पाक का पैंतरा: घाटी में हुर्रियत की गद्दी पाने को पाकिस्तान का ये हैं खतरनाक इरादा, भारत की इस चाल से खत्म हो जाएगा नामोनिशान

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: प्रशांत कुमार झा Updated Sun, 05 Sep 2021 03:02 PM IST

सार

कश्मीर में हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी की मौत के बाद बड़ा सवाल यही कि अब घाटी में क्या सक्रिय रह पाएगी हुर्रियत।अगर उसकी सक्रियता रहेगी तो कौन होगा उसका सबसे बड़ा नेता। पाकिस्तान ने भी एक नई चाल चल दी है, लेकिन भारत ने ऐसा खेल कर दिया है कि उसकी बोलती बंद हो गई है। 
Syed Ali Shah Geelani
Syed Ali Shah Geelani - फोटो : PTI
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विस्तार

कश्मीर में हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी का दामाद अल्ताफ शाह फंटूश जेल में है। गिलानी का दाहिना हाथ रहा उसका सबसे करीबी चेला मसर्रत आलम जेल में है। तीसरा करीबी अशरफ सेहराई जेल में बीमार होने के बाद दम तोड़ चुका है। मीरवाइज में अब कोई दमखम नहीं बचा। जेकेएलएफ आतंकी यासीन मलिक की मुश्किलें बढ़ने लगी हैं। हुर्रियत की बागडोर संभालने वाले इन पांच बड़े नामों में कुछ जेल में है, कुछ की मौत हो चुकी और बचे हुए कुछ अलगाववादी नेता कमजोर पड़ गए। सबसे बड़ा सवाल यही है कश्मीर में हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी की मौत के बाद अब अलगाववादियों का सबसे बड़ा नेता कौन होगा।
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 कश्मीर में अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी की मौत के बाद पाकिस्तान ने अपना नया पासा फेंका है। सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान कश्मीर में गिलानी के बाद पीओके से अपने प्यादों के सहारे कश्मीर की हुर्रियत को चलाने की योजना बना रहा है। रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि यह सबसे मुफीद वक्त है जब घाटी में अमन चैन कायम रखने के लिए सुलझे नेताओं को आगे लाया जा सकता है और कट्टरपंथी अलगाववादियों को पूरी तरीके से किनारे लगाया जा सकता है।


रक्षा मामलों के जानकार और कश्मीर में लंबे समय तक खुफिया एजेंसी की सेवाएं देने वाले एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कश्मीर में इस वक्त सेपरेटिस्ट आंदोलन अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। वह कहते हैं कि हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी की मौत के बाद पाकिस्तान के इशारे पर अलगाववाद के माध्यम से घाटी में आतंकवाद को बढ़ाने वाला कोई भी बड़ा नेता नहीं है। उन्होंने बताया कि ऐसे में पाकिस्तान अपनी नई चाल के मुताबिक, अपना कोई भी "प्यादा" कश्मीर में इस आंदोलन को बढ़ाने के लिए सेट करना चाह रहा है। चूंकि कश्मीर में कोई भी बड़ा अलगाववादी नेता इस जिम्मेदारी को संभालने लायक नहीं बचा है। लिहाजा पीओके में हुर्रियत की जिम्मेदारी संभालने वाले अब्दुल्ला गिलानी पर पाकिस्तान दांव लगाने की तैयारी कर रहा है। अब्दुल्ला गिलानी दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर एसएआर गिलानी का भाई है। 

गिलानी की मौत के बाद किसी में आंदोलन करने की ताकत नहीं
कश्मीर मामलों पर नजर रखने वाले प्रोफेसर एसएन मलिक बताते हैं कि सैयद अली शाह गिलानी ही कश्मीर में पाकिस्तान के इशारे पर आतंकवाद को बढ़ावा देते थे। उनकी मौत के बाद कश्मीर में पाकिस्तान के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाला कोई भी आदमी नहीं बचा। गिलानी की मौत के बाद कुछ नाम सामने जरूर आए जो घाटी में हुर्रियत की गद्दी पर बैठ सके, लेकिन जो नाम सामने आए उनमें कुछ इतने कमजोर हो गए जो आंदोलन को हवा नहीं दे सकते, जबकि कुछ नाम ऐसे थे जो या तो जेल में है या उनकी मौत हो चुकी है। सबसे पहला नाम की गिलानी के दामाद अल्ताफ फंटूश का आया लेकिन फंटूश जेल में है। कभी गिलानी का दाहिना हाथ हुआ करता था और सबसे भरोसेमंद आतंकी मसर्रत आलम का भी नाम गिलानी के उत्तराधिकारी के तौर पर सामने आया,  लेकिन उसके भी जेल में बंद होने से हुर्रियत की गद्दी संभालने वाला दूसरा नाम भी खत्म हो गया। बीते कुछ सालों से घाटी में यही चर्चा थी कि गिलानी के बाद उनका उत्तराधिकारी अशरफ सहराई होगा, लेकिन इसी साल मई में अशरफ सहराई की जेल में बीमार होने के बाद मौत हो गई। इसलिए गिलानी की गद्दी संभालने वाला तीसरा भी सबसे बड़ा दावेदार नहीं बचा। कश्मीर के मामलों के जानकार विशेषज्ञ बताते हैं की हुर्रियत नेता गिलानी के उत्तराधिकारी के तौर पर फिलहाल अब कोई भी बड़ा नाम घाटी में नहीं है।

