ज्यादा से ज्यादा वोटर निकालने के प्रयास में लगे हैं। पहले चरण में मतदान उम्मीद से कम रहने से दलों की नींद उड़ी हुई हैं। आज दूसरे चरण के मतदान के साथ मध्य और उत्तर गुजरात के मतदाता भी राज्य के सियासी भविष्य का फैसला ईवीएम में लॉक कर देंगे।

गुजरात विधानसभा चुनाव 2022
गुजरात विधानसभा चुनाव 2022 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

गुजरात के मतदाताओं ने राज्य की 15 वीं विधानसभा के साथ 2024 के लोकसभा चुनाव का संदेश भी तय कर लिया है, जो आठ दिसंबर को सामने आ जाएगा। भाजपा छह बार से गुजरात में सत्ता में है। सातवें चुनाव में पार्टी को कांग्रेस के साथ आम आदमी पार्टी (आप) की तगड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा है। सवाल यह है कि क्या भाजपा लगातार सातवीं बार गुजरात की सत्ता सिंहासन को हासिल कर पाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह जनादेश देश की सियासत के कई प्रमुख सवालों का जवाब देगा।



सवाल 1: 2024 चुनावों के लिए क्या आसान होगी मोदी की राह
लोकसभा चुनाव से पहले गुजरात के चुनाव पर देश की नजर है। तगड़ी एंटी इनकंबेंसी फैक्टर का सामना कर रही भाजपा की सत्ता में वापसी के लिए पीएम नरेंद्र मोदी व गृह मंत्री अमित शाह ने जबरदस्त परिश्रम किया है। यहां लोगों की नजर केवल राज्य में जीत-हार पर ही नहीं सीट की मार्जिन पर भी लगी है। पहले से बेहतर प्रदर्शन से मोदी की 2024 की राह आसान होगी।


सवाल 2: क्या कांग्रेस में बचा है सत्ता में वापसी का दम
पिछले चुनाव में कांग्रेस ने 22 वर्ष बाद बेहतर प्रदर्शन किया था। पिछली बार पाटीदार व दलित आंदोलन के बरक्स इस चुनाव में सत्ता विरोधी लहर ज्यादा थी।  इसके बावजूद कांग्रेस नेतृत्व ने एक तरह से राज्य कांग्रेस व प्रत्याशियों को उनके ही हवाले छोड़ दिया। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने केवल दो सभाएं की और राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा आईं ही नहीं। नए अध्यक्ष मलिकार्जुन खरगे अपने विवादित बयानों से चर्चा बटोरने के सिवा ज्यादा कुछ योगदान नहीं कर पाए। ऐसी परिस्थिति में कांग्रेस के प्रदर्शन पर सभी की निगाहें हैं।

सवाल 3: आप बन पाएगी तीसरा पक्ष
गुजरात में तीसरा पक्ष लंबे समय तक कभी सफल साबित नहीं हो पाया है। आप ने यहां पूरे दमखम के साथ चुनाव लड़ा है और शहर से गांव तक अपनी पहुंच बनाई है? ऐसे में आप को मिलने वाले वोट शेयर और सीट पर सभी की निगाहें हैं। आप दिल्ली और पंजाब के बाद गुजरात में भी अप्रत्याशित नतीजे की उम्मीद कर रही है।

सवाल 4: बीटीपी अकेले बना पाएगी अपनी पहचान
राज्य में आदिवासी समाज की बड़ी आबादी है। इस समाज के लिए 27 सीटें आरक्षित हैं। भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) की आदिवासियों में अच्छी पैठ है। पिछले चुनाव में पार्टी कांग्रेस के साथ चुनाव लड़कर दो सीटें जीती थीं। इस बार अकेले लड़ रही है। लोगों की नजर है कि क्या बीटीपी अकेले सफलता हासिल कर पाती है?

सवाल 5: क्या केंद्र और गुजरात की तरह अन्य राज्यों में भी ‘मार्गदर्शक मंडल’ की खुलेगी राह
भाजपा ने नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणी और उप मुखमंत्री नितिन पटेल सहित कई स्थापित वरिष्ठ नेताओं को घर बैठा दिया है। कहा जा रहा है कि ये अब नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करते रहेंगे। गुजरात के नतीजे भाजपा की उम्मीद के हिसाब से रहे तो आगे इस प्रयोग को बढ़ाया जा सकता है। आने वाले दिनों में मध्यप्रदेश व राजस्थान के अलावा लोकसभा के भी चुनाव होने हैं।
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बड़ा सवाल...मुस्लिम किसके साथ रहेंगे

  • राज्य में करीब 10 फीसदी मुस्लिम आबादी है। ये तमाम सीटों पर जीत हार तय करने की स्थिति में हैं। ये लंबे समय तक कांग्रेस को वोट देते रहे हैं। मगर मुस्लिमों को टिकट देने में कांग्रेस के हाथ तंग रहने लगे हैं।
  • इस चुनाव में कांग्रेस ने छह, वहीं आप ने दो मुस्लिम उम्मीदवार दिए हैं। एआईएमआईएम ने एक दर्जन मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं।
  • इस बार मुस्लिमों का झुकाव कई जगह आप और एआईएमआईएम की ओर नजर आया है। हालांकि, साफ तो चुनाव नतीजों से ही होगा कि मुस्लिम किस तरह की राजनीति का संकेत दे रहे हैं।


दलबदल करा सीटें निकालने का फॉर्मूला कितना कारगर

  • सत्ताधारी दल ने मुश्किल साबित हो रही सीटों को जीतने के लिए दूसरे दलों के विधायकों व प्रभावशाली नेताओं का दलबदल कराकर सफलता का फार्मूला अपनाया है। इससे काडर के साथ-साथ तमाम मतदाताओं में साफ नाखुशी नजर आई।
  • पूर्व में कई सीटों पर गुजरात के मतदाता इस तरह के प्रयोग को नकार चुके हैं। इस चुनाव में भी भाजपा ने यह दांव खुले हाथ चला है। गुजरात के आम मतदाता ने इसे किस रूप में लिया, यह देखने वाली बात होगी।


कर्मचारियों के मुद्दे... सरकारी कर्मचारियों की पुरानी पेंशन व सेवा लाभों का मुद्दा प्रमुख है। हिमाचल में भी यह मुद्दा है। यह नतीजे लोकसभा चुनाव से पहले कर्मचारियों को संतुष्ट करने वाले कदम की राह खोल सकते हैं।

मंहगाई और बेरोजगारी... गरीब और मध्यवर्ग मंहगाई व बेरोजगारी से यहां भी त्रस्त है। पढ़ाई, दवाई, रसोई गैस और बिजली का बढ़ता बिल परेशान किए हुए है। बीजेपी का कोर वोटर मानी जाने वाली महिलाएं भी रसोई गैस और बिजली का मुद्दा उठाती नजर आईं। विपक्ष ने भी इसे खूब मुद्दा बनाया।

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