मीरवाइज में नहीं बचा दम
कश्मीरी मामलों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि घाटी में अलगाववादी आंदोलन एक तरह से वेंटिलेटर पर ही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अलगाववादी नेता मीरवाइज उमर और यासीन मलिक जरूर इस आंदोलन को हवा दे सकते हैं, लेकिन मीरवाइज में अब वह दमखम नहीं बचा। केंद्रीय जांच एजेंसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया बीते कुछ समय से चल रही केंद्र सरकार की कई एजेंसियों की जांच में मीरवाइज पूरी तरीके से टूट चुका है। यही वजह है कि वह गिलानी के बाद अलगाववाद के आंदोलन को घाटी में जिंदा नहीं रख सकता है। दूसरा नाम घाटी में अलगाववाद के आंदोलन को आगे बढ़ाने वाला यासीन मलिक है।

कश्मीर मामले के विशेषज्ञों का कहना है कि यासीन मलिक भी अब किसी भी तरीके के बड़े आंदोलन को हवा नहीं दे सकता। हालांकि, घाटी में कम हो रहे अलगाववाद के आंदोलन को ध्यान में रखते हुए मीरवाइज और यासीन मलिक के साथ मिलकर सैयद अली शाह गिलानी ने 2016 में "जॉइंट रजिस्टेंस लीडरशिप" (जेआरएल) नाम से एक संगठन की शुरुआत की थी। ताकि अलगाववाद का आंदोलन जिंदा रहे। इस संगठन का अब तक का सबसे बड़ा आंदोलन घाटी में बुरहान वानी की मौत के बाद एक बार पनपा, लेकिन सैन्य बलों ने उस आंदोलन को पूरी तरीके से कुचल कर रख दिया। सूत्र बताते हैं कि इस आंदोलन के कुचलने के बाद ही पूरी तरीके से जेआरएल की कार्यप्रणाली खुले तौर पर सामने नहीं आ पाई।

सुरक्षाबलों और केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता से कोई भी आगे आने को तैयार नहीं 
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि कश्मीर के डाउनटाउन इलाके में अभी भी कट्टरपंथियों का एक बड़ा संगठन आंदोलित जरूर है, लेकिन वह पूर्ण रुप से जमीन पर नहीं उतर पा रहा है। दरअसल, इन कट्टरपंथियों में आईएसआई से लेकर पीओके में मौजूद आतंकवादी संगठनों के कई कमांडर और उनमें भरोसा करने वाले नौजवान और युवा भी है, लेकिन भारतीय सैन्य शक्ति और खुफिया एजेंसियों समेत केंद्रीय सुरक्षाबलों और केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता से यह कट्टरपंथी घाटी में अपना सिर नहीं उठा पा रहे हैं, लेकिन अंदर ही अंदर यह सुलग जरूर रहे हैं। 

कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ बताते हैं कि रविवार को जिस तरीके से अलगाववादी नेता यासीन मलिक के पुराने मामलों में सीबीआई ने गवाहों के क्रॉस एग्जामिन करने की शुरुआत की है वो अलगाववादी नेताओं के लिए या कश्मीर में आंदोलन के माध्यम से युवाओं को भड़काने वाले नेताओं के लिए एक स्पष्ट संदेश है। जेकेएलएफ के आतंकवादी यासीन मलिक के इंडियन एयर फोर्स के चार जवानों की गोली मारकर हत्या करने और रुबिका सईद के अपहरण के मामले में गवाहों का क्रॉस एग्जामिनेशन शुरू हो चुका है। विशेषज्ञों का कहना है यासीन मलिक के ऊपर अब शिकंजा कसना शुरू होगा।

